नक्सल पीड़ितों ने पूर्व गृहमंत्री चिदंबरम के बयान का किया विरोध; दिल्ली पहुंचकर सुनाई आपबीती

नई दिल्ली। 19 अगस्त 2026|

बस्तर के नक्सल पीड़ितों ने कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस वार्ता कर पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ होने का गर्व करने वाले बयान का विरोध करते हुए सवाल उठाए।

18 अगस्त, 2026 को बस्तर शांति समिति के बैनर तले दिल्ली पहुंचे नक्सली हिंसा के पीड़ितों, घायल नागरिकों और शहीद परिवारों ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा स्वयं को “दिमागी नक्सल” कहे जाने पर गर्व व्यक्त करने वाले बयान का विरोध किया। पीड़ितों ने कहा कि नक्सलवाद उनके लिए कोई राजनीतिक विमर्श या वैचारिक बहस नहीं, बल्कि जीवन का ऐसा घाव है, जिसकी पीड़ा आज भी झेल रहे हैं।

पीड़ितों ने प्रश्न किया, “जो व्यक्ति देश का पूर्व गृहमंत्री रहा हो, वह ऐसे शब्दों को लेकर गर्व कैसे व्यक्त कर सकता है? हमारी पीड़ा क्यों नहीं दिखती? क्या वे नक्सलियों के साथ हैं या हम बस्तरवासियों के साथ हैं?”

जिन लोगों ने नक्सली हिंसा में अपने परिजनों को खोया, गोलियां खाईं, बारूदी सुरंगों में अपने अंग गंवाए और अपने जीवनभर की आजीविका तथा सामान्य जीवन खो दिया, उनके लिए “दिमागी नक्सल” शब्द किसी गर्व का विषय नहीं हो सकता।

‘क्या नक्सलियों की रणनीति बनाने में भी भूमिका थी?’

पीड़ितों ने चिदंबरम के बयान पर पूछा कि “यदि चिदंबरम यह कह रहे हैं कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है, तो क्या वे यह भी स्पष्ट करेंगे कि क्या वे नक्सलियों की रणनीति बनाने वालों में शामिल थे?”

नक्सली हिंसा के दौरान बस्तर के ग्रामीणों, जनजातियों, जनप्रतिनिधियों, पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों ने जिस भयावहता को झेला है, उसे दिल्ली में बैठकर केवल वैचारिक शब्दों के खेल के रूप में नहीं देखा जा सकता। हिंसा का वास्तविक प्रभाव उन परिवारों के जीवन में आज भी है, जिन्होंने अपने परिजनों, शरीर, आजीविका और सामान्य जीवन की कीमत चुकाई है।

प्रेस वार्ता में नक्सली हिंसा के कई पीड़ितों ने अपनी आपबीती साझा की। इनमें गौतरिहा राम विश्वकर्मा भी शामिल रहे, जिन्हें वर्ष 2009 में नक्सलियों ने गोलियां मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया था।

सियाराम रामटेके को वर्ष 2022 में खेत पर जाते समय गोलियां मारी गई थीं। गंभीर चोटों के कारण आज व्हीलचेयर और वॉकर के सहारे जीवन जी रहे हैं।

आरक्षक मोहन उईके के बलिदान और उनके पीछे छूटे परिवार की पीड़ा का भी उल्लेख किया। साथ ही सालिक राम सिन्हा के बलिदान, पुलिस जवान अमर सिंह कुमेटी की स्थायी दिव्यांगता तथा तरुण कलाकार की रीढ़ की गंभीर चोट का जिक्र करते हुए कहा कि ये नक्सली हिंसा की भयावहता को सामने रखती हैं।

सीआरपीएफ कोबरा में रहे रुद्रेश सिंह ने भी प्रेस वार्ता में अपनी पीड़ा साझा की। 25 जनवरी 2026 को हुए आईईडी विस्फोट में गंभीर रूप से घायल हुए और उन्हें अपना एक पैर गंवाना पड़ा। उन्होंने कहा कि नक्सली हिंसा की कीमत केवल आंकड़ों में नहीं मापी जा सकती। इसके पीछे किसी का शरीर, किसी का परिवार और किसी का पूरा भविष्य टूटता है।

बस्तर शांति समिति ने कहा कि नक्सली हिंसा का वास्तविक चेहरा उन हजारों परिवारों की पीड़ा में दिखाई देता है, जिन्होंने अपने लोगों को खोया है। यही कारण है कि “दिमागी नक्सलवाद” किसी के लिए गर्व करने का विषय नहीं हो सकता।

नक्सली हिंसा केवल गोलियों और विस्फोटों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने बस्तर के सामान्य जनजीवन, आजीविका और विकास की प्रक्रिया को भी लंबे समय तक प्रभावित किया है। इसलिए नक्सलवाद पर होने वाली किसी भी राजनीतिक या वैचारिक चर्चा में उन लोगों की आवाज को स्थान मिलना चाहिए, जिन्होंने इस हिंसा को प्रत्यक्ष रूप से झेला है।

उन्होंने राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवी वर्ग से अपील की – नक्सली विचारधारा और “दिमागी नक्सल” जैसे विषयों को केवल राजनीतिक विमर्श के चश्मे से न देखा जाए, बल्कि उन परिवारों की आंखों से भी देखा जाए. जिन्होंने इस हिंसा की वास्तविक कीमत चुकाई है।

बस्तर शांति समिति ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र अब हिंसा और भय से आगे बढ़कर शांति, विश्वास, सुरक्षा और विकास की दिशा में अपना भविष्य देखना चाहता है।

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