वर्तमान पीढ़ी भारत को जानकर विश्व मंच पर अपना पक्ष सशक्त ढंग से रखे – स्वांतरंजन जी

लखनऊ, 26 जुलाई 2026|

‘मातृभूमि स्तवन’ पुस्तक का लोकार्पण, संघ शताब्दी वर्ष में स्वयंसेवकों को पढ़ने की अपील

लखनऊ, 26 जुलाई। विश्व संवाद केन्द्र में रविवार को ‘मातृभूमि स्तवन’ पुस्तक का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांतरंजन जी ने किया।

स्वांतरंजन जी ने कहा कि जब राष्ट्र और सनातन का विचार एक साथ प्रकट होता है, तब वह अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यह पुस्तक हमें दिशा दिखाती है कि हमें कैसे आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि पुस्तकों को पढ़ना चाहिए, पढ़ने के बाद उसे लिखना चाहिए, लेकिन इससे भी अधिक आवश्यक है कि उसे लोगों को बताया जाए और लोगों तक पहुंचाया जाए। पुस्तक यह भी सिखाती है कि व्यक्ति को किसी आवरण की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उसे मानवीय मूल्यों को समझने की आवश्यकता होती है। हमें मोबाइल मोड से एक्शन मोड में आने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों द्वारा स्थापित कई संगठन आज विश्व के बड़े संगठनों में गिने जाते हैं, किन्तु स्वयंसेवक के जीवन में संघ का व्यावहारिक प्रकटीकरण होना आवश्यक है, वही हमारी असली पहचान है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ प्रचारकों के लिए बहुत सुन्दर व्यवस्था बनाई है। संघ प्रचारक किसी साधु-संत या अन्य वेश-भूषा में कार्य नहीं करते। आप जैसे सामान्य वेश में ही समाज के बीच राष्ट्र का कार्य करने में जुटे हुए हैं। संघ का कार्य किसी आवरण के बिना होता है – प्रचारक या स्वयंसेवक को समाज से केवल एक कदम आगे रहना है, अलग दिखने की आवश्यकता नहीं।

उन्होंने पुस्तक को ऐतिहासिक महत्व का बताते हुए कहा कि इसमें संघ के पुराने गीत और सुभाषित संकलित हैं, जो मन में संस्कार भरते हैं और दिशा दिखाते हैं। उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि वे जहां भी जाएं, अच्छी बातों को डायरी में नोट करें, पढ़ें और साझा करें।

स्वांतरंजन जी ने कहा कि संघ शताब्दी वर्ष चल रहा है और ऐसे में संघ के विषयों को समाज तक पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि विश्व के कई देश भारत के विरुद्ध नैरेटिव फैला रहे हैं, ऐसे में वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है कि वह भारत को गहराई से जाने और विश्व मंच पर अपना पक्ष सशक्त ढंग से रखे। उन्होंने समाज में सही विमर्श पहुंचाने और भारत के दृष्टिकोण को व्यापक रूप से फैलाने की आवश्यकता पर बल दिया।

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय लखनऊ परिसर के निदेशक डॉ. सर्व नारायण झा ने कहा कि इस ग्रंथ की रचना मां सरस्वती की आराधना के समान है। पुस्तक में मातृभूमि की वन्दना की गई है और माता व मातृभूमि के प्रति राग में कभी कोई अंतर नहीं आता, भले ही राग और अनुराग शब्दतः भिन्न हों। उन्होंने इसे स्वयंसेवकों के लिए पाथेय (मार्गदर्शक संबल) बताया।

पुस्तक पर प्रकाश डालते हुए डॉ. चन्द्रभूषण त्रिपाठी ने कहा कि यह ग्रंथ “बाबूजी” की कृति है, जिनकी बौद्धिक क्षमता अद्भुत थी और जो निरन्तर लेखन में लीन रहते थे। उन्होंने बताया कि उनकी पांडुलिपि में 1960 में पहली बार शाखा जाने का उल्लेख भी मिलता है। ज्योतिष के प्रकांड विद्वान रहे लेखक की इस पुस्तक में मंत्र, सुभाषितानि, केशव अर्चना, ध्वजगीत तथा खेलों की सूची जैसी सामग्री संकलित है। उन्होंने इसे परिवार के लिए दुर्लभ और गौरवमयी अवसर बताते हुए कहा कि प्रत्येक स्वयंसेवक को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक ग्रंथ है।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. बृजभूषण तिवारी ने सभी अतिथियों एवं उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया।

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