राजराजेश्वर वेश में महाप्रभु श्री जगन्नाथ का दर्शन

पुूरी, 26 जुलाई 2026,

देवशयनी एकादशी के पावन अवसर पर पुरी के श्री मंदिर के सम्मुख रथों पर विराजमान तीनों विग्रहों का स्वर्ण वेश में दर्शन करने के लिए लाखों की संख्या में भक्त पुरी पहुंचे। यह महाप्रभु का राजराजेश्वर वेश कहलाता है, जिसमें तीनों विग्रह (भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा) को स्वर्ण आभूषणों से सज्जित किया जाता है। लगभग 2 कुंतल आठ किलोग्राम वजन के 138 प्रकार के सोने के आभूषण से तीनों विग्रहों को पहनाए जाते हैं। शुद्ध सोने से निर्मित श्रीपयर, श्रीभुज, किरीट के अलावा ओडिआणी, सूर्य चन्द्र, कर्ण, घाघरा माल, कदम्ब माल, तिलक, कमरपट्ट, आयुधों से सज्जित रथारुढ़ भगवान के मनमोहक वेश का दर्शन दुर्लभ माना जाता है। साल भर में महाप्रभु को पांच बार स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है, लेकिन इनमें से सबसे ज्यादा सोने के आभूषण देवशयनी एकादशी पर होते हैं। इसे स्थानीय भाषा में [बड तथाऊ] वेश कहा जाता है।

प्राचीन काल में पुरी के राजा जब-जब दूसरे राज्यों पर विजय प्राप्त करके आते थे तो वहां से लाए गए स्वर्ण मुकुट, अन्य सोने की सामग्रियां महाप्रभु को भेंट कर दी जाती थीं। बाद में उसे पिघला कर महाप्रभु के आभूषण तैयार किए गए। यह एक ऐसा दुर्लभ वेश होता है, जिसे देखने लाखों की संख्या में भक्त पुरी पहुंचते हैं।

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