अमेरिका के शिकागो में ११ सितम्बर, १८९३ को विश्व धर्म सम्मेलन का शुभारम्भ हुआ। पहले ही दिन स्वामी विवेकानन्द ने अपने सात मिनट के छोटे से व्याख्यान से विश्व को जीत लिया। “मेरे अमेरिका के बहनों और भाइयों...” कहकर उन्होंने अपना उद्बोधन प्रारम्भ किया, वहाँ उपस्थित सात हजार श्रोताओं ने खड़े होकर करतल ध्वनि से उनका अभिनन्दन किया। स्वामीजी के इस प्रसिद्ध एवं प्रथम सम्बोधन का यह प्रथम वाक्य, जिसने वहाँ के श्रोताओं के हृदय में मानों एक अद्भुत विद्युत तरंगों को प्रवाहित कर दिया। यह केवल उद्बोधन की मात्र एक शैली नहीं थी, अपितु स्वामीजी के उन शब्दों में भारत की महान आध्यात्मिक शक्तियां ही मुखरित हुर्इं। दो मिनट के बाद तालियों की गड़गड़ाहट थमने पर स्वामीजी ने एक संक्षिप्त भाषण दिया। यह ऐतिहासिक भाषण अंग्रेजी में दिया गया। प्रस्तुत है इस भाषण का हिन्दी अनुवाद :-  

“अमेरिकावासी बहनों और भाइयों, 

आपने जिस सौहार्द्र और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ! धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ! और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ। 

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मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रसारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने महान जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अबतक कर रहा है। भाइयों, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ, जिसकी आवृत्ति मैं अपने बचपन से करता रहा हूँ और जिसकी आवृत्ति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं : 

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्।

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।

- ‘जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, इसी प्रकार हे प्रभु! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अन्त में तुझ में ही आकर मिल जाते हैं।’ यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है, स्वतः ही गीता के इस अदभुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।

‘जो कोई मेरी ओर आता है चाहे किसी प्रकार से हो - मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न-भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है, उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही है, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे-पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है। यदि ये वीभत्स दानवी न होती, तो मानव-समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया है, और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटा-ध्वनि हुई है, वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का, तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होनेवाले मानवों की पारस्परिक कटुताओं का मृत्यु-निनाद सिद्ध हो।”१

अपने इस छोटे से किन्तु ऐतिहासिक भाषण को समाप्त कर स्वामी विवेकानन्द अपने स्थान पर आसीन हो गए। इसके उपरान्त भी श्रोतागण उनकी जय जयकार करते रहे। उनका सामीप्य प्राप्त करने एवं उनके वस्त्र भर को स्पर्श करने के लिए कई सौ लोग बैंचों को लांघ-लांघ कर उनके समीप आ गए थे। (सम्भवत: भीड़ के इस कृत्य पर रोक लगाने के लिए कुछ दिनों के उपरान्त प्रबन्धाधिकारियों ने मंच के सम्मुख यह सूचना-पत्र लगा दिया था कि ‘शिकागो डेली प्रेस’ के अधिकृत प्रतिनिधियों के अतिरिक्त अन्य किसी को भी प्रवेश यहाँ प्रवेश की अनुमति नहीं है।) जो भी हो, आगामी प्रात:काल स्वामीजी को ज्ञात हुआ कि वे प्रख्यात हो चुके हैं। किन्तु स्वामीजी के मन-मस्तिष्क में भारत की गरीब जनता की पीड़ा का चित्र उभर आया। उनकी इस स्थिति का मार्मिक वर्णन प्रो. शैलेन्द्रनाथ धर कृत “स्वामी विवेकानन्द समग्र जीवन दर्शन” के प्रथम खंड में किया गया है – 

“किन्तु धर्मसभा के इस प्रथम भाषण में अपने प्रति ज्ञापित किए गए श्रद्धा-सम्मान के सम्बन्ध में उनकी प्रतिक्रिया क्या थी? उस दिन के समापनोरान्त रात्रि के समय शयन-हेतु बिछौने पर लेटे-लेटे उनके मानस पटल पर अभाव-ग्रस्त भारत एवं प्राचुर्य-परिपूर्ण अमेरिका से सम्बन्धित दो नितान्त विरोधी अवस्थाओं के चित्र बलात् उजागर होने लगे। भारत की दरिद्रता एवं उसकी दुर्दशा पर गहन विचार करते-करते वे उस रात सो नहीं पाए थे..... आँसुओं से उनका तकिया भीग गया था..... और अन्तत: अत्याधिक भावाभिभूत हो जाने के कारण वे धरती पर गिर पड़े थे और वस्तुत: कष्ट-पीड़ित हुए धरती पर लोटते हुए रो-रोकर यह कहते कि, ‘‘माँ, मैं इस नाम-यश को लेकर क्या करूं, जबकि मेरे देशवासी घोर दरिद्रता में डूबे हुए हैं!...भारत के जन-जन का उद्धार कौन करेगा? हे माँ, मेरा मार्गदर्शन करो कि मैं अपने देशवासियों की सहायता कैसे करूं?’’२ 

