श्रीराम भारत के जीवनादर्श हैं। अयोध्या के राजकुमार राम, दशरथ - कौशल्यानन्दन राम से मर्यादा पुरुषोत्तम एवं श्रीविष्णु के अवतार तक के रूप में श्रीराम के चरित्र का वर्णन विभिन्न ग्रन्थों मंे सुनने - पढ़ने को मिलता है। श्रीराम के जीवन का वर्णन सर्वाधिक प्रामाणिक रूप में आदिकवि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायणम्’ में प्राप्त होता है। इसका आधार शायद यही है कि वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन हैं। रामकथा में वनवास के समय श्रीराम के वाल्मीकि आश्रम में जाने तथा कालान्तर में सीता माता के वाल्मीकि आश्रम में रहने तथा लव-कुष जन्म के प्रसंग आते हैं। विषेष उल्लेखनीय बात यह है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित श्रीराम अवतारी पुरुष नहीं, सामान्य मानव हैं।  

तपःसिद्ध वाल्मीकि नारद जी से भेंट होने पर उनसे संसार में श्रेष्ठ गुणवान् मनुष्य के विषय में प्रश्न पूछते हैं -   


कोऽन्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान कश्च वीर्यवान्। (वा. रा. बालकाण्ड 1/2-5 )

 
प्रश्न में ’साम्प्रतं’ अर्थात् इस समय और ’अस्मिन् लोके’ यानी इस धरती पर गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता, दृढ़प्रतिज्ञ, सदाचारपरायण, सबका हितसाधक, विद्वान्, सामथ्र्यवान्, प्रियदर्शन, मन पर नियन्त्रण रखने वाला, क्रोधजयी, कान्तिमान्, ईष्र्यारहित - इन सब गुणों से युक्त मनुष्य है - एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे। - मुझे जानने की परम उत्सुकता है।

लोकव्याप्ति में श्रीराम स्वयं भगवान् हैं, नारायण के अवतार हैं। आध्यात्मिक विचारकों के अनुसार राम तुरीय तत्व हैं, हृदय में ज्ञान रूप में स्थित हैं और मोहरूपी रावण का वध करते हैं। कालान्तर में तुलसी के राम ’ब्रह्म अनामय अज भगवंता’। व्यापक अजित अनादि अनंता होते हुए भी साकार रूप में हैं तो निराकार के उपासक, कबीर, ’ऐसे घट-घट राम हैं’ का निरूपण करते हैं। किन्तु उपर्युक्त नारद- वाल्मीकि संवाद में वाल्मीकि किसी अवतारी पुरुष के विषय में नहीं पूछते हैं - महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम्।“- वे ऐसे आदर्श नर’ को जानना चाहते हैं, जिसमें ये सारे गुण हैं। उत्तर में देवर्षि नारद भी ’इक्ष्वाकुवंशप्रभवो’ अर्थात इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न, ‘साम्प्रतम’ और ‘अस्मिन् लोके’ का ही वर्णन करते हैं, अपने परमाराध्य वैकुण्ठवासी श्रीविष्णु का नहीं। यह मानव राम ही ’वाल्मीकि के राम’ हैं। 


वाल्मीकि हमें वैकुण्ठ ले जाकर श्रीराम से नहीं मिलाना चाहते। अज्ञानान्धकार से निवृत्त आत्मा और ब्रह्म की एकता के रूप में, तुरीय तत्व के रूप में भी नहीं। वैकुण्ठ जाना दुर्लभ है। परमात्मतत्व के रूप में अनुभव करने के लिए साधन-चतुष्टय सम्पन्न परमज्ञानी होना पड़ेगा। सामान्य व्यक्ति के लिए यह कठिन है। यह पता लग जाए कि वे साक्षात नारायणावतार हैं, तो उनके समान बन पाना तो मनुष्य के लिए असंभव ही है। इसलिए वाल्मीकि अयोध्यानगरी में मनुष्य रूप में सद्गुण-सम्पन्न चरित्र वाले राम से हमारा परिचय कराते हैं जो भूत-वर्तमान-भविष्य में सदा-सर्वदा मानव के आदर्श के रूप में उपस्थित रहेंगे। वे श्रेष्ठ मानव हैं, भगवान् नहीं। हिन्दी में भगवान् और ईश्वर पर्यायवाची हैं। संस्कृत में भगवान् संज्ञा नहीं, विशेषण है इसलिए भगवान वेदव्यास, भगवान् शंकराचार्य आदि शब्द प्रयोग होते हैं।

वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के लिए यदि ’भगवान’ संबोधन का उपयोग हुआ है तो वह भी इसी रूप में, न कि ईश्वर के अवतार के रूप में। वाल्मीकि के मानव रूप राम का जीवन सामान्य व्यक्ति के जीवन जैसा है। श्रीराम के मानव चरित्र को हम अपने भौतिक जीवन में उतार सकते हैं। अन्यथा, “भगवान् में तो ऐसे गुण होने ही चाहिए, इसमें आश्चर्य क्या, किन्तु मनुष्य में ऐसे गुण कैसे आ सकते हैं ?“ - कहना सरल है। 
 

वाल्मीकि रामायण पर अनेक टीकाएँ मिलती हैं। उनमें से ’धर्माकूत’ व्याख्याकार का कहना है कि समाज को समुचित दिशा देने वाले एक शास्त्र की रचना करने की वाल्मीकि को इच्छा हुई ताकि सामान्य व्यक्ति भी जाने कि माता-पिता, भाइयों-मित्रों के साथ व्यवहार कैसा होना चाहिए, धर्मनिष्ठ जीवन कैसा होना चाहिए, किन्तु यह लिखने के लिए आज्ञा या उपदेश उपयोगी नहीं होता। अतः वाल्मीकि को लगा कि इसे उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाए। श्रीराम जीवन में सब प्रकार के कष्ट सह कर भी धर्म पथ से विचलित नहीं होते।

 

अरण्यकाण्ड (37/13) में वाल्मीकि कहते हैं -


रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः । 
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामि वासवः ।। 

वाल्मीकि के राम ’विग्रहवान् धर्म’ इसलिए हैं कि उनके धर्माचरण में उनका अपनी इन्द्रियों पर, मन पर और

संपूर्ण जीवन पर नियंत्रण है। वनवास के प्रसंग में स्वयं राजा दशरथ कहते हैं- 


अहं राघव कैकेय्या वरदानेन मोहितः ।
अयोध्यायां त्वमेवाद्य भव राजा निगृह्यमाम् ॥     (वा. रा. अयोध्याकाण्ड 34/26)   


सटीक उपाय!  खुल्लमखुल्ला प्रस्ताव !! ‘‘मैं तो कैकेयी के वरदान से मोहित हूँ, मुझे अपदस्थ कर, बन्दी बना कर स्वयं सिंहासन पर बैठ जाओ।’’ श्रीराम यदि इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते तो राजा तो बन जाते किन्तु ’श्रीराम’ न बन पाते।


हमारे धर्मशास्त्र धर्माचरण के उपदेशों से भरे हुए हैं। वेद मंत्रों में, गृह्यसूत्रों में यज्ञशाला के धर्म का विस्तृत वर्णन है किन्तु हमारे घर में पालन किए जाने वाले धर्म का उल्लेख तो वाल्मीकि रामायण में राम के चरित्र के उदाहरण से ही दिखाई देता है। बाल्यावस्था में राम  - 'न च तेन विना निद्रां लभते पुरुषोत्तमः' (बालकाण्ड 18/31) - लक्ष्मण के बिना नींद नहीं आती और युवराज बनने जा रहे राम को जब वनवास मिलता है तो भरत बड़े भाई के होते राजगद्दी को ठुकरा कर चित्रकूट से राम को वापस लाने जाते हैं। भ्रातृप्रेम का यह अनुपम उदाहरण किस धर्मसूत्र में मिलेगा? 'मा भ्राता भ्रातरं द्विषन् मा स्वसारमुत स्वसा।’ (अथर्ववेद 3/30/3) का पालन तो श्रीराम के परिवार में ही दिखाई देता है। 


