जब किसी राष्ट्र में नीति, न्याय और विमर्श का निर्धारण विवेक, इतिहास के गंभीर अध्ययन या अकादमिक तर्कों से नहीं, बल्कि सड़कों पर उमड़ने वाली अंधी भीड़ के दबाव से होने लगे, तब समाज का वैचारिक पतन अनिवार्य हो जाता है। आज भारत की सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकता यही है। आरक्षण के इस सुलगते हुए और संवेदनशील विमर्श में वर्तमान स्थिति यह है कि सामान्य वर्ग के लिए इस विषय पर स्वतंत्र रूप से, निष्पक्षता से और वैचारिक गहराई के साथ बात करना तक दूभर कर दिया गया है। जैसे ही EWS (आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग) का संवैधानिक प्रावधान सामने आया, वैसे ही राजनीतिक तंत्र और विरोधियों ने एक ऐसा अचूक हथियार पा लिया जिसके जरिए सामान्य वर्ग की हर न्यायसंगत आवाज़ को तुरंत यह कहकर शांत करा दिया जाता है"तुम्हें तो 10 प्रतिशत आरक्षण मिल गया, अब किस बात का रोना?" इस एक छलपूर्ण और कृत्रिम आख्यान से सामान्य वर्ग को इस पूरी व्यवस्था से पूरी तरह वंचित कर दिया गया है, और एक ऐसा वातावरण बना दिया गया है मानों आरक्षण अब इस देश का एक ऐसा अकाट्य और सनातन सत्य है जिसे छुआ तक नहीं जा सकता, जिस पर कोई प्रश्न उठाना ही सबसे बड़ा अपराध हो।

किंतु, इस पूरे परिदृश्य की सबसे बड़ी, सबसे गहरी और विदारक विडंबना यह है कि असली अन्याय सामान्य वर्ग के साथ नहीं, बल्कि उस आरक्षित समाज के भीतर हो रहा है जो आज भी अंधेरे, असहायता, भुखमरी और मूलभूत सुविधाओं के अभाव के दलदल में फंसा हुआ है। आज यदि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि से हो, इस आरक्षण-व्यवस्था में सुधार की, संपन्न वर्ग (क्रीमी लेयर) को बाहर करने की या रोहिणी आयोग के उन डरावने और आँखें खोल देने वाले आँकड़ों की बात करता है जो यह चीख-चीख कर कहते हैं कि ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के भीतर का 97 प्रतिशत लाभ केवल 25 प्रतिशत जातियों तक सिमट कर रह गया है, तो उसे तुरंत "आरक्षण-विरोधी" और "दलित-पिछड़ा विरोधी" का लांछन लगा दिया जाता है।

इस पूरी व्यवस्था और राजनैतिक संस्कृति के भीतर एक बहुत खतरनाक और शोषक मनोवैज्ञानिक चक्र काम कर रहा है। स्वतंत्रता के इतने दशकों और विकास के तमाम प्रतिपादनों के बाद भी गाँव के उस अंतिम छोर पर बैठे शोषित और वंचित मनुष्य को आरक्षण का एक कतरा तक प्राप्त नहीं हुआ है, फिर भी वह आँख मूँदकर, अपनी सुधबुध खोकर आरक्षण के समर्थन में अपने प्राण लड़ा देने को तैयार रहता है। क्यों? क्योंकि उसे दशकों से एक ऐसा मनोवैज्ञानिक झांसा दे दिया गया है कि "भले ही आज तेरे घर चूल्हा न जले, पर यह तेरा जन्मसिद्ध अधिकार है; कल तेरा पुत्र पढ़-लिख जाएगा तो उसे इसका लाभ मिल जाएगा।" वह निर्धन, अज्ञानी और भोला मनुष्य यह समझ ही नहीं पा रहा है कि जिस आरक्षण के सहारे वह अपनी आशाएँ और भविष्य लगाए बैठा है, उस पर तो उसी की जाति के उन प्रभावशाली, संभ्रांत और शक्तिशाली परिवारों का अधिकार हो चुका है जिनकी तीन-तीन पीढ़ियाँ वातानुकूलित कक्षों, बड़े शासकीय पदों और सत्ता के मार्गों की मलाई चाट चुकी हैं। भूमि पर खड़ा वह असहाय मनुष्य अपनी ही जाति के उन साधन-संपन्न और कुलीन लोगों से कभी किसी भी स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर ही नहीं सकता। आरक्षण के नाम पर जो राजनीति का ढोल पीटा जाता है, उसका लाभ असल में उसी संपन्न वर्ग को बार-बार मिलता है, और वास्तविकता के धरातल पर निर्धन आज भी ठगा का ठगा, किनारे पर सिसकता हुआ रह जाता है।