स्वामीजी के इस प्रथम व्याख्यान का प्रभाव इतना जबरदस्त था कि शिकागो में सर्वत्र स्वामीजी के पोस्टर लग गए। समाचार पत्रों में स्वामीजी की प्रशंसा में खबरें प्रकाशित हुईं। ‘दी बोस्टन इवनिंग ट्रांस्क्रिप्ट’ पत्र में उनके बारे में लिखा गया था - “अपने अद्भुत विचारों तथा मोहक व्यक्तित्व के कारण वे महासभा में अत्यन्त लोकप्रिय हैं। उनके मंच से होकर गुजरने मात्र से लोग हर्षध्वनि करने लगते। हजारों व्यक्तियों द्वारा व्यक्त यह विशेष सम्मान - वे तनिक भी गर्व के बिना बाल-सुलभ संतोष के साथ स्वीकार करते हैं।”३ 

नार्थमप्टन डेली हेराल्ड के ११ अप्रैल, १८९४ ई. के अंक में लिखा गया था - “कार्यक्रम के अंत में ही विवेकानन्द का भाषण रखा जाता था, इसका उद्देश्य था लोगों को आखिरी तक बैठाए रखना। किसी गरम दिन जब किसी नीरस वक्ता के लम्बे भाषण के फलस्वरूप सैंकड़ों लोग सभागृह से बाहर निकलने लगते, तब उस विराट श्रोतृमण्डली को पकड़े रहने के लिए केवल इतनी घोषणा ही यथेष्ट होती थी अन्तिम प्रार्थना के पूर्व विवेकानन्द थोड़ा सा कुछ कहेंगे। और उन स्वनामधन्य व्यक्ति के पन्द्रह मिनट का व्याख्यान सुनने के लिए वे लोग घण्टों बैठे रहते।“४ 

उनके उदार एवं युक्तियुक्त चिन्तन के लिए उन्हें धर्म महासभा का सबसे प्रभावशाली वक्ता माना गया। अमेरिका की जनता और विश्वभर से आए विद्वानों के बीच स्वामी विवेकानन्द के रूप में “भारत की आध्यात्मिकता का प्रकाश” झलक रहा था। क्षयह धर्मसभा २७ सितम्बर तक चली। उन्हें लगभग प्रतिदिन व्याख्यान देना पड़ता था। सत्रह दिनों तक चली इस धर्म महासभा में प्रतिदिन तीन सत्र होते थे। धर्मसभा के साथ ही विज्ञान विभाग के सत्रों में भारी मात्रा में विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। स्वामीजी ने इन दोनों विभागों में व्याख्यान दिए। स्वामीजी उन स्वागत-समारोहों में भी अपने विचार रखते थे जिनका आयोजन विश्व-प्रदर्शनी के कोई न कोई अधिकारी इस उद्देश्य से करते थे ताकि सम्मेलन में भाग ले रहे सदस्यों का परिचय शिकागो के चुनिंदा प्रतिष्ठित व्यक्तियों को प्राप्त हो सके। 

 उद्घाटन दिवस के दौरान हुए अपने स्वागत के प्रत्युत्तर में दिए गए सम्भाषण के अतिरिक्त भी स्वामीजी ने इस सभा के सर्वांगीण प्रमुख मंच से जो पांच व्याख्यान दिए थे उनके विवरण समाचार पत्रों में प्रकाशित किए गए थे एवं उनके शीर्षक थे, - 

१) १५ सितम्बर : व्हाय वी डिसएग्री (हम असहमत क्यों होते हैं?); 

२) १९ सितम्बर : पेपर ऑन हिन्दूइज्म (हिन्दू धर्म पर निबन्ध); 

३) २४ सितम्बर : रिलिजन नॉट द क्राइंग नीड ऑफ इंडिया’ (भारत का प्रधान अभाव धर्म नहीं है); 

४) २६ सितम्बर : बुद्धइज्म, द फुलफिलमेन्ट ऑफ हिन्दूइज्म (बौद्ध धर्म : हिन्दू धर्म की निष्पत्ति) तथा 

