23 अक्टूबर 2012 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी की सुदर्शन जी को दी गई भावांजलि 

पूजनीय सुदर्शनजी के नाम के पीछे स्वर्गीय लगाने की आदत होने में, बहुत समय लगेगा। उनके सान्निध्य में जितने लोग आये हैं वे उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। और सुदर्शनजी का जाना इतना अचानक हो गया कि वे अब नहीं है, इसकी भी आदत करनी पड़ेगी। ये तो मेरा भाग्य है कि उन्होंने मुझे सरसंघचालक बनाया और वे मेरे लिए उपलब्ध रहे इसलिये इस पद का गुरुभार सिर पर आने पर भी मैं आश्वस्त था, निश्चिंसत था कि कुछ कठिनाई आ गई तो फोन करके पूछ लेंगे। कल मिल लेंगे। परंतु वे अब हमारे बीच नहीं  हैं। इस वज्रपात से अब थोड़ा-थोड़ा संभलने लगे हैं तब हममें से किसी किसी को यह भी स्मरण में आता है कि कैसे कुछ मास पूर्व से एक-एक परिचित व्यक्ति व परिवार को मिलकर आने का क्रम उन्होंने बनाया था। वे अपनी आयु ९२ वर्ष तक रहेगी, ऐसा कहते थे, यह भी सत्य है।

किसी भी संकल्प को धारण करते ही उसको अवश्य सफल कर सकने का आत्मविश्वास उनके मन में स्वयं ही भर जाता था। लगभग एक वर्ष पहले तिनसुकिया (असम) में प्रांत प्रचारकों की बैैठक समाप्त कर बहुत सारे तरुण बंधुओं के साथ वे भी परशुराम कुंड की यात्रा करने गये। उनके स्वास्थ्य व आयु को ध्यान में रखकर सभी ने उनको कुंड के शीतल जल में स्नान करने का तथा इस प्रकार कुंड से मंदिर तक की दीर्घ, खड़ी चढ़ाई टालने का अनुरोध किया था। वहां पहुंचकर कई तरुण कुंड में न उतरते सीधे मंदिर दर्शन कर वापस हुए, परंतु सुदर्शनजी ने ३०० फीट गहरी खाई में स्थित कुंड के वेगवान तथा हड्डी में कंपकंपी भर देनेवाले शीतल जल में उतरकर डुबकी लगाई, फिर खड़ी चढ़ाई चढ़कर ऊपर मंदिर में दर्शन किया व सहज रूप से तैयार खड़े वाहन में आकर बैठ गये। उनकी इस निर्भयता व अदम्य आत्मविश्वाशस को नियति केवल इस बार ही प्रथम व आखिरी बार ठग पाई।

वे चंद्रपुर के ज्युबिली हाईस्कूल से शालांत परीक्षा उत्तम रीति से उत्तीर्ण कर चुके थे। मेरा अनुमान है कि चंद्रपुर के वास्तव्य में उनका हमारे घर में आना-जाना रहा ही होगा। मैं आयु में बहुत छोटा था। कभी हमारे घर में चर्चा निकली कि एक सुदर्शन मेरिट में आये थे, जो अब प्रांत प्रचारक बन गये। पिताजी ने मुझे कहा, ‘देखो, अच्छा पढ़ो-लिखो और प्रचारक हो जाओ। प्रचारक बन जायें तो भी पढ़ने-लिखने में अच्छा होना आवश्यक है।’ उस समय मैं बालक था। सोचा, होंगे कोई सुदर्शन!

