कुछ मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त करते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो अपना पूरा जीवन देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ छोड़ जाते हैं, पूजनीय हनुमान प्रसाद पोद्दार ‘भाई जी’ इसी दूसरी श्रेणी के महापुरुष थे

उन्होंने अपने लिए क्या बनाया, यह प्रश्न उनके जीवन के सामने बहुत छोटा हो जाता है। बड़ा प्रश्न यह है कि उन्होंने समाज और राष्ट्र के लिए क्या छोड़ा, इसका उत्तर सामने खड़ी एक ऐसी विराट परंपरा है, जिसे आज भारत ही नहीं, दुनिया के करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में अनुभव करते हैं

आज किसी घर में श्रीमद्भगवद्गीता रखी है, किसी परिवार में रामचरितमानस का पाठ हो रहा है, किसी युवा के हाथ में उपनिषद या पुराण हैं, किसी साधक के सामने ‘कल्याण’ का कोई अंक खुला है, तो उसके पीछे एक ऐसे तपस्वी का जीवन दिखाई देता है जिसने सनातन साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने को अपना जीवन-धर्म बना लिया था

17 सितम्बर 1892 को शिलांग में जन्मे हनुमान प्रसाद पोद्दार का जीवन बचपन से ही अनेक कठिन परिस्थितियों से होकर गुजरा मात्र दो वर्ष की आयु में माता का साया उठ गया लेकिन ईश्वर शायद उनके जीवन से कोई बड़ा कार्य लेना चाहते थे,परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि भीतर से गढ़ा,बाल्यकाल में ही उनके भीतर राष्ट्र के प्रति संवेदना जागने लगी थी, देश में स्वदेशी आंदोलन की लहर उठी तो उन्होंने बहुत छोटी आयु में ही स्वदेशी का व्रत स्वीकार किया, यह केवल उस समय का राजनीतिक वातावरण नहीं था, बल्कि उनके व्यक्तित्व में राष्ट्रभाव के बीज पड़ने का समय था

बड़े होते-होते उनका संपर्क देश के अनेक राष्ट्रसेवियों, चिंतकों और विद्वानों से हुआ महामना मदनमोहन मालवीय जैसे महापुरुषों के संपर्क ने उनके जीवन को नई दिशा दी राष्ट्रकार्य के कारण उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उनके भीतर का संकल्प नहीं बदला,उनका जीवन धीरे-धीरे एक और बड़े सत्य की ओर बढ़ रहा था,भारत की शक्ति केवल उसकी भूमि में नहीं है,भारत की वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति, उसके संस्कार और उसकी आध्यात्मिक चेतना में है,भाई जी ने इस सत्य को केवल समझा नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतार दिया,उनके सामने प्रश्न था कि यदि भारत की नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट गई तो राष्ट्र की आत्मा कैसे सुरक्षित रहेगी,इसका उत्तर उन्होंने किसी बड़े आंदोलन या शोर में नहीं खोजा,उन्होंने ग्रंथों को घर-घर पहुँचाने में खोजा,यहीं से उनके जीवन का वह अध्याय शुरू होता है जिसने भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन पर गहरी छाप छोड़ी।


‘कल्याण’ से गीता प्रेस तक की यात्रा

1926 में ‘कल्याण’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ उद्देश्य स्पष्ट था, भारतीय समाज तक धर्म, अध्यात्म, सदाचार और सनातन जीवन-मूल्यों का साहित्य पहुँचाना,इसके बाद गोरखपुर में गीता प्रेस का कार्य आगे बढ़ा और धीरे-धीरे यह केवल एक प्रकाशन संस्था नहीं रहा