वाल्मीकि के राम ’विग्रहवान् धर्म’ हैं। उनके जीवन में धर्माचरण है। उनका धर्माचरण यज्ञशाला या मंदिर में नहीं, व्यवहार में दिखता है। उनका योग कन्दरा में नहीं, समाज के बीच में, राजमहल में होता है। वे हर्षित-दुखित होते हैं, उनका संयोग-वियोग होता है। उनका जीवन समग्र है, एकांगी नहीं। उनमें अनन्त गुण हैं किन्तु कोई ऐसा नहीं जो मनुष्य के लिए दुर्लभ हो। सभी गुण ग्रहणीय और अनुकरणीय हैं, केवल प्रशंसनीय नहीं। श्रीराम के चरित्र का अनुसरण-अनुकरण करने में, अपने चरित्र को पवित्र बनाने में किसी जाति-पंथ-संप्रदाय-भाषा-राष्ट्रीयता-लिंग का भेदभाव नहीं। मनुष्य के जीवन का आदर्श हैं श्रीराम, उनका और उनके परिजनों का चरित्र।


ऐसे चरित्रों का निर्माण कहाँ होता है ? पहला स्रोत है परिवार। सुग्रीव से मित्रता के समय सीता के आभूषण दिखाने पर लक्ष्मण के कथन - ‘नूपुर होता तो पहचान सकता था, कर्णफूल नहीं पहचानता’ का संस्कार देने वाली माता सुमित्रा के बिना यह उद्गार आते क्या? दूसरा स्रोत थे गुरुकुल - आश्रम। प्रारम्भिक रूप में सुधन्वा, फिर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ, उनके बाद महर्षि विश्वामित्र और उसके बाद की राम कथा में गौतम - सुतीक्ष्ण, मतंग ऋषि की  शिष्या शबरी तथा वनवास की यात्रा में अगस्त्य, वाल्मीकि से बढ़ते हुए इहलोक यात्रा के अंतिम क्षण में दुर्वासा तक ऋषियों - मुनियों और उनके गुरुकुल - आश्रमों में राम जाते हैं और सबसे शिक्षा प्राप्त करते हैं।   


मनुष्य के जीवन को समुचित दिशा दिखाने वाले आश्रम प्राचीन वैदिक काल से ही भारत की ज्ञान परम्परा के सृजनकर्ता और उस प्रवाह को आगे बढ़ाने वाले रहे हैं। समाज जीवन में सद्गुण-सम्पन्न नागरिकों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इन आश्रमों की कार्यपद्धति हमारे लिए अनुकरणीय है।
 
वाल्मीकि रामायण ऐतिहासिक काव्य है। इसका मुख्य रस है - करुण। वाल्मीकि के मुख से क्रौंचवध प्रसंग जनित करुणा से प्रस्फुटित श्लोक - ’मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः’ (2/15) से निकली हुई वह काव्यरसधारा माता सीता के निज लोक प्रस्थान तक सतत चलती है। करुणा हृदय को द्रवित करती है। पिघल जाने पर ही कठोर तत्व में सद्वचन, सद्विचार, सद्भाव और स्वानुभूति आदि का मिश्रण कर उसे उपयुक्त आकार दिया जा सकता है। आदिकवि मनुष्य जाति के सम्मुख एक जीवनादर्श के रूप में श्रीराम का चरित्र प्रस्तुत कर प्रलयपर्यन्त के लिए एक दिशा दे गए हैं।
राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।। 

                                                                  
 

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