उन्हें देखने का प्रथम अवसर

उन्हें देखने का प्रथम अवसर मुझे १९७१ में प्राप्त हुआ। उत्कल प्रांत में घोष सिखाने के लिए मुझे शिक्षक के रूप में भेजा गया। मैं नागपुर में वेटरनरी कॉलेज में प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था। तो गर्मी की छुट्टी में संघ शिक्षा वर्ग के समय घोष शिक्षक के नाते मुझे उत्कल प्रांत के वर्ग में भेजा गया। उस समय तक मैं संघ का कार्यकर्ता बन चुका था। इसलिये अपने शारीरिक प्रमुख सुदर्शनजी हैं, इतना तो पता था परंतु देखा कभी नहीं था। उन्हें देखते ही किसी के मन में सबसे पहले जिस चीज की छाप पड़ती थी, वह है उनकी प्रतिभा। उनका ज्ञानयोग, जिसे  सब जानते हैं। दुनिया  में जहॉं-जहॉं वे गये उनका ज्ञानयोग प्रसिद्ध है। कितने विषयों के वे ज्ञाता थे। कितनी सारी बातें वे जल्दी पकड़ लेते थे। कितना गहन अध्ययन करते थे। इसी कारण अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे।

वहां पर वर्ग में आये तब वे शारीरिक प्रमुख थे, तो शारीरिक प्रमुख की बिल्कुल छोटी-छोटी बारीकियां, उसे किस ढ़ंंग से सिखाना चाहिए, इसके नये-नये गुर, स्वयं द्वारा किये गए प्रयोग, कोई भी शारीरिक कृति वैसी ही क्यों करनी है आदि बातें तर्क पूर्वक बारीकियों में जाकर समझाते व कराते थे। वैसे, शारीरिक विभाग तो एकदम सरल विभाग है यानी आज्ञा मिली और उसका पालन करो। ‘ऐसा क्यों करना है?’... पूछना नहीं पड़ता। वहां ये समझाने की आवश्यकता नहीं रहती। लेकिन वे समझाते थे कि इसके पीछे तर्क है, अनुभव है,.. इस कारण ऐसा करना है, तो करनेवाला मन में विश्वाउस लेकर अभ्यास करता था। शारीरिक में भी उनका इतना गहरा चिंतन था। ये दण्ड कैसे घुमेगा तो हवा में आवाज आयेगी, लेकिन दंड नहीं लगेगा और वह बिना आवाज की लाठी। जैसे भगवान की होती है-  के जैसे, कैसे घुमाना कि जहॉं लगेगा वहां तोड़ देगा, ऐसी कई सूक्ष्म बातें वे बताते थे। एक सामान्य विषय को सिखाने के बारे में उन्होंने कितना परिश्रमपूर्वक सोचा होगा इसकी कल्पना हम कर सकते हैं।

असम में भेजा तो असम के विषय में अध्ययन करके उन्होंने जो-जो बातें मार्गदर्शक के रूप में बतायीं वह आज भी हमारे लिए दिशादर्शक हैं। किसी भी समस्या के मूल में जाकर उसका अध्ययन करना, उनका स्वभाव था। जब वे बौद्धिक प्रमुख बनें तब उन्हें एक विषय रखना था कि सांस्कृतिक आक्रमण कैसे हो रहा है, इतिहास को किस प्रकार बिगाड़ा जा रहा है? इसके अध्ययन के लिए वे चेन्नई गये। वहां के सरकारी ग्रंथालय/लायब्ररी में बैठकर उस समय के सारे कागज पत्र निकालकर उसका अध्ययन किया। और बड़े तर्क के साथ उदाहरण सहित एक घंटे का भाषण दिया। प्रत्येक विषय में वे ऐसा करते थे। उनके अनथक परिश्रम के कारण सभी मामलों में उनकी अद्भुत प्रतिभा दिखती थी। 

पंजाब के विषय में उन्होंने जो अध्ययन किया उसके कारण कितने ही सिख विद्वानों से उन्होंने चर्चा की, उनसे विषय समझ लिया। सब प्रकार के सिखी से संबंधित ग्रंथ और उनका इतिहास समझ लिया। गुरुवाणी का अध्ययन किया। उसका अर्थ, जो वे समझते थे वैसा है कि नहीं, यह जानने के लिए अधिकृत व्यक्तियों से मिले और उनसे गुरुवाणी का अर्थ ठीक तरह से समझ लिया। यह पूजनीय सुदर्शनजी की ज्ञानयोग की प्रतिभा थी। इसके पीछे बहुत बड़ा परिश्रम था।