जब भी इस भूमिगत सच्चाई को और इन कड़वे तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया जाता है, तो तथाकथित राजनीतिक अगुआ और स्वार्थी दल उन भोले-भाले और अज्ञानी लोगों को भीड़ के रूप में सड़कों पर उतार देते हैं जिन्हें आज तक इस व्यवस्था से कुछ नहीं मिला। वे उन्हें यह कहकर भावनात्मक रूप से भड़का देते हैं कि "तुम्हारा अधिकार छीना जा रहा है," और वे बिना यह समझे कि उनकी अपनी ही थाली का भोजन कोई और चाट रहा है, उग्र प्रदर्शन और हिंसा पर उतर आते हैं। यहाँ भीड़ ही न्याय तय करती है, और बुद्धिजीवी, शोधकर्ता तथा विचारकों के तार्किक एवं तथ्यात्मक स्वर उस शोर के नीचे हमेशा के लिए दबा दिए जाते हैं।

वर्तमान परिदृश्य में यह संकट और भी विकराल रूप ले चुका है। अब माँगें केवल शासकीय सेवाओं और उच्च शिक्षण संस्थाओं तक सीमित नहीं रह गई हैं। आरक्षण अब अपनी पारंपरिक सीमाओं को लांघकर जाति से आगे बढ़कर लिंग आधारित (जैसे 2023 का महिला आरक्षण अधिनियम) क्षेत्रों में फैल चुका है, और इसकी महत्वाकांक्षा अब सीधे तौर पर निजी क्षेत्र में आरक्षण और अंततः व्यक्तिगत संपत्ति के समान वितरण तक पहुँच चुकी है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल खुलेआम "जिसकी जितनी जनसंख्या, उतनी भागीदारी" के विभाजनकारी नारे को ऊँचा उठा रहे हैं। बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जिस प्रकार केवल जनसंख्या के अनुपात को ही सब कुछ मानकर आरक्षण का क्षेत्र बढ़ाने के संवैधानिक और प्रशासनिक प्रयास किए गए, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह माँग और भूख कभी रुकने वाली नहीं है।

ऐसी स्थिति में यह सोचना या आशा करना कि आरक्षण कभी समाप्त होगा, एक कोरी कल्पना और वैचारिक मूर्खता मात्र है। आज के समय में आरक्षण का अंत केवल तीन ही अत्यंत असंभव और काल्पनिक परिस्थितियों में संभव हो सकता है:

पहला यह कि देश में आरक्षण की कुल सीमा 59 प्रतिशत से घटकर सीधे और अचानक 10 प्रतिशत पर आ जाए।

दूसरा यह कि जनसंख्या के संपूर्ण अनुपात के आधार पर आरक्षण बढ़कर सीधे 100 प्रतिशत हो जाए।

या फिर तीसरा यह कि देश की पूरी अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था शासकीय नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त होकर केवल रक्षा, सामान्य प्रशासन, राजस्व और अंतर-राज्यीय परिवहन तक सिमट कर रह जाए।

वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के ताने-बाने को देखते हुए अगले 50 से 100 वर्षों तक इस व्यवस्था के समाप्त होने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। EWS के संवैधानिक प्रावधान के आने के बाद यह एक क्षणिक आशा जगी थी कि शायद अब आरक्षण की यह अंधी दौड़ थमेगी, किंतु इसके विपरीत माँगें और अधिक आक्रामक, हिंसक और चौतरफा हो गईं।

जब न्याय की मूल संकल्पना को आत्मसंयम, कर्तव्य और कर्मफल के शाश्वत विधान से काटकर विशुद्ध रूप से राजनीतिक सौदेबाजी का हथियार बना लिया जाता है, तब राष्ट्र का वैचारिक और सांस्कृतिक ताना-बाना भीतर से खोखला होने लगता है। आज भारत के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श पर पश्चिमी वैचारिक प्रयोगशालाओं में गढ़े गए उन सिद्धांतों का गहरा साया है, जिनका उद्देश्य कभी भी समाज को जोड़ना या न्याय दिलाना नहीं रहा, बल्कि 'समानता' और 'सामाजिक न्याय' के लुभावने नारों की आड़ में इस देश की सभ्यतागत निरंतरता, राष्ट्रबोध और सनातन परंपराओं को समूल नष्ट करना है।

यदि हम वर्तमान आरक्षण व्यवस्था और पहचान की राजनीति के इस समूचे ताने-बाने का निष्पक्ष और दार्शनिक विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह आधुनिक ढांचा भारतीय दर्शन के मूल सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है। सनातन चेतना में न्याय का आधार किसी व्यक्ति का जन्म, जाति, नस्ल या समूहगत पहचान नहीं, बल्कि उसका कर्म और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व होता है। भगवद्गीता में कर्मफल के अटल विधान का जो स्वरूप स्पष्ट किया गया है, उसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपने अच्छे या बुरे कर्मों का स्वयं निर्माता और उत्तरदायी है। इसके विपरीत, आधुनिक 'सोशल जस्टिस' का यह मॉडल पूरी तरह कार्ल मार्क्स के वर्ग-संघर्ष, अंतोनियो ग्राम्शी के सांस्कृतिक वर्चस्व और पश्चिमी विश्वविद्यालयों में उपजी 'क्रिटिकल रेस थ्योरी' के उस आयातित संस्करण पर आधारित है, जिसे भारत में 'कास्ट रेस थ्योरी' के रूप में थोप दिया गया है।

