केंद्र के 'रेड फ्लैग' और छुपाए गए एजेंडे का विश्लेषण

ये अभी हाल ही की बात है, भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में उस समय एक अभूतपूर्व भूचाल आ गया, जब भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (एमईए) ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री अनुमुला रेवंत रेड्डी के प्रस्तावित संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) दौरे को 'मंजूरी' देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। जहां कांग्रेस पार्टी और विपक्ष इसे 'नीच मानसिकता' और संघीय ढांचे पर हमला बता रहे हैं, वहीं केंद्र सरकार के आधिकारिक सूत्र, खुफिया एजेंसियों और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्य बेहद संवेदनशील  हैं।

इस संदर्भ में सामने आया है कि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के अमेरिका प्रवास कार्यक्रम को पूरी तरह से पारदर्शी नहीं रखा गया था। कूटनीतिक नियमों के उल्लंघन और इस गोपनीयता के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण और प्रमाण सामने आए हैं, जिसमें कि भारत की संप्रभु विदेश नीति और कूटनीतिक नियमावली के तहत, किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को किसी विदेशी सरकार के आधिकारिक प्रतिनिधियों, राजनेताओं या मेयरों से मिलने के लिए वाशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास या विदेश मंत्रालय के माध्यम से ही औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं।

यह बात प्रमाणित हुई है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री कार्यालय ने विदेश मंत्रालय को पूरी तरह से अंधेरे में रखा। उन्होंने आधिकारिक राजनयिक चैनलों के बजाय निजी जनसंपर्क (पीआर) लॉबिस्टों और कुछ विशिष्ट प्रवासी नेटवर्कों का उपयोग करके सीधे अमेरिकी उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जेडी वेंस और न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी से उच्च स्तरीय राजनीतिक वार्ताओं का समय मांगा था।यदि ये बैठकें विदेश मंत्रालय के माध्यम से रूट की जातीं, तो केंद्र सरकार उनकी संवेदनशीलता और राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से तुरंत समीक्षा करती और प्रारंभिक चरण में ही इन पर रोक लगा देती। 

यह तथ्‍य भी सामने आया है कि तेलंगाना सरकार ने विदेश मंत्रालय से राजनीतिक मंजूरी मांगते समय कागजों पर यह दर्शाया था कि इस यात्रा का एकमात्र उद्देश्य "तेलंगाना राइजिंग" बैनर के तहत राज्य के लिए निवेश लाना और हार्वर्ड तथा एमआईटी  जैसी प्रतिष्ठित वैश्विक यूनिवर्सिटीज के साथ शैक्षणिक एमओयू पर हस्ताक्षर करना है, किंतु जब विदेश मंत्रालय ने मुख्यमंत्री के 'मिनट-टू-मिनट' कार्यक्रम की गहन समीक्षा की, तो पाया गया कि विश्वविद्यालयों के साथ बैठकों की आड़ में अत्यधिक संवेदनशील और विवादास्पद विदेशी राजनीतिक हस्तियों के साथ गुप्त बैठकें तय की जा रही थीं। 

यही कारण था कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने आधिकारिक तौर पर बयान दिया कि यह कार्यक्रम मुख्यमंत्री के 'पद की गरिमा और यात्रा के घोषित उद्देश्य के अनुरूप उपयुक्त' नहीं पाया गया। इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक और विवादास्पद केंद्र न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के साथ मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की प्रस्तावित बैठक थी। भाजपा नेताओं और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों ने इस मुलाकात के पीछे के राजनीतिक और वैचारिक मंसूबों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। 

उन्‍हें लेकर ये सर्वविदित है कि वे पश्चिमी देशों में बैठकर भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और बहुसंख्यक हिंदू समाज के खिलाफ एक सुनियोजित एजेंडा चलाते हैं। उमर खालिद और भारत विरोधी ताकतों का खुला समर्थन अब तक वे कई बार कर चुके हैं। इसी साल जनवरी 2026 में जोहरान ममदानी ने दिल्ली दंगों के मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल और जेल में बंद कार्यकर्ता उमर खालिद की रिहाई की मांग करते हुए एक अत्यंत आपत्तिजनक व्यक्तिगत पत्र लिखा था। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने तब ममदानी के इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए कड़ा प्रतिवाद (Strong Rebuke) दर्ज कराया था और उन्हें भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करने की हिदायत दी थी।

भाजपा के राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय नेताओं, जैसे कि सांसद अरविंद धर्मपुरी (निजामाबाद से भाजपा सांसद) और एन. रामचंद्र राव (तेलंगाना भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष)) ने साक्ष्यों के साथ आरोप लगाया है कि ममदानी लगातार उस वैश्विक लॉबी का हिस्सा रहे हैं जो विदेशों में 'हिंदू-फोबिया' और हिंदू धर्म के खिलाफ घृणा फैलाने वाले प्रस्तावों और नैरेटिव का समर्थन करती है। न्यूयॉर्क में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली ऐतिहासिक 'इंडिया डे परेड', जो प्रवासी भारतीयों के गौरव का प्रतीक है, से ममदानी ने जानबूझकर दूरी बनाई थी। इसके विपरीत, वे भारत-विरोधी तत्वों और 'पाकिस्तान डे' से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से देखे गए हैं, जिसे भारतीय खुफिया तंत्र देश के राष्ट्रीय हितों के प्रति एक स्पष्ट शत्रुतापूर्ण व्यवहार मानता है।