उनका हर विषय में पारंगत होना, अधिक गति से अनेक विषयों को समझ लेना, यह सबके लिए साध्य नहीं है। लेकिन जिनको साध्य करना है वे उनके कार्य परिश्रम को देखकर सीख सकते हैं।इसके लिए मा. बाळासाहेब अंग्रेजी में कहते थे- "10% Inspiration and 90% Perspiration."" उत्कल के उस वर्ग में उन्होंने शारीरिक की छोटी-छोटी बातें हमें बतायी। तब वे कितना परिश्रम करते हैं यह ध्यान में आया। वे सुबह ३ बजे हमारा वर्ग लेते थे। ३ से ४.४५ तक संघ स्थान पर अभ्यास चलता था। संघस्थान ७.३० बजे समाप्त होता था। सायं संघस्थान के पहले वर्ग हो नहीं सकता था तो बाद में वर्ग लेते थे, यानी दिन में वे ४ घंटे हमें सिखाते थे। और उनका सिखाना यानी सतत् परिश्रम ही था। उन २-४ घण्टे में हम लोगों को सांस लेने की भी फुरसत नहीं मिलती थी! लेकिन सुबह ३ बजे जब वे आते थे तो अपना स्नान, ध्यान और स्वयं का व्यायाम करके पुरी तैयारी के साथ। इस बात से पता चलता है कि वे कितने बजे उठते थे और रात्रि के कार्यक्रम में भी उपस्थित रहते थेे, यह उनकी विशेषता थी। अपने शरीर को कार्य के लिये आग्रहपूर्वक चलाने की उनकी क्षमता बड़ी अद्भुत थी।

आराम करना है तो आराम भी कर सकते थे। एक बार उनके जीवन का प्रसंग हमने पढ़ा है- गुरुजी प्रवास पर जा रहे थे उस समय वे प्रांत प्रचारक थे। उस भागदौड़ में उन्होंने खूब परिश्रम किया। शायद १-२ रात उनकी नींद नहीं हुई और एक जगह भोजन करके निकल जाना था। थोड़ा सुस्ता गये तो सो गये। जाने का समय हो गया तो गुरुजी ने कहा- ‘सुदर्शन सो रहा है, उसको मत जगाओ।’ सुदर्शनजी रातभर सोये रहे और दूसरे दिन वे फिर चले गये। इस प्रकार वे सो भी सकते थे, लेकिन कार्य करने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। अपने शरीर को वे कैसे चलाते थे, पता नहीं! उनके पैरों में खुजली होती थी। डॉ. विलास डांगरे से उन्होंने दवाई ली। डॉ. साहब ने कहा- ‘आप प्रवास पर जा रहे हैं। ये थोड़ा एग्रीवेशन करता है। होमियोपैथी की दवाई है।’ यह कुछ ज्यादा पोटेन्सी की थी। शायद २००। उन्होंने कहा- ‘दे दीजिए। मैं देख लूँगा।’ वह दवाई उन्होंने ली और वे प्रवास के लिए निकल गए।

आगे के चार माह उन्हें भयंकर कष्ट हुआ। हाथ -पैर पर फफोले आ गए। हर दो घंटे के बाद गरम पानी से स्नान करना पड़ता था। दिन में चार बार पट्टीयॉं बदलनी पड़ती थी। परंतु प्रवास का एक भी कार्यक्रम उन्होंने रद्द नहीं किया। वे कहते थ - ‘वो अपना काम कर रहा है और ये तो रोग नहीं है ये उसका उपचार चल रहा है।’

मैंने कहा- ‘अरे भई, आपको इतना कष्ट?...’ 
‘कष्ट क्या? मैं अपने सब काम कर रहा हूँ। कुछ दिखता है क्या कष्ट आपको?’ - उन्होंने कहा।
 ‘लेकिन हो रहा है ना?’ मैंने कहा।