यह सनातन साहित्य के संरक्षण और प्रसार का एक मौन सांस्कृतिक आंदोलन बन गया,भाई जी जानते थे कि यदि धार्मिक ग्रंथ केवल विद्वानों और संपन्न लोगों तक सीमित रह गए तो समाज का बड़ा वर्ग अपनी ही परंपरा के ज्ञान से दूर हो जाएगा,इसलिए गीता, रामचरितमानस, रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद और अन्य धार्मिक साहित्य को अत्यंत कम मूल्य पर सामान्य जन तक पहुँचाने का प्रयास हुआ,यह कार्य देखने में जितना सरल लगता है, वास्तव में उतना ही कठिन था,ग्रंथों की शुद्धता का प्रश्न था। पाठ-भेदों की जाँच करनी थी विद्वानों से परामर्श करना था मुद्रण की त्रुटियों को दूर करना था, सामग्री तैयार करनी थी और फिर उसे देश के दूर-दराज के गाँवों तक पहुँचाना था,लेकिन भाई जी के लिए यह केवल प्रकाशन नहीं था,यह साधना थी,उनके जीवन का उद्देश्य धन, यश या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा प्राप्त करना नहीं था, उनका विश्वास था कि यदि सनातन ज्ञान समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच जाए तो यही सबसे बड़ी सेवा है,धर्म उनके लिए केवल पूजा-पद्धति नहीं थाभाई जी के जीवन को समझने के लिए यह बात बहुत महत्वपूर्ण है,उनके लिए धर्म का अर्थ केवल मंदिर जाना या धार्मिक पुस्तक पढ़ लेना नहीं था, धर्म का अर्थ था चरित्र, संयम, सेवा, सत्य, सदाचार और अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा,इसीलिए उनके प्रयास का केंद्र केवल ग्रंथ नहीं था, बल्कि ग्रंथों के माध्यम से मनुष्य का निर्माण था

एक पुस्तक किसी व्यक्ति को बदल सकती है,एक बदला हुआ व्यक्ति परिवार को बदल सकता है,बदला हुआ परिवार समाज को बदल सकता है,और जागृत समाज राष्ट्र के चरित्र को बदल सकता है

शायद यही उस पूरी साधना का मूल भाव था,राष्ट्र और संस्कृति के लिए उनका योगदान,भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का विषय नहीं थी, भारत के लिए यह अपनी आत्मचेतना को पुनः जागृत करने का भी प्रश्न था,विदेशी शासन के लंबे कालखंड में भारत की शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक संरचनाओं और धार्मिक परंपराओं पर अनेक प्रकार के प्रभाव पड़े थे, ऐसे समय में अपने मूल साहित्य और परंपरा को सामान्य समाज तक पहुँचाना भी एक प्रकार का सांस्कृतिक राष्ट्रकार्य था,भाई जी ने इसी दिशा में काम किया,उन्होंने लोगों से यह नहीं कहा कि अपनी संस्कृति पर केवल गर्व करो,उन्होंने संस्कृति को पढ़ने, समझने और जीवन में उतारने का साहित्य उनके हाथ में दिया,यही उनके कार्य की सबसे बड़ी विशेषता थी,उन्होंने मंचों से केवल बातें नहीं कीं, उन्होंने साधन खड़ा किया,उन्होंने लोगों को केवल बताया नहीं कि गीता पढ़ो, उन्होंने गीता उनके घर तक पहुँचाई,उन्होंने केवल रामचरितमानस का महत्व नहीं बताया, उसे लाखों परिवारों की पहुँच में बनाया,उन्होंने केवल सनातन संस्कृति की बात नहीं की, उसके साहित्य को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में अपना जीवन लगा दिया,ईश्वरीय कृपा और उनका अटूट विश्वास,ऐसे बड़े कार्य केवल मनुष्य के बल से पूरे नहीं होते,भाई जी के जीवन में ईश्वर के प्रति गहरा विश्वास दिखाई देता है। परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, उनका भरोसा बना रहता था कि यदि कार्य ईश्वर की इच्छा से हो रहा है तो उसके लिए मार्ग भी ईश्वर ही बनाएंगे,कई बार संसाधनों की कमी आई होगी, कठिनाइयाँ सामने आई होंगी, लेकिन कार्य रुका नहीं

यही तो ईश्वरीय कृपा का एक रूप है,ईश्वर हमेशा चमत्कार करके कार्य नहीं करवाते। कई बार वे किसी मनुष्य को अपना माध्यम बना देते हैं,भाई जी का जीवन इसी भावना से देखा जा सकता है,उन्होंने स्वयं को कर्ता मानने के बजाय एक साधन माना,और शायद यही कारण है कि उनका कार्य उनके जीवन से कहीं बड़ा हो गया