इस आयातित और विभाजनकारी विचारधारा का अंतिम उद्देश्य ही यह है कि समाज को निरंतर एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा रखा जाए। यहाँ तथाकथित 'ऐतिहासिक अन्यायों' के सुधार के नाम पर एक ऐसा अंतहीन चक्र चला दिया गया है जहाँ न तो मूल पीड़ित जीवित हैं और न ही वे लोग बचे हैं जिन्होंने कभी अन्याय किया था। फिर भी, आज की पीढ़ियों को सामूहिक अपराधबोध और जातीय नफरत की भट्टी में झोंक दिया जाता है। इस व्यवस्था ने योग्यता, मेधा और पुरुषार्थ को हाशिए पर धकेल दिया है। जब चयन और अवसरों का पैमाना केवल जन्म और जाति बन जाता है, तब मेधावी युवाओं की प्रतिभा घुट-घुट कर दम तोड़ने लगती है। यह सोचना कि इस कृत्रिम और राजनीतिक रूप से पोषित व्यवस्था से कभी कोई स्थायी सामाजिक समरसता आएगी, एक भारी भूल है। क्योंकि इस राजनीति का बुनियादी नियम ही यह है कि जब एक माँग पूरी होती है, तो उससे कहीं अधिक आक्रामक और बड़ी दूसरी माँग खड़ी कर दी जाती है। आज स्थिति यह है कि आरक्षण का दायरा सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं की सीमाओं को लांघकर निजी क्षेत्र और अंततः व्यक्तिगत संपत्ति के समान वितरण तक पहुँचने की कगार पर है।

इस पूरे विध्वंसकारी खेल के पीछे सक्रिय उन वामपंथी, कम्युनिस्ट और वैचारिक ताकतों का असली एजेंडा बहुत स्पष्ट है। वे भली-भांति जानते हैं कि जब तक भारत अपने धर्म, अपनी संस्कृति, अपने परिवार और अपनी सनातन परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है, तब तक इसे पराजित या खंडित नहीं किया जा सकता। इसलिए, 'सामाजिक न्याय' के मीठे जहर का इस्तेमाल करके वे हिंदू समाज को जातियों के ऐसे अनगिनत टुकड़ों में बाँट देना चाहते हैं जहाँ हर व्यक्ति अपनी सांस्कृतिक पहचान को भूलकर केवल अपनी जाति का लड़ाका बन जाए। इतिहास इस बात का साक्षी है कि इसी प्रकार की पहचान-आधारित और नस्लीय राजनीति ने अफ्रीका के कई देशों को आंतरिक संघर्षों, गृहयुद्धों और नरसंहारों की आग में झोंक दिया था। भारत के भीतर सुनियोजित तरीके से वैसी ही परिस्थितियाँ तैयार की जा रही हैं ताकि बहुसंख्यक समाज आपस में ही कट-मरकर कमज़ोर हो जाए, और तब मतांतरण के षड्यंत्र तथा राष्ट्रविरोधी ताकतों के 'टुकड़े-टुकड़े' वाले सपने आसानी से पूरे हो सकें।

अब समय आ गया है कि इस कड़वे और विदारक सत्य को पूरी निर्भीकता के साथ स्वीकार किया जाए। यह मान लेना कि ऐतिहासिक अन्यायों का ठीकठाक प्रतिकार वर्तमान पीढ़ियों को जातियों के आधार पर दंडित करके किया जा सकता है, एक खतरनाक भ्रम है। इतिहास के पुराने घावों को कुरेदकर वर्तमान और भविष्य को आग के हवाले नहीं किया जा सकता। समाज का सच्चा उत्थान और न्याय तभी संभव है जब हम पहचान की इस संकीर्ण राजनीति से बाहर निकलकर कर्म के सिद्धांत, योग्यता, समान अवसरों और राष्ट्रनिष्ठा को अपना सर्वोच्च पैमाना बनाएँ। यदि इस वैचारिक और सांस्कृतिक आक्रमण को समय रहते नहीं पहचाना गया और इसका पुरजोर वैचारिक प्रतिकार नहीं किया गया, तो आने वाला इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। भारत का अस्तित्व किसी संख्या, कोटे या जातियों के कृत्रिम समीकरण पर नहीं, बल्कि इसकी सनातन धर्म-चेतना और सांस्कृतिक एकात्मता पर टिका है और इसकी रक्षा करना ही आज हर राष्ट्रप्रेमी का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

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