उन्होंने कहा, ‘हो रहा है तो मैं सहन कर लूँगा। आप इसकी चिंता न करें।’ कितना कष्ट वे सहन करते थे! उनका व्यायाम व दो समय की संध्या का नियम जीवन के अंतिम दिन तक चलता रहा। रेल गाड़ी से सतत् यात्रा भी उस नियम में बाधा नहीं बन सकी। अपवाद, हृदयाघात के बाद स्वास्थ्य लाभ के लिए दो महिनों का रहा।

उनके ज्ञानयोग के पीछे था उनका कर्मयोग और उनके पास भक्तियोग भी था। बच्चों में कैसे वे घूलमिल जाते थे, कैसी कहानियां बताते थे! स्वयंसेवक के प्रति कितना स्नेहभाव उनमें था! ये बहुत कम लोगों को मालूम था, क्योंकि वे दिखाते नहीं थे। यह दिखाने की बात थी भी नहीं। लेकिन सहज रूप से, वे इसे सबके सामने प्रकट नहीं होने देते थे। 

एक प्रचारक रोग से पीड़ित थे। दुर्भाग्य से वह बच नहीं सके, उनका देहांत हो गया। तब हम लातूर में थे। वहां बैठक के दौरान यह समाचार प्राप्त हुआ। अब किसी को तो इस दु:खद क्षण में सांत्वना देने जाना ही  था। तो जाने के लिये जिनको फ्री कर सकते थे वे सुदर्शनजी ही थे। सरसंघचालक थे, अभिभावक के नाते उनका जाना ठीक भी था। तो उनको जाना है ये तय करके हमने उनको दु:खद समाचार बताया। २ घंटे बाद बाय रोड स्टेशन पर जाना था। अत: सारी व्यवस्था हो गयी। थोड़ी देर के बाद उनकी तैयारी हुई की नहीं ये देखने के लिये हमारे सहसरकार्यवाहजी गये तो उन्होंने देखा, खिड़की के सामने सुदर्शनजी बाहर मुँह करके खड़े हैं, दूर आकाश की ओर देख रहे हैं और उनकी आँखों से अश्रुपात हो रहा है। अब सहसरकार्यवाह सुदर्शनजी के साथ एक ही कार्यालय में रह चुके थे। उनको भी पता नहीं था कि सुदर्शनजी के मन में इतनी कोमलता है। वे जहां-जहां गये वहां अपनी छाप छोड़ गए। उनका परिश्रम, उनका आग्रह, छोटी-छोटी बातों को ठीक करने की उनकी जिद संघ में सर्वत्र परिचित है। बाहर थोड़ी-बहुत सबको मालूम है। लेेकिन उनके जीवन के एक प्रसंग से संघ के स्वयंसेवक अनभिज्ञ है।

