15 अगस्त 1947... दिल्ली के लालकिले पर तिरंगा पूरे गौरव के साथ फहरा रहा था। करोड़ों भारतीयों की आंखों में स्वतंत्रता का सपना साकार हो चुका था, पर उस क्षण भारत माता का एक अंश अभी भी विदेशी दासता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। दादरा और नगर हवेली की धरती पर पुर्तगाली सत्ता का क्रूर पहरा कायम था। वहाँ रहने वाले वनवासी और सामान्य नागरिक स्वतंत्र भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे थे। 

परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि कूटनीति मौन थी, सत्ता विवश थी, पर राष्ट्रभक्ति कहां मौन रहनेवाली थी! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना वह साहस दिखाया, जिसने 2 अगस्त 1954 की सुबह दादरा और नगर हवेली की धरती पर पहली बार भारतीय तिरंगे को गर्व से लहरा दिया। यह उस राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष था, जिसने सिद्ध किया कि जब राष्ट्र सर्वोपरि होता है, तब इतिहास कुछ समर्पित लोगों के हाथों नया अध्याय लिखता है।

जब संगठन ने राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि माना

स्रोत सामग्री के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक परम पूजनीय श्री गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर के मार्गदर्शन में दादरा और नगर हवेली को मुक्त कराने की एक सुविचारित योजना बनाई गई। इस अभियान में संघ के अनुशासित स्वयंसेवकों ने आजाद गोमांतक दल और यूनाइटेड फ्रंट ऑफ गोअन्स के साथ मिलकर कार्य किया। 

इस अभियान का संचालन पुणे को केंद्र बनाकर किया गया। स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया गया, संसाधनों की व्यवस्था की गई और पूरे अभियान को अत्यंत गोपनीय रखा गया। विभिन्‍न स्रोत में उल्लेखित जानकारी के अनुसार प्रसिद्ध संगीतकार सुधीर फड़के, भारत रत्न लता मंगेशकर तथा महान गायक मोहम्मद रफी ने एक विशेष संगीत कार्यक्रम के माध्यम से इस अभियान के लिए आर्थिक सहयोग जुटाया। 

निश्‍चित ही यह उस दौर की राष्ट्रीय चेतना का एक अनुपम उदाहरण था, जब कलाकार भी राष्ट्रहित के लिए स्वयं को समर्पित कर रहे थे। डॉ. पी. डी. गायतोंडे अपनी पुस्तक "The Liberation of Goa" में उल्लेख करते हैं कि पुणे के स्वयंसेवकों ने हथियारों और रसद की व्यवस्था में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। वहीं नीलेश कुलकर्णी की पुस्तक "Uprising: The Liberation of Dadra and Nagar Haveli" (हार्पर कॉलिन्स इंडिया, 2024) इस पूरे अभियान की पृष्ठभूमि, संगठन और रणनीति का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है।

29 वीरों का साहस और 300 हथियारबंद सैनिकों की चुनौती

22 जुलाई 1954 को दादरा की मुक्ति के साथ अभियान ने गति पकड़ी, लेकिन निर्णायक संघर्ष सिलवासा में होना था। स्रोत सामग्री के अनुसार 1 अगस्त 1954 की रात राजाभाऊ वाकणकर और विश्वनाथ लवांडे के नेतृत्व में मात्र 29 स्वयंसेवकों और क्रांतिकारियों ने पुर्तगाली चौकी की ओर प्रस्थान किया।

उनके पास केवल कुछ पिस्तौल और पुरानी राइफलें थीं, जबकि सामने आधुनिक हथियारों से लैस सैकड़ों पुर्तगाली सैनिक थे। ऐसी विषम परिस्थिति में स्वयंसेवकों ने अद्भुत मनोवैज्ञानिक रणनीति अपनाई। "भारत माता की जय" और "हर-हर महादेव" के गगनभेदी उद्घोष से उन्होंने ऐसा वातावरण निर्मित किया कि पुर्तगाली सैनिकों को विशाल भारतीय सेना के पहुँचने का भ्रम हो गया। एक तरह से देखें तो यह अदम्य आत्मविश्वास, संगठन और राष्ट्रभक्ति की शक्ति थी।

