भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन का आधार है गुरु-शिष्य परम्परा – आचार्य डॉ. रघुवीर गोस्वामी

भोपाल, 29 जुलाई 2026।

भारतीय ज्ञान परम्परा विभाग, शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार) के सहयोग से दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान (DTSS) एवं शासकीय हमीदिया महाविद्यालय, भोपाल के संयुक्त तत्वाधान में “गुरु पूर्णिमा का महत्व एवं गुरु-शिष्य परम्परा” विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया।

महर्षि सान्दीपनि गुरुपर्व के अंतर्गत आयोजित व्याख्यान में मुख्य वक्ता राष्ट्रपति सम्मान से विभूषित आचार्य डॉ. रघुवीर गोस्वामी रहे। मुख्य अतिथि दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा, विशिष्ट वक्ता डॉ. अशोक शर्मा (प्राध्यापक, सैन्य विज्ञान), डॉ. रचना मिश्रा (प्राचार्य, शासकीय हमीदिया महाविद्यालय) तथा प्रो. अल्पना त्रिवेदी (विभागाध्यक्ष, भूगोल) मंचासीन रहे।

स्वागत भाषण में डॉ. रचना मिश्रा ने कहा कि गुरु-शिष्य परम्परा भारत की प्राचीनतम सांस्कृतिक धरोहर है। भारतीय चिंतन ने केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व में गुरु का स्वरूप देखा है।

मुख्य वक्ता आचार्य डॉ. रघुवीर गोस्वामी ने कहा कि सनातन परम्परा सृष्टि के प्रारम्भ से चली आ रही जीवन-पद्धति है। गुरु वह है जो अज्ञानरूपी अंधकार का नाश कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विस्तार कर ज्ञान को जनसामान्य तक पहुँचाने का महान कार्य किया। वेदों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ऋग्वेद स्तुति, यजुर्वेद यज्ञ एवं संस्कार, सामवेद संगीत तथा अथर्ववेद चिकित्सा विज्ञान का आधार है। वेदव्यास ने वेदों का विस्तार किया, 18 पुराणों की रचना की तथा महाभारत जैसे महाग्रंथ का प्रणयन किया।

उन्होंने कहा कि गुरु केवल दीक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि माता-पिता, दादा-दादी और जीवन का मार्गदर्शन करने वाले सभी श्रेष्ठजन गुरु हैं। गुरु शिष्य के जीवन के ताप और संताप को दूर कर उसे श्रेष्ठ जीवन की दिशा देता है। स्वामी विवेकानंद के “स्वयं को जानो” के संदेश का उल्लेख करते हुए युवाओं से राष्ट्र, समाज और चरित्र निर्माण के लिए स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का संरक्षण और संवर्धन गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से ही संभव है।

विशिष्ट वक्ता डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि गुरु केवल शिक्षा या दीक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की दिशा और दृष्टि देने वाला गुरुतत्व है। उन्होंने कहा कि “मैं कौन हूँ?” और “मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?” इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रेरणा गुरु से ही प्राप्त होती है। भारतीय संस्कृति में गुरु व्यक्ति नहीं, बल्कि आदर्श, कार्य और सिद्धांत का प्रतीक है। भगवान दत्तात्रेय द्वारा बताए गए प्रकृति के 24 गुरुओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रकृति से सीखने की भारतीय परम्परा पर प्रकाश डाला। उन्होंने रामकृष्ण-विवेकानंद, चाणक्य-चंद्रगुप्त जैसे गुरु-शिष्य संबंधों को प्रेरक उदाहरण बताया।

मुख्य अतिथि डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा ने कहा कि सांदीपनी गुरु-पर्व केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि गुरु की भूमिका को पुनः समझने का अवसर है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय ज्ञान परम्परा को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाने का आह्वान करती है। इसके लिए शिक्षकों को पाठ्यक्रम की सीमाओं से बाहर निकलकर विद्यार्थियों को जीवन जीने की कला, कर्तव्यबोध और मूल्यपरक दृष्टि प्रदान करनी होगी।

उन्होंने महर्षि सांदीपनी और भगवान श्रीकृष्ण का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चा गुरु केवल विषय-ज्ञान नहीं देता, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने की दृष्टि देता है। प्राध्यापकों से आह्वान किया कि वे विद्यार्थियों से आत्मीय संवाद स्थापित करें, उनकी क्षमताओं को पहचानें तथा उनके व्यक्तित्व के समग्र विकास में मार्गदर्शक की भूमिका निभाएँ। आज आवश्यकता ऐसा गुरु बनने की है जो विद्यार्थियों को केवल सफल नहीं, बल्कि सार्थक जीवन की दिशा दे सके।

कार्यक्रम का संचालन नीरज धाकड़ ने किया तथा अध्यक्षीय उद्बोधन प्रो. अल्पना त्रिवेदी ने दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्राध्यापक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।

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