एक रात वे प्रवास से आये। तब ९ बजे थे

एक रात वे प्रवास से आये। तब ९ बजे थे। आने के बाद उन्हें एक साधारण कागज में छपा हुआ विवाह का निमंत्रण मिला। उसी रात को विवाह था। किसी सरकारी ऑफिस के चौकीदार के घर पर विवाह था। उस चौकीदार का एक सरकारी ऑफिस के आहाते में ही एक छोटा-सा १५ बाय १२ फिट का कमरा था। यहीं उसका पूरा परिवार रहता था। वहीं विवाह होना था। उस घर का एक बालक शाखा में आता था। इस नाते पत्रिका शाखा के माध्यम से कार्यालय तक आयी। पत्रिका देखते ही सुदर्शनजी ने सबको तुरंत तैयार किया। सब ने सोचा कि कल जायेेंगे, अभी-अभी तो आये हैं प्रवास से। पर उन्होंने कहा, विवाह में बुलाया है, हमें आज ही जाना चाहिये। और सब विवाह स्थल के लिए निकल गये। आर्थिक दृष्टी से गरीब आदमी का विवाह था। जमाई जिस घर का था वह भी गरीब। तो बहुत ज्यादा कुछ नहीं था। ढंग का पंडित भी नहीं था। बारात आनेवाली थी। १५-२० लोग आयेंगे लड़की को ले जायेंगे। कोई ज्यादा विधि वगैरे नहीं था। सुदर्शन जी वहां पहुँच गये। पहुंचने पर देखा छोटा-सा घर है जो कुछ मेहमान थोड़े-बहुत आये हैं, सब वहीं हैं। वहॉं बहुत गंदगी फैली है। उन्होेंने सबको उठाया। ये अधिकार भी उनका रहता था। किसी को पराया नहीं मानते थे। इसलिये किसी को कुछ भी कहते थे और कराते भी थे। सबको उठाया वहॉं से। ‘चलो। चलो। सफाई करो’- ऐसा कहते हुए स्वयं हाथ में झाडू लेकर सफाई में जुट गए। लोगों को भी इस सफाई के कार्य में लगना ही पड़ा। आंगन-वांगन साफ किया। इतने में रात के १२ बज गए और बारात आ गयी। फिर वर के स्नान की विधि अभी बाकी थी। उन्होंने वर से कहा, जाओ, स्नान-वान करके आओ। वधु को भी यह कहकर भेज दिया कि स्नान करके आओ। और इसके बाद वर पक्ष, वधु पक्ष दोनों को बिठाकर उन्होंने एक घंटा भाषण दिया कि रात को विवाह करने से बिजली का खर्चा ज्यादा होता है। इसलिए इतनी रात को विवाह नहीं करना चाहिए। कम खर्चे में विवाह कैसे करना चाहिए, सब बताया। उन्होंने कहा, वैसे आपका विवाह बहुत सादगी से हो रहा है लेकिन ढंग से होना चाहिये और ऐसे कुछ खर्चे से बचत करके उसे किसी और कार्य में आप लगा सकते हैं। दोनों पक्षों को यह सब समझाकर वधु-वर को शाल-साड़ी आदि जो कुछ ले गये थे वो सब दिया। जितने मंत्र उन्हें आते थे वो सब पढ़े और आराम से विवाह सम्पन्न करा दिये। उस व्यक्ति के लिये यह तो चीरकालिक स्मृति हो गयी और हम लोगों के लिये एक वस्तुपाठ हो गया कि वे ऐसे अद्भुत सरसंघचालक हैं एक संगठन के। अपने दिमाग को वे ऐसे उच्च तात्विक विषयों में लगाकर दुनिया को भूल सकते थे, भूल भी जाते थे। लेकिन उनकी आत्मीयता सहजता से स्वभावत: प्रगट हो जाया करती थीं। सहज ही हृदय को छूकर बांध देती थी।

उनके अंत्य दर्शन के लिए एक बालक स्वयंसेवक आकर गया। वापस घर जाने पर किसी ने उसे पूछा- ‘‘कहां गये थे?’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘सुदर्शनजी का दर्शन कर आया। कुछ दिन पहले शाखा में आये थे उस दिन प्रार्थना मैंने गायी तो उन्होंने बाद में मुझे आधा घंटा बिठाकर मेरी प्रार्थना शुद्ध करवायी थी।’’ ऐसे व्यक्तिगत स्पर्श उनका स्वयंसेवकों के प्रति होता था। ये पहलु सबको बहुत ज्यादा ज्ञात नहीं हैं। लेकिन ये उनके ज्ञानयोग और कर्मयोग की तरह विस्तृत भक्तियोग है। अब ये हमारे लिए एक उदाहरण है और साथ-साथ एक विश्वानस मन में रहता है कि ऐसे बना जा सकता ह । ये जीवंत उदाहरण हमारे सामने है, ये असंभव बात नहीं है। इसके लिए किसी अवतारी पुरुष के अवतीर्ण होनेे की आवश्यकता नहीं है, ये हो सकता है। 

वे अत्यंत निर्मल व्यक्तित्व के धनी थे

वे अत्यंत निर्मल व्यक्तित्व के धनी थे, स्वभाव से एकदम सरल! उनका मन जैसे गंगा का पानी, उस पर पत्थर मारो, लकड़ी से आघात करो, वह टिकता नहीं है। चार क्षण के लिये तरंग उठती है और उसके बाद जल का प्रवाह अपने स्वभाव के अनुरुप बहता है। ऐसे हमारे सुदर्शनजी जब अपने पास थे तो हम सबके मन में एक भरोसा था। और वे अचानक चले गये।