वे नाम जिन्हें इतिहास सदैव याद रखेगा

वैसे दादरा और नगर हवेली की मुक्ति की इस गाथा में अनेक नाम प्रेरणा के स्रोत हैं। राजाभाऊ वाकणकर ने अग्रिम पंक्ति में नेतृत्व किया। विश्वनाथ लवांडे ने निर्णायक संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाबासाहेब पुरंदरे, प्रभाकर कुलकर्णी, नाना काजरेकर और प्रभाकर सिनारी जैसे अनेक कार्यकर्ताओं ने इस अभियान को सफल बनाने में अपना योगदान दिया, लेकिन इस संघर्ष की सबसे बड़ी शक्ति वे अनाम वनवासी परिवार थे, जिन्होंने स्वयंसेवकों को जंगलों के रास्ते दिखाए, भोजन उपलब्ध कराया और विदेशी शासन के विरुद्ध अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की। इतिहास के पन्नों में भले उनके नाम कम दर्ज हों, किंतु इस विजय में उनका योगदान अमिट है।

2 अगस्त 1954 : जब तिरंगा गर्व से लहरा उठा

रातभर चले संघर्ष के बाद 2 अगस्त 1954 की सुबह वह ऐतिहासिक क्षण आया, जिसकी प्रतीक्षा वर्षों से की जा रही थी। पुर्तगाली ध्वज उतारा गया और शासकीय भवन पर भारत का तिरंगा पूरे सम्मान और गौरव के साथ फहराया गया। उस क्षण सिर्फ एक ध्वज नहीं बदल रहा था; एक दासता का अंत हुआ था। स्थानीय लोगों की आँखों में आँसू थे, वे स्वतंत्रता के और उत्‍साह से अनायास ही आंखों से बहते हुए आँसू थे। "भारत माता की जय" और "वंदे मातरम्" के उद्घोषों के बीच दादरा और नगर हवेली ने पहली बार स्वयं को स्वतंत्र भारत का अंग महसूस किया।

सात वर्षों का अनूठा संक्रमण और अंततः पूर्ण एकीकरण

मुक्ति के बाद दादरा और नगर हवेली में स्थानीय नेतृत्व के सहयोग से प्रशासनिक व्यवस्था संचालित हुई। स्रोत सामग्री में वरिष्ठ पंचायत के गठन तथा प्रशासनिक व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। अंततः 11 अगस्त 1961 को संविधान के दसवें संशोधन के माध्यम से इसे औपचारिक रूप से भारत का केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया। इसके कुछ ही समय बाद 19 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना ने गोवा, दमन और दीव को भी पुर्तगाली शासन से मुक्त कर भारत की क्षेत्रीय अखंडता को पूर्णता प्रदान की

इतिहास के पन्नों से राष्ट्रचेतना तक

दादरा और नगर हवेली की मुक्ति कहना चाहिए कि स्‍वयंसेवकों के उस राष्ट्रीय संकल्प की विजय थी, जिसने यह सिद्ध किया कि राष्ट्र का स्वाभिमान सरकारों के निर्णयों से सुरक्षित रहता होगा, पर कई बार वह समाज की जागृत चेतना और समर्पित व्यक्तित्वों के त्याग से भी सुरक्षित रहता है।

आज, जब हम स्वतंत्र भारत की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, तब 2 अगस्त 1954 का वह दिन भी उतनी ही श्रद्धा से स्मरण किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वे स्वयंसेवक, आजाद गोमांतक दल के क्रांतिकारी, स्थानीय वनवासी समाज और वे सभी गुमनाम राष्ट्रभक्त, जिन्होंने अपने वर्तमान को राष्ट्र के भविष्य के लिए समर्पित कर दिया, वास्तव में स्वतंत्र भारत के उन अनदेखे प्रहरी हैं जिनकी गाथा जितनी कही जाए, उतनी कम है।

आज जब यहां तिरंगा हवा में लहरा रहा है, तब दादरा और नगर हवेली की उस ऐतिहासिक सुबह की स्मृति भी हमारे सामने खड़ी हो गई है- एक ऐसी सुबह, जिसने बता दिया कि राष्ट्रभक्ति का संकल्प यदि अडिग हो, तो इतिहास की सबसे मजबूत जंजीरें भी टूट जाती हैं और भारत माता का तिरंगा अंततः विजय के साथ आकाश में लहराता ही है।

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