त्याग का ऐसा जीवन जिसमें अपना कुछ था ही नहीं,आज के समय में हम त्याग की बात बहुत आसानी से कर लेते हैं, लेकिन वास्तविक त्याग वही है जिसमें व्यक्ति अपने सुख, सुविधा, समय और निजी इच्छाओं से ऊपर किसी बड़े उद्देश्य को रख दे,भाई जी ने यही किया,उन्होंने अपना जीवन अपने लिए नहीं जिया,उनके पास यदि कोई सबसे बड़ी संपत्ति थी तो वह थी समय, और उन्होंने वह समय समाज को दे दिया,उनके पास यदि कोई सबसे बड़ी शक्ति थी तो वह थी लेखन, विचार और संगठन की क्षमता, और उन्होंने उसे सनातन साहित्य की सेवा में लगा दिया,उनके पास यदि कोई सबसे बड़ी श्रद्धा थी तो वह थी भगवान और धर्म के प्रति विश्वास, और उन्होंने उसी विश्वास को अपने कर्म का आधार बनाया,उनका जीवन हमें बताता है कि समर्पण का अर्थ केवल किसी अवसर पर सेवा करना नहीं है,समर्पण का अर्थ है अपने पूरे जीवन को किसी उद्देश्य के नाम कर देना

उनकी सबसे बड़ी विरासत क्या है?

क्या गीता प्रेस उनकी सबसे बड़ी विरासत है?

क्या ‘कल्याण’ उनकी सबसे बड़ी विरासत है?

क्या करोड़ों पुस्तकें उनकी सबसे बड़ी विरासत हैं,ये सब उनकी विरासत का हिस्सा हैं, लेकिन शायद उनकी सबसे बड़ी विरासत इससे भी बड़ी है

उन्होंने यह विश्वास जगाया कि अपनी संस्कृति की सेवा करने के लिए किसी बड़े पद की आवश्यकता नहीं है,एक व्यक्ति भी शुरुआत कर सकता है,एक विचार भी आंदोलन बन सकता है,एक पुस्तक भी जीवन बदल सकती है,एक साधक भी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश छोड़ सकता है,भाई जी ने अपने जीवन से यही सिद्ध किया,22 मार्च 1971 को उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनका कार्य समाप्त नहीं हुआ,किसी महापुरुष की मृत्यु तब नहीं होती जब उसका शरीर चला जाता हैवह तब तक जीवित रहता है जब तक उसके विचार किसी के जीवन को दिशा देते रहते हैं,आज भी जब किसी छोटे से गाँव में कोई परिवार गीता पढ़ता है, जब कोई बच्चा रामचरितमानस की चौपाई पढ़ना सीखता है, जब कोई साधक ‘कल्याण’ के पन्नों से आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करता है, तब भाई जी की साधना किसी न किसी रूप में जीवित दिखाई देती है

आज उनकी जन्मजयंती पर हमें क्या सीखना चाहिए?

केवल श्रद्धांजलि देना पर्याप्त नहीं है,उनके जीवन को पढ़ना चाहिए,उनकी भावना को समझना चाहिए

और फिर स्वयं से पूछना चाहिए—हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं?
केवल धन?
केवल संपत्ति?
केवल अपना नाम?

या कुछ ऐसा भी, जिससे किसी और का जीवन बेहतर हो सके? भाई जी ने हमें इसका उत्तर अपने जीवन से दिया,उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं माँगा, लेकिन समाज को एक विशाल आध्यात्मिक साहित्य-संपदा देने में अपना जीवन लगा दिया

उन्होंने अपने समय को समाज को दियाअपनी प्रतिभा को संस्कृति को दिया,अपना श्रम धर्म को दिया,और अपना जीवन ईश्वर के चरणों में समर्पित कर दिया,यही किसी मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी सफलता है,आज उनकी जन्मजयंती पर उन्हें स्मरण करते हुए मन में यही भाव आता है कि ईश्वर ने उन्हें एक विशेष कार्य के लिए चुना था और उन्होंने उस कार्य को अपना जीवन बना लिया,ऐसे महापुरुष बार-बार जन्म नहीं लेते,वे एक युग की आवश्यकता बनकर आते हैं और जाने के बाद भी युगों तक अपना प्रकाश छोड़ जाते हैं

पूजनीय हनुमान प्रसाद पोद्दार ‘भाई जी’ का जीवन भारत की उस सनातन चेतना को समर्पित जीवन था, जो व्यक्ति से बड़ी है, पीढ़ी से बड़ी है और समय से भी बड़ी है

उनके चरणों में जन्मजयंती पर शत-शत नमन

ईश्वर से प्रार्थना है कि हमें भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र, समाज, धर्म और संस्कृति के लिए अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ करने की शक्ति दें,उन्होंने ग्रंथों को घर-घर पहुँचाया,
अब हमारी जिम्मेदारी है कि उन ग्रंथों के संस्कार को जीवन-जीवन पहुँचाएँ

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