अभी हाल ही में यहॉं डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति की बैठक हुई। उन्हें फिर से अध्यक्ष चुना गया था। उन्होंने कहा, कोई दूसरा अध्यक्ष चुनो, क्या जबतक मैं जिंदा रहूँगा तबतक मुझे ही अध्यक्ष रखोगे! और मैं सौ साल जिया तो? ऐसा कहकर गये। और बाद के प्रवास में रायपुर में प्राणायाम करते समय उन्होंने देह छोड़ दिया। तो ‘विना दैन्येन जीवनम्। अनायासेन मरणम्।’’ ऐसी उक्ति चरितार्थ हुई। अचानक जाने की खबर आयी तो क्षणभर तो विश्वानस ही नहीं हुआ। 

कुछ दिन पूर्व ही मैसूर में अपने वास्तव्य में वे नित्य क्रम के अनुसार प्रात:काल घूमने निकले। परंतु रास्ता भूलकर भटक गए थे। सारे देश में पांच छह घंटे बड़ी हलचल हुई। देशभर के स्वयंसेवकों का मन ना जाने कैसी-कैसी आशंकाओं से भर गया था। सुदर्शनजी के मिल जाने के बाद सब आश्व स्त हो गए थे। इस बार भी यह शोक समाचार आते ही कई जगह से फोन आए कि सत्य क्या है? बताना पड़ा। यहां नागपुर में अंतिम दर्शन करके लौटने वाले कई स्वयंसेवकों ने कहा, ‘विश्वाास ही नहीं होता कि वे चले गये।’ वास्तव में, विश्वा्स करने के लिए विश्वावस रखना होगा। लेकिन क्षति तो हुई है। अपना संघकार्य ईश्व रीय है।  व्यक्तिनिरपेक्ष और सामूहिक है। इसलिए उसमें कोई अपूरणीय क्षति नहीं होती। कार्य की चिंता नहीं है। लेकिन हम लोगों के मार्गदर्शन के लिए एक जो रूप सामने था उसका अभाव तो खलेगा न? एक के जैसा दूसरा आदमी भगवान किसी को पैदा नहीं करता और सुदर्शनजी की तरह बहुमुखी प्रतिभावाले व्यक्ति संसार में कम ही आते हैं। तो संघकार्य तो ठीक चलेगा। वो तो चला ही है और ध्येय की सिद्धि होने तक चलने वाला ही है। 


परंतु सुदर्शनजी पुन: नहीं मिलेंगे। सुदर्शनजी के लेख-भाषण पढ़ने को मिलेंगे। शारीरिक करते समय उनके द्वारा सीखाई गई छोटी-छोटी बातें याद आयेगी। उनकी कई ऐसी बातें स्मृति में अंकित रहेंगी। सुदर्शनजी याद आयेंगे लेकिन सुदर्शनजी को अब चित्रों के सिवा कहीं और देखने का दूसरा कोई अवसर ही नहीं है। सबके और हमारे मन की यह कमी अब पूरी होनी नहीं है। ये दुनिया का नियम है। सब व्यक्तियों के बारे में पीछे बचे लोगों को इस कमी को सहन करना ही पड़ता है। और ये बड़ा दुर्धर काम है मेरे जैसे के लिये। मेरा तो उनसे आत्मिय संबंध रहा है। वे शारीरिक प्रमुख से बौद्धिक प्रमुख बनें। उसके कुछ साल बाद मुझे सहशारीरिक प्रमुख बनाया। उसके पहले से संघशिक्षा वर्ग में शारीरिक में रुचि लेनेवाले व्यक्ति के रूप में उनसे बहुत संपर्क आया। १९७१ के बाद तो कई बार मिले। कई बार उन्होंने कान पकड़ा  छोटी-छोटी बातें ठीक की  कई बार उन्होंने गीत सीखाये। कई बार गीत कहलवाये। उसके बाद शारीरिक वर्ग से संबन्धित होने के नाते हर शारीरिक वर्ग में उन्हें बुलाते थे। वे आते थे और कई बातें बताते।