अब धीरे-धीरे यह भी सामने आ रहा है कि कांग्रेस पार्टी के एक मुख्यमंत्री का विदेश जाकर ऐसे व्यक्ति से मिलने की जिद्द करने के पीछे शुद्ध रूप से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तुष्टिकरण का खेल छिपा था। जोहरान ममदानी लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार की नीतियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कटु आलोचना करते हैं। एक बार को इस बात को नजरअंदाज भी कर दिया जाए, तब भी इस सच को नकारा नहीं जा सकता है कि इस वक्‍त कांग्रेस पार्टी अपनी आंतरिक राजनीतिक योजना के तहत उन तत्वों को साधने का प्रयास कर रही है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की वर्तमान सरकार की छवि को धूमिल करना चाहते हैं।

इस गुप्त अमेरिकी प्रवास कार्यक्रम के प्रकाश में आने के बाद, तेलंगाना के मुख्यमंत्री और कांग्रेस आलाकमान पर कूटनीतिक अनुशासनहीनता से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौते तक के कई गंभीर आरोप लगे हैं। जिनमें कि उप पर सीधा आरोप है कि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की यह यात्रा राज्य के विकास के नाम पर उन अंतरराष्ट्रीय ताकतों के साथ वैचारिक योजना साझा करने के लिए थी जो राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के थिंक-टैंक को वैचारिक खाद-पानी सप्लाई करती हैं। भारत की संप्रभुता को चुनौती देने वाले और भारत की न्यायपालिका पर सवाल उठाने वाले व्यक्ति (ममदानी) के साथ आधिकारिक स्तर पर बैठना देश की आंतरिक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिति को कमजोर करने जैसा है।

भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध पूरी तरह से 'संघ सूची' का हिस्सा हैं। राज्यों के मुख्यमंत्रियों को विदेशी सरकारों के साथ स्वतंत्र राजनीतिक संबंध बनाने की कोई संवैधानिक स्वायत्तता नहीं है। रेवंत रेड्डी पर आरोप है कि उन्होंने विदेश मंत्रालय को दरकिनार कर अपनी एक समानांतर और स्वतंत्र राजनयिक व्यवस्था स्थापित करने का असंवैधानिक प्रयास किया। क्‍या इसे संविधानिक तौर पर या कहें एक सम्‍प्रभुराष्‍ट्र भारत के संदर्भ में सही कदम माना जा सकता है? 

केंद्र सरकार के निर्णय के बाद जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मीडिया के सामने आकर केंद्र सरकार को 'नीच मानसिकता' वाला कहा और 'वंदे मातरम' तथा राष्ट्रगान के चुनिंदा अंशों को गाए जाने का बचाव किया, तो विवाद और गहरा गया। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस अपनी कूटनीतिक चोरियों और प्रोटोकॉल के उल्लंघनों को छिपाने के लिए देश के राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान जैसे पवित्र राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक ढाल के रूप में कर रही है।

अब केंद्र सरकार के प्रोटोकॉल एवं नियमों में देखें तो विदेश मंत्रालय द्वारा उठाया गया यह कदम किसी भी प्रकार से राजनीतिक द्वेष का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस कूटनीतिक तर्क मौजूद हैं, जैसे कि केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की यूनाइटेड किंगडम (यूके) यात्रा को बिना किसी हिचकिचाहट के पूर्ण राजनीतिक मंजूरी दी थी। यदि केंद्र सरकार का इरादा राजनीतिक द्वेष पालना या तेलंगाना के विकास को रोकना होता, तो वे उनके लंदन दौरे को भी रोक सकते थे। लंदन में मुख्यमंत्री ने ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रतिनिधियों से मुलाकात की, क्योंकि वे कार्यक्रम नियमों के दायरे में थे।

दूसरी ओर भारत को लेकर वर्तमान में देखें तो अमेरिकी राजनीति इस समय अत्यंत संवेदनशील दौर से गुजर रही है। ऐसे में भारतीय विदेश मंत्रालय की अनुमति के बिना किसी भारतीय राज्य के मुख्यमंत्री का अमेरिकी उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार (जेडी वेंस) और विवादित मेयरों से सीधे संपर्क करना भारत के कूटनीतिक संतुलन को बिगाड़ सकता है, इसलिए कहना यही होगा कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के अमेरिका प्रवास पर रोक लगाने का केंद्र सरकार का निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और कूटनीतिक मर्यादा की रक्षा के लिए उठाया गया एक अनिवार्य कदम है। 

वस्‍तुत: साक्ष्यों और घटनाक्रमों से यह स्पष्ट रूप से रेखांकित होता है कि मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा कूटनीतिक चैनलों को बाईपास करना और जोहरान ममदानी जैसी भारत-विरोधी व हिंदू-घृणा से ग्रस्त पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों से मिलने के लिए अत्यधिक गोपनीयता बरतना ही इस प्रतिबंध का मुख्य कारण बना है। स्‍वभाविक तौर पर एक जिम्मेदार लोकतंत्र में, किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वे दलीय राजनीति से ऊपर उठकर देश की आधिकारिक विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रोटोकॉल का पूरी निष्ठा से पालन करें, ताकि वैश्विक मंच पर भारत की एकता और अखंडता अक्षुण्ण बनी रहे। इस मामले में यही तो केंद्र सरकार ने इस वक्‍त किया है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
अपने लेख इस पते पर भेजें :- editatalraag@gmail.com