भारत विभाजन की त्रासदी अत्यंत वेदनादायक थी – प्रशांत पोळ

केशव पुस्तकालय में ‘भारत विभाजन की त्रासदी’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन

नई दिल्ली, 08 अगस्त 2026।

केशव स्मारक समिति के तत्वाधान में केशव पुस्तकालय, केशव कुंज में शनिवार को ‘भारत विभाजन की त्रासदी’ विषय पर संगोष्ठी एवं वार्ता का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में प्रख्यात लेखक, विचारक, स्तंभकार प्रशांत पोळ जी मुख्य वक्ता रहे।

प्रशांत पोळ ने कहा कि 1905 में ब्रिटिश सरकार ने बंग-भंग की घोषणा की, जिसके खिलाफ बंगाल सहित पूरा देश एकजुट होकर खड़ा हो गया। ब्रिटिश सत्ता को इस एकजुटता के सामने झुकना पड़ा, तथा 1911 में बंग-भंग का प्रस्ताव वापिस लेना पड़ा। इसके पश्चात ऐसी क्या परिस्थितियां बनीं कि देश को विभाजन झेलना पड़ा और इतना बड़ा नरसंहार हुआ।

प्रशांत पोळ जी ने कहा कि भारत विभाजन की त्रासदी अत्यंत वेदनादायक थी। भारत विभाजन के दौरान 15 लाख से अधिक लोग क्रूरता से मार दिए गए, 1.5 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए। विश्व के इतिहास में अन्य किसी देश ने ऐसी त्रासदी नहीं झेली होगी। स्वतंत्रता से पहले और बाद में हुए दंगों या कहें नरसंहार से लाखों हिन्दू (अधिकांश) प्रभावित हुए।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा कर पहले 16 अगस्त 1946 को, फिर अक्तूबर 1946 में नोआखली में हिन्दुओं का नरसंहार किया। 15 हजार से अधिक हिन्दुओं को मारा गया। विभाजन से ठीक पहले पाकिस्तान में दंगे हो रहे थे, हिन्दू सिक्खों को मारा व भगाया जा रहा था। सिंध प्रांत की सरकार में मंत्री खुर्रम ने अपने भाषणों में यहां तक कह दिया था कि अपनी बहु-बेटियों को छोड़ जाओ और यहां से भाग जाओ।

प्रशांत पोळ ने कहा कि जून 1947 में कांग्रेस के अधिवेशन में विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया, 14-15 अगस्त की रात देश का विभाजन हुआ। उस समय कांग्रेस देश की बड़ी ताकत थी। तत्कालीन अतंरिम सरकार व कांग्रेस के पास दो-ढाई माह का समय था। लेकिन, तत्कालीन अंतरिम सरकार ने लोगों की सुरक्षा के लिए क्या किया, क्या कदम उठाए? जब तथ्यों को देखते हैं तो ध्यान में आता है कि सरकार ने एक तरह से लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया था। लोगों की सुरक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठाए। अतंरिम सरकार और कांग्रेस आवश्यक कदम उठाते तो अनेकों लोगों की जान बच सकती थी।

इसके विपरीत, सीमित शक्ति के बावजूद संघ के स्वयंसेवक राहत व सेवा कार्य में जुटे हुए थे। स्वयंसेवकों ने राहत शिविरों में कई दिनों तक 1.25 लाख से अधिक विस्थापितों (प्रतिदिन) के लिए राहत शिविरों में भोजन की व्यवस्था की।

लाहौर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक में गांधी जी ने अपने भाषण में कहा – “…मुझे यह देखकर बहुत ही बुरा लग रहा है कि पश्चिमी पंजाब से सभी गैर-मुस्लिम लोग पलायन कर रहे हैं. कल ‘वाह’ के शिविर में भी मैंने यही सुना, और आज लाहौर में भी मैं यही सुन रहा हूँ. ऐसा नहीं होना चाहिए. यदि आपको लगता है कि आपका लाहौर शहर अब मृत होने जा रहा है, तो इससे दूर न भागें. बल्कि इस मरते हुए शहर के साथ ही आप भी अपना आत्मबलिदान करते हुए मृत्यु का वरण करें. जब आप भयग्रस्त हो जाते हैं, तब वास्तव में आप मरने से पहले ही मर जाते हैं. यह उचित नहीं है. मुझे कतई बुरा नहीं लगेगा, यदि मुझे यह खबर मिले कि पंजाब के लोगों ने डर के मारे नहीं, बल्कि पूरे धैर्य के साथ मृत्यु का सामना किया…!”

इसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरूजी ने कराची में प्रभात शाखा में प्रार्थना की और शाखा पूर्ण करने के उपरान्त एक बैठक में उपस्थित रहे। सिंध प्रांत के सभी प्रमुख शहरों के संघचालक, कार्यवाह एवं प्रचारक बैठक में उपस्थित थे। बैठक में पाकिस्तान के हिन्दू-सिक्खों को भारत में सुरक्षित रूप से कैसे पहुंचाया जाए, इस बारे में योजना बनाई जा रही थी। ‘हिन्दुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी नियति ने ही संघ के कंधों पर सौंपी है’. गुरूजी ने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया और कहा कि ‘संगठन क्षमता से हम लोग बहुत सी असाध्य बातें भी सरलता से पूरी कर सकते हैं’।

जहां एक ओर कराची में जिन्ना की ताजपोशी हो रही थी। उसी दिन शाम के समय राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका लक्ष्मीबाई केलकर (मौसी जी) सेविकाओं, हिन्दू महिलाओं को ढाढस बंधा रही थीं। संक्षिप्त भाषण के अंत में मौसीजी ने कहा… “बहनें धैर्यशाली बनें, धीरज रखें… अपनी इज्जत बचाएं… अपने संगठन पर पूरा भरोसा करें। इस कठिन समय में भी अपनी मातृभूमि की सेवा का व्रत निरंतर जारी रखें। संगठन की ताकत द्वारा, हम इस संकट से सुरक्षित रूप से निकल जाएंगे।”

 

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