५) सभा के अन्तिम दिवस में किया गया सम्बोधन, २७ सितम्बर।

स्वामीजी की “हिन्दू धर्म पर निबन्ध” की प्रस्तुति उनके विवेक, विद्वता और कुशल वक्तृता का महानतम प्रतीक है। इसमें वेद-उपनिषद्-गीता, आत्मा-परमात्मा, ज्ञान-विज्ञान-तकनीक आदि अनेक विषयों को तर्कसंगत और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस निबन्ध का बहुत महत्त्व है।

रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं, “शिकागो सम्मेलन में स्वामीजी ने जिस ज्ञान, जिस उदारता, जिस विवेक और जिस वाग्मिता का परिचय दिया, उससे वहां के सभी लोग मंत्रमुग्ध और, पहले ही दिन से, उनके भक्त हो गए। प्रथम दिन तो स्वामीजी को सबसे अंत में बोलने का अवसर इसलिए दिया गया था कि उनका कोई समर्थक नहीं था, उन्हें कोई जानता या पहचानता नहीं था। किन्तु, उसके बाद सम्मेलन में जो उनके दस-बारह भाषण हुए, वे भाषण भी उन्होंने प्रतिदिन सभा के अन्त में ही दिए, क्योंकि सारी जनता उन्हीं का भाषण सुनने को अंत तक बैठी रहती थी। उनके भाषणों पर टिप्पणी करते हुए 'द न्यूयार्क हेराल्ड' ने लिखा था कि ‘मत-पंथों की पार्लियामेंट में सबसे महान व्यक्ति विवेकानन्द हैं। उनका भाषण सुन लेने पर, अनायास, यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि ऐसे ज्ञानी देश को सुधारने के लिए मत प्रचारक भेजने की बात कितनी बेवकूफी की बात है’।”५ 

अमेरिका का वह श्रोता समाज जो केवल हठधर्मिता का दावा ही सुनते आया था, उसे स्वामी विवेकानन्द के वैचारिक प्रकाश में सहिष्णुता और सर्व-समावेशक भाव का दर्शन मिला था। धर्मसभा के अन्तिम दिन अर्थात २७ सितम्बर, १८९३ को पहली बार स्वामी विवेकानन्द के द्वारा धार्मिक एकता का सन्देश सुना- 

“...किन्तु, यदि यहाँ कोई यह आशा कर रहा कि यह एकता किसी एक धर्म की विजय और बाकी सब धर्मों के विनाश से सिद्ध होगी, तो उनसे मेरा कहना है कि ‘भाई, तुम्हारी यह आशा असम्भव है।’ ...इस सर्वधर्म महासभा ने जगत के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया है,तो वह यह है कि - शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की एकान्तिक सम्पत्ति नहीं है, एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत-चरित्र के स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है। अब इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जाएंगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा, तो उसपर मैं अपने हृदय के अन्तःस्थल दया करता हूँ और उसे स्पष्ट बता देता हूँ कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णअक्षरों में लिखा होगा- ‘सहायता करो, लड़ो मत’; ‘परभाव-ग्रहण, न कि परभाव-विनाश’; ‘समन्वय और शान्ति, न कि मतभेद और कलह!’६    

