मांदरी की थाप में लौटती लोक-स्मृतियां

‘रंग तरंग’ ने विलुप्ति की ओर बढ़ रहे लोक वाद्यों को दिया जीवन का नया मंच, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत से नई पीढ़ी को जोड़ने की पहल

 

रायपुर।
मांदरी की थाप पड़ी और वातावरण जैसे अचानक बदल गया। ढोलक की ताल ने उसका साथ दिया तो पूरा परिसर छत्तीसगढ़ के गांवों, उत्सवों और लोकजीवन की उन स्मृतियों से भर उठा, जो आधुनिकता की तेज रफ्तार में कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। यह केवल संगीत की प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों और अपनी सांस्कृतिक स्मृति से फिर जुड़ने का एक अवसर था।

रंग तरंग’ कार्यक्रम का तीसरा और अंतिम दिन पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों की इन्हीं धुनों के नाम रहा। मांदरी और ढोलक की पारंपरिक ताल के साथ शुरू हुए कार्यक्रम में कलाकारों ने ऐसी प्रस्तुतियां दीं कि दर्शक देर तक लोक संगीत की लय में बंधे रहे। वाद्ययंत्रों की ध्वनि, कलाकारों की साधना और दर्शकों की तालियों ने मिलकर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की एक जीवंत तस्वीर सामने रख दी।

वाद्ययंत्र नहीं, लोकजीवन की धड़कन हैं ये

लोक वाद्ययंत्रों को केवल संगीत के उपकरण मानना उनके महत्व को सीमित कर देना होगा। मांदरी हो, ढोलक हो या किसी अंचल में पीढ़ियों से बजाया जाता कोई अन्य पारंपरिक वाद्य—इनके भीतर उस समाज की जीवनशैली और स्मृतियां सुरक्षित रहती हैं।

किसी गांव का उत्सव, किसी लोकपर्व की उमंग, विवाह का उल्लास, सामूहिक नृत्य, खेत-खलिहान की दिनचर्या और लोकगीतों की भावनाएं—इन सबके साथ इन वाद्यों की अपनी एक दुनिया रही है। इनकी थाप में वह सामुदायिक जीवन सुनाई देता है, जिसकी पहचान केवल लिखित इतिहास में नहीं, बल्कि लोक परंपराओं में भी दर्ज है।

यही कारण है कि जब कोई पारंपरिक वाद्य विलुप्त होता है तो केवल एक वाद्य नहीं खोता, उसके साथ उससे जुड़ी धुन, तकनीक, स्मृति और एक पूरी सांस्कृतिक परंपरा भी कमजोर पड़ती है।

‘रंग तरंग’ ने दी परंपरा को मंच की नई रोशनी

इसी चुनौती के बीच ‘रंग तरंग’ जैसे आयोजन महत्वपूर्ण हो जाते हैं। कार्यक्रम ने पारंपरिक लोक वाद्यों को संग्रहालय की वस्तु बनकर रह जाने के बजाय जीवंत कला के रूप में मंच दिया।

तीसरे दिन रायपुर के वायलिन वादक डॉ. के. रोहन नायडू, अंबिकापुर के तबला वादक नासिर खान, बालोद के पारंपरिक लोक वाद्य कलाकार संजू कुमार सेन तथा गरियाबंद के पारंपरिक लोक वाद्य कलाकार प्रेम यादव ने प्रस्तुतियां दीं।

अलग-अलग अंचलों से आए कलाकारों की प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता के अलग-अलग स्वर सुनाई दिए। दर्शकों ने कलाकारों की प्रस्तुतियों का तालियों से स्वागत किया और लोक वाद्यों की धुनों के प्रति अपनी आत्मीयता व्यक्त की।

नई पीढ़ी के लिए जरूरी है यह सांस्कृतिक परिचय

आज की पीढ़ी का संगीत अनुभव तेजी से बदल रहा है। डिजिटल माध्यमों और आधुनिक वाद्ययंत्रों ने संगीत की दुनिया को व्यापक बनाया है, लेकिन इसी परिवर्तन के बीच पारंपरिक लोक वाद्यों की पहचान को बचाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

संस्कृति संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि लोक वाद्ययंत्र और पारंपरिक लोक कलाएं सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन्हें संरक्षित रखना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे आयोजन लोक परंपराओं को मंच देने के साथ कलाकारों को प्रोत्साहित करने और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

दरअसल, संरक्षण केवल वाद्ययंत्रों को सुरक्षित रखने से नहीं होगा। उन्हें बजाने वाले हाथ चाहिए, सुनने वाले कान चाहिए और सीखने वाली नई पीढ़ी चाहिए। तभी परंपरा संग्रहालय की दीवारों से निकलकर जीवन का हिस्सा बनी रह सकेगी।

चार अंचलों से उठे सुर, एक संस्कृति में मिले

‘रंग तरंग’ की एक बड़ी विशेषता यह भी रही कि इसमें छत्तीसगढ़ के अलग-अलग क्षेत्रों से आए कलाकारों को मंच मिला। रायपुर, अंबिकापुर, बालोद और गरियाबंद से आए कलाकारों ने अपनी-अपनी कला के माध्यम से यह दिखाया कि भौगोलिक विविधता के बावजूद लोक संस्कृति की आत्मा एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में बंधी हुई है।

मांदरी और ढोलक की थाप से लेकर तबले और वायलिन के सुरों तक कार्यक्रम ने परंपरा और वर्तमान के बीच संवाद का अवसर दिया। यही संवाद किसी संस्कृति को जड़ नहीं, बल्कि जीवंत बनाता है।

सांस्कृतिक विरासत बचाने का संकल्प

कार्यक्रम में समाजसेवी उदयभान, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान सहित अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। संस्कृति प्रेमियों ने कलाकारों का उत्साहवर्धन किया और पारंपरिक लोक कलाओं तथा लोक वाद्ययंत्रों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता रेखांकित की।

‘रंग तरंग’ का अंतिम दिन समाप्त हुआ, लेकिन मांदरी और ढोलक की वह थाप देर तक वातावरण में बनी रही। वह थाप जैसे यह कह रही थी कि लोक संस्कृति अतीत की स्मृति मात्र नहीं है; वह वर्तमान की चेतना और भविष्य की पहचान भी है।

जरूरत सिर्फ इतनी है कि विलुप्ति की ओर बढ़ती इन धुनों को सुनने के लिए हम ठहरें, इन्हें सीखने वालों को मंच दें और अगली पीढ़ी के हाथों में फिर वही वाद्य सौंपें, जिन्हें हमारे पुरखों ने अपनी संस्कृति की धड़कन बनाकर रखा था।

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