शुष्क तर्क लेकर उद्धव गोपियों को समझाने गए थे, ज्ञान सिखाने गए थे। जब वह वापस लौटे तो उनकी झोली में वृंदावन की माटी थी जिसे वह बार बार अपने सिर पर लगाते, रोते जाते और उस प्रेम का अनुभव करने का प्रयास करते जिसके आगे उनका ज्ञान व्यर्थ हो गया था।

कृष्ण भक्ति रस में पगी गोपियों ने अपने प्रेम मार्ग को नही छोड़ा,

     ज्ञान ध्यान विद्या मती, मत बिस्वास बिबेक। 

     बिना प्रेम सब धूरि है, अग जग एक अनेक।।

कृष्ण ने माता-पिता, सखा- सखी, गैया-गोपाल समेत सभी को प्रेम का अनुभव कराया। माँ यशोदा को वह अपना विश्वरूप दिखाते हैं पर उस ज्ञान पर मइया का प्रेम भारी है, वही जो अर्जुन को दिखाया था। अर्जुन को ज्ञान देने से पहले वह बार बार उसे सखा और प्रिय कहकर संबोधित करते हैं। प्रेम के बिना दिया गया ज्ञान विष होता है। उद्धव भी यही करने का प्रयास कर रहे थे पर गोपियों के आगे उनका ब्रह्मज्ञान निस्तेज हो गया। वह पागल होकर लौटे।

जब आप प्रेम करते हैं तो शब्द टूट जाते हैं, शब्दों के अन्तस का रस आप अनुभव कर लेते हैं और आपकी गति वही होती है जो गूंगे को गुड़ खाकर होती है। गोपियाँ शब्दों के स्थान पर भाव से संवाद करती हैं जिस विधा से उद्धव अनजान हैं। भाव मे संवाद करना तर्क वितर्क से ऊँची चीज है जो निष्काम प्रेम के माध्यम से ही प्राप्त होती है।

उद्धव गोपी संवाद प्रत्येक तर्क करने वाले व्यक्ति को पढ़ना चाहिए, थोड़ा सरस होगा, तब वह मायापति की लीलाओं का आनन्द ले सकेगा नही तो तर्क वितर्क करते जीवन बर्बाद कर देगा।प्रेम के बिना लिया दिया ज्ञान विष है।

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