स्वामी विवेकानन्द - विकिपीडिया

इसके उपरान्त स्वामीजी अमेरिका के बड़े-बड़े नगरों में धर्म प्रचार करते रहे। अमेरिका के जनसाधारण, विशेषकर शिक्षित समुदाय उनके और भी अधिक अनुरागी हुए। केवल संकीर्णमन भारतीय एवं ईसाई सम्प्रदाय के कुछ मनुष्य ईर्ष्यावश उनके विरूद्ध मिथ्या प्रचार करते रहे। स्वामीजी आर्थिक रूप से विपन्न होते हुए भी अपनी चरित्र की महानता द्वारा सभी प्रतिकूल परिस्थितियों को झेल सके। दो वर्ष बाद अर्थात १८९५ के अगस्त माह में वे यूरोप गए। तब स्वामीजी लन्दन में ३ महीने रूके। उन्होंने अनेक स्थानों पर वेदान्त आदि विषयों पर प्रबोधन किया। मार्गरेट नोबल जो कि कालान्तर में स्वामी विवेकानन्द की शिष्या बनीं, की भेंट स्वामीजी से नवम्बर, १८९५ में हुई। मार्गरेट की एक महिला मित्र के निवास पर एक छोटी सभा को स्वामीजी वेदान्त दर्शन समझा रहे थे। मार्गरेट स्वामीजी से बहुत प्रभावित हुईं और इसके बाद उनके कई और व्याख्यानों में गईं। इस दौरान उन्होंने स्वामी विवेकानन्द से ढेरों प्रश्न किये जिनके उत्तरों ने उनके मन में स्वामीजी के प्रति श्रद्धा और आदर उत्पन्न किया। स्वामीजी की प्रेरणा से मार्गरेट वर्ष १८९८ को भारत आ गईं। वे स्वामीजी की शिष्या बनीं और स्वामीजी ने ही उन्हें “भगिनी निवेदिता” नाम दिया था। उल्लेखनीय है कि भगिनी निवेदिता ने कोलकाता में बालिकाओं के लिए विद्यालय की स्थापना की, प्लेग के दौरान रोगियों की गहन सेवा की और स्वतंत्रता आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभाई।     पेरिस एवं लन्दन के नगरों में धर्म-प्रचार अभियान के बाद स्वामीजी दिसम्बर माह में अमेरिका लौट आए। १५ अप्रैल, १८९६ को अमेरिका से विदा लेकर पुनः लन्दन आए। 

स्वामीजी के पश्चिमी देशों में यात्रा का भारत पर प्रभाव के सम्बन्ध में ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में दिनकर लिखते हैं, “शिकागो सम्मेलन से उत्साहित होकर स्वामीजी अमरीका और इंग्लैंड में तीन साल तक रह गए और इस अवधि में भाषणों, वार्तालापों, लेखों, कविताओं, विवादों और वक्तव्यों के द्वारा उन्होंने हिन्दू धर्म के सार को सारे यूरोप में फैला दिया है। प्राय: डेढ़ सौ वर्ष से ईसाई मत प्रचारक संसार में हिन्दुत्व की जो निन्दा फैला रहे थे, उस पर अकेले स्वामीजी के कर्तृत्व ने रोक लगा दी और जब भारतवासियों ने यह सुना कि सारा पश्चिम जगत स्वामीजी के मुख से हिन्दुत्व का आख्यान सुनकर गदगद हो रहा है, तब हिन्दू भी अपने धर्म और संस्कृति के गौरव का अनुभव कुछ तीव्रता से करने लगे।“ वे आगे लिखते हैं – “अंग्रेजी पढ़कर बहके हुए हिन्दू बुद्धिजीवियों को समझाना बहुत कठिन कार्य था। किन्तु जब उन्होंने देखा कि स्वयं यूरोप और अमरीका के नर-नारी स्वामीजी के शिष्य बनकर हिन्दुत्व की सेवा में लगते जा रहे हैं, तब उनके भीतर भी ग्लानि की भावना जगी और बकवास छोड़कर वे भी स्थिर होने लगे। इस प्रकार, हिन्दुत्व को लीलने के लिए अंग्रेजी भाषा, ईसाई मत और यूरोपीय बुद्धिवाद के रूप में जो तूफान उठा था, वह स्वामी विवेकानन्द के हिमालय जैसे विशाल वक्ष से टकराकर लौट गया। हिन्दू-जाति का धर्म है कि वह जब तक जीवित रहे, विवेकानन्द की याद उसी श्रद्धा से करती जाए; जिस श्रद्धा से वह व्यास और वाल्मीकि की याद करती है।”७ 

स्वामीजी लन्दन से भारत की ओर १६ दिसम्बर, १८९६ को रवाना हुए और १५ जनवरी, १८९७ को अपनी विदेश यात्रा पूरी कर स्वामी विवेकानन्द ने कोलम्बो (तब श्रीलंका अखंड भारत का भाग था) की धरती पर कदम रखा। पाश्चात्य देशों में स्वामीजी की अभूतपूर्व सफलता ने भारतवासियों के मन में जो आत्मविश्वास और आत्मगरिमा जगायी थी, उसके प्रभाव से दीर्घ संचित हीन भावना एक पल में दूर हो सकी। भारतवासी सिर उठाकर खड़े हुए और पहचाना कि विश्व की सभ्यता के भण्डार में उनका योगदान पाश्चात्य देशों से कम नहीं, वरन् अधिक ही रहा है। इस आत्मगरिमा का संचार जिसने जन-जन में किया, सारे देश को जिसने घोर निद्रा से जगाया, उसका स्वागत करने के लिए समस्त देश अधीर आग्रह से कम्पायमान था। जब स्वामीजी कोलम्बो पहुँचे, तो उनके प्रति समस्त देश की कृतज्ञता ने एक अभूतपूर्व अभिनन्दन का रूप धारण कर लिया। उसके बाद तो अभिनन्दन की बाढ़ मद्रास से लेकर कलकत्ता की सड़कों पर बह चली। २० जनवरी को स्वामीजी कलकत्ता पहुँचे। अभिनन्दन के बाद अभिनन्दन-कलकत्ता अपने विश्वविजयी पुत्र के आगमन में मतवाला हो उठा।  

