प्रधानमंत्री आवास योजना ने बदली वनांचल के मंशाराम के परिवार की जिंदगी

टपकती छत से पक्के आशियाने तक: मंशाराम के सपनों को मिला नया आकार

 

अब सुरक्षित छत के नीचे संवर रही मिट्टी के शिल्प की दुनिया

बालोद |कभी बारिश की बूंदें मंशाराम के घर की छत से टपकती थीं और उन्हीं बूंदों के साथ उनकी मेहनत से तैयार मिट्टी के खिलौने, मूर्तियां और बर्तन भी खराब हो जाते थे। कच्चे घर की सीलन उनके परिवार के लिए सिर्फ परेशानी नहीं थी, बल्कि उनकी आजीविका पर भी सीधा असर डालती थी।

बालोद जिले के डौण्डी विकासखंड के ग्राम कुमुड़कट्टा में रहने वाले कुम्हार मंशाराम के लिए पक्का घर लंबे समय से एक सपना था। उम्र के इस पड़ाव में अपनी सीमित आय से पक्का मकान बनाना आसान नहीं था। लेकिन प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण ने उनके इस सपने को हकीकत में बदल दिया।

आज मंशाराम के पास पक्की छत है और उसी सुरक्षित छत के नीचे उनकी पारंपरिक कुम्हारी भी नए भरोसे के साथ आगे बढ़ रही है।

बारिश में घर नहीं, आजीविका भी टपकती थी

मंशाराम वर्षों से कुम्हारी और कृषि मजदूरी के सहारे परिवार का भरण-पोषण करते रहे हैं। मिट्टी को आकार देना उनके लिए केवल पुश्तैनी काम नहीं, बल्कि परिवार की आय का महत्वपूर्ण साधन है।

तीज-त्योहारों के मौसम में मिट्टी की मूर्तियों, खिलौनों और बर्तनों की मांग बढ़ जाती है। लेकिन यही समय उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती भी लेकर आता था। बारिश के मौसम में कच्चे मकान की सीलन और टपकती छत के कारण तैयार उत्पाद खराब हो जाते थे।

मेहनत कई दिनों की होती और एक बारिश उसे पलभर में नुकसान में बदल देती।

प्रधानमंत्री आवास ने बदली तस्वीर

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत मिले सहयोग से मंशाराम ने अपनी जमा पूंजी मिलाकर पक्का मकान तैयार किया। अब उनका परिवार मौसम की मार से काफी हद तक सुरक्षित है।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उनकी आजीविका में आया है। जिस कच्चे घर में मिट्टी के उत्पादों को सुरक्षित रखना मुश्किल था, वहीं अब पक्के मकान ने उन्हें काम के लिए बेहतर और सुरक्षित वातावरण दिया है।

मंशाराम अब बिना मौसमी रुकावट के अपने पारंपरिक शिल्प को आगे बढ़ा पा रहे हैं और अपनी आमदनी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

एक परिवार, कई योजनाओं का सहारा

मंशाराम के परिवार की कहानी केवल एक आवास मिलने की कहानी नहीं है। उनके परिवार को शासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ मिल रहा है।

भूमिहीन होने के कारण मंशाराम को पंडित दीनदयाल उपाध्याय भूमिहीन कृषि मजदूर कल्याण योजना के तहत प्रतिवर्ष 10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता मिल रही है।

वहीं उनकी पत्नी रामकली को महतारी वंदन योजना के तहत प्रतिमाह आर्थिक संबल प्राप्त हो रहा है।

इस तरह आवास, आर्थिक सहायता और महिला-केंद्रित आर्थिक संबल ने परिवार के लिए आजीविका और सुरक्षा का एक संयुक्त आधार तैयार किया है।

रामकली बोलीं—‘विष्णु भैया ने दिया पक्का आवास’

मंशाराम की पत्नी रामकली के लिए पक्का घर वर्षों की कठिनाइयों के बाद मिली बड़ी राहत है। उनका कहना है कि लंबे समय तक परिवार ने कच्चे मकान में मुश्किलों के बीच जीवन बिताया। बारिश में घर की परेशानी बढ़ जाती थी और काम भी प्रभावित होता था।

रामकली ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पक्का आवास और महतारी वंदन योजना का लाभ मिलने से उनकी जिंदगी आसान हुई है।

उनके शब्दों में इस बदलाव का सबसे सरल सार है—“विष्णु भैया ने दिया पक्का आवास।”

जब पक्की छत ने हुनर को भी दिया सहारा

मंशाराम की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आवास मिलने से केवल रहने की स्थिति नहीं बदली, बल्कि उनके पारंपरिक हुनर को भी नया आधार मिला।

कुम्हारी जैसे पारंपरिक शिल्प मौसम और स्थान दोनों पर निर्भर करते हैं। सुरक्षित कार्यस्थल और तैयार उत्पादों को रखने की सुविधा मिलने से शिल्पकार की मेहनत को नुकसान से बचाया जा सकता है।

मंशाराम के लिए पक्का मकान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब उनकी छत और उनकी आजीविका—दोनों अधिक सुरक्षित हैं।

योजनाओं का असर तब दिखता है, जब जीवन बदलता है

सरकारी योजनाओं की सफलता केवल आंकड़ों में नहीं मापी जाती। उसका वास्तविक अर्थ तब सामने आता है, जब किसी जरूरतमंद परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी में बदलाव दिखाई देता है।

मंशाराम का परिवार इसका एक उदाहरण है। एक तरफ प्रधानमंत्री आवास योजना ने उन्हें सुरक्षित आशियाना दिया, दूसरी तरफ भूमिहीन कृषि मजदूर कल्याण योजना से आर्थिक सहायता और महतारी वंदन योजना से रामकली को आर्थिक संबल मिला।

इन योजनाओं के सम्मिलित प्रभाव ने परिवार को केवल राहत नहीं दी, बल्कि स्वाभिमान के साथ अपनी आजीविका आगे बढ़ाने का अवसर भी दिया है।

मिट्टी को आकार देने वाले हाथों को मिला मजबूत आधार

मंशाराम वर्षों से मिट्टी को आकार देकर खिलौने, मूर्तियां और बर्तन बनाते रहे हैं। अब उनके अपने पक्के घर ने उनके जीवन को भी एक नया आकार दिया है।

कच्ची दीवारों, सीलन और टपकती छत की चिंता पीछे छूट रही है। सामने है सुरक्षित घर, अपने हुनर को आगे बढ़ाने का अवसर और परिवार के बेहतर भविष्य की उम्मीद।

मंशाराम के घर की पक्की छत केवल ईंट और सीमेंट से बनी संरचना नहीं है। यह उस भरोसे की छत है, जिसके नीचे एक पारंपरिक कारीगर अपने हुनर और परिवार—दोनों का भविष्य संवारने में जुटा है।

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