सुदर्शनजी को जब पहला हार्ट अटैक आया, तो उनसे सबसे पहले मिलने वाला अखिल  भारतीय अधिकारी मैं ही था। उस समय उनको २०० कदम चलने की अनुमति मिली थी। उपचार के बाद उनके निवास के प्रांगण में मैं जब उनसे मिलने गया था तो २०० कदम चल रहे थे। उन्होंने हाथ के इशारे से मुझे ‘रुको’ ऐसा कहा। तत्पश्चा त अपना चक्कर पूरा करने के बाद मेरे पास आये और कहा, २०० कदम पूर्ण होने तक सांस लेने का श्रम करना पड़ता है इसलिये मैं बोलता नहीं था, अब रूका रहा था। यह कारण (Explanation) बताने की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन वे इसका भी ध्यान रखते थे। बाद में झंडेवाला में रहता था तब उन्होंने कहा ‘मोहनराव, अब मैं इस बीमारी के कारण शारीरिक के काम का बिल्कुल नहीं रहा।’ बड़े दु:ख से कहा।

शारीरिक में उन्हें बड़ी रुचि थी। उन्होंने उसे हस्तगत किया था। दो साल एमरजन्सी के दौरान वे मीसा बन्दी थे तो शारीरिक की पुस्तकें साथ लेकर गये थे। अकेले सारा अभ्यास किया। एक-एक प्रयोग उन्होंने १०-१० हजार बार करके  देखा और उसमें सिद्ध हुए। इसलिए उन्होंने बड़े दु:ख से कहा कि ‘मैं शारीरिक के काम का नहीं रहा।’

मैंने कहा, - ‘देखेंगे।’ क्योंकि थोड़ा उनका स्वास्थ्य अच्छा होने के बाद वे फिर से शारीरिक में हिस्सा लेने लगे और स्वयं अभ्यास करके बताने लगे, सीखाने लगे। बिल्कुल अंतिम दिन तक जो बातें होनी चाहिये वो उत्कृष्ट होनी चाहिये, उसको ठीक करना चाहिए, ये उनका आग्रह रहता था। जाने के दिन रायपुर कार्यालय में प्रात: स्मरण में बैठे थे। वहां पर प्रात:स्मरण के दौरान एकात्मता स्तोत्र के एक श्लोन के उच्चार में एक स्वयंसेवक की विसर्ग की गलती हो गयी, तो प्रात:स्मरण के बाद उन्हांने सबको रोका और संस्कृत में उच्चारण के महत्व को बताते हुए ‘बलि:’,  इस  शब्द के सही उच्चारण का सभी को अभ्यास करवाया और पांच बार सबसे कहलवा लिया। तब सबको छुट्टी मिली। हर बात में जो करना है वह उत्कृष्ट करना है और किसी से करवाना है तो उसे उत्कृष्ट करने के लिए तैयार करे, ऐसा उनका आग्रह रहता था। 

ये उनकी जो सारी बाते हैं वह उसी ढंग से होती थी। ऐसी होते हुए देखना अब संभव नहीं और ये कमी पूरी होने वाली नहीं। इस बात की बड़ी टीस रहती है। कुछ लोग बता सकते हैं तो कुछ लोग व्यक्त नहीं कर पाते। उनके जाने पर देशभर के राष्ट्रीय जीवन से जुड़े समाजसेवियों तथा गणमान्य नागरिकों ने सहसंवेदना जतायी है। सुदर्शनजी गये, लेकिन उनको सच्ची श्रद्धांजलि उनके गुणों का अनुकरण कर उनके तत्वों पर चलकर ही अर्पित की जा सकती है। उन्हें औपचारिक श्रद्धांजली तो हम सभी अर्पित कर चुके हैं लेकिन सभी स्वयंसेवकों की ओर से उनको कृतिरूप श्रद्धांजली अर्पित की जायेगी, ऐसा विश्वा्स है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
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