इसके तुरन्त बाद स्वामीजी ने पूरे भारत का पुनः एकबार भ्रमण किया। इससे पूर्व जनवरी १८८७ से ३१ मई, १८९३ तक “परिव्राजक संन्यासी के रूप में” स्वामीजी ने भारत की यात्रा की थी। स्वामीजी की पहली यात्रा का उद्देश्य “भारत को जानना था” जबकि उनकी दूसरी यात्रा का प्रयोजन “भारत को भारत से परिचित करना” था। स्वामीजी की यह दूसरी यात्रा भारत को एकसूत्र में जोड़ने वाला सार्थक अभियान था। इस यात्रा में विभिन्न स्थानों पर स्वामी विवेकानन्दजी के अनेक व्याख्यान हुए। रामकृष्ण मिशन ने इन व्याख्यानों का एक पुस्तक “कोलम्बो टू अल्मोड़ा” नाम से प्रकाशित किया, जिसका हिन्दी अनुवाद हिन्दी के महान कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने किया है। वर्तमान में यह “भारतीय व्याख्यान” नामक पुस्तिका के रूप में उपलब्ध है। स्वामीजी के व्याख्यानों से जो विचार प्रगट हुए वह देशभक्ति का प्रेरणास्रोत साबित हुआ। एक अर्थ में स्वामीजी के शक्तिदायी विचार भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए मंत्र ही था।

पश्चिमी देशों में अविराम भ्रमण तथा भाषण, भारत आने के बाद पूरे भारत का प्रवास, इन सब कारणों से स्वामीजी का स्वास्थ्य गिरता चला गया। परन्तु वे इसकी परवाह न कर श्रीरामकृष्ण के उपदेश पथ पर संन्यासी संघ ‘रामकृष्ण मठ’ को स्थायी तौर पर प्रतिष्ठित करने का पूरा प्रयत्न करने लगे। उन्होंने स्वामी रामकृष्णानन्द को मद्रास में एक शाखा-केन्द्र की स्थापना करने के लिए भेजा। स्वामी अखण्डानन्द ने मुर्शिदाबाद जिले के सारगाछी में आश्रम प्रतिष्ठित किया। अन्य संन्यासी भाइयों को भी अलग-अलग दायित्व सौंपा गया। अमेरिका और इंग्लैण्ड का कार्यभार यथाक्रम स्वामी सारदानन्द और स्वामी अभेदानन्द के कन्धों पर दिया गया। १ मई, १८९७ को स्वामीजी ने रामकृष्ण मिशन की औपचारिक रूप से स्थापना की। संघ के लिए गंगा तट पर एक स्थायी भूमि खरीदने का विचार उनके मन में विदेशों में आया था। वह स्वप्न सन १८९८ में साकार हुआ। इसी वर्ष ९ दिसम्बर को बेलुड़ ग्राम में रामकृष्ण मठ की स्थापना हुई। 

सन्दर्भ साहित्य 

१) विवेकानन्द साहित्य : प्रकाशक स्वामी तत्वविदानन्द, अद्वैत आश्रम (१९६३, पुनर्मुद्रण २०१४) खंड १, पृष्ठ ३ व ४   

२) प्रो. शैलेन्द्रनाथ धर : स्वामी विवेकानन्द समग्र जीवन दर्शन (२०१९), प्रकाशक विवेकानन्द केन्द्र, खंड १, पृष्ठ ६०२-६०३  

३) स्वामी गम्भीरानन्द : युगनायक विवेकानन्द (पुनर्मुद्रण २०१०) प्रकाशक रामकृष्ण मठ, नागपुर, खंड २, पृष्ठ ३१-३२      

४) स्वामी गम्भीरानन्द : युगनायक विवेकानन्द, खंड २, पृष्ठ ३१-३२       

५) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : संस्कृति के चार अध्याय, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ ४२८  

६) विवेकानन्द साहित्य : प्रकाशक स्वामी तत्वविदानन्द, खंड १, पृष्ठ २६  

७) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : संस्कृति के चार अध्याय, पृष्ठ ४२८   

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