सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद नमाज के लिए चिन्हित भूमि पर शुरू हुआ विरोध

 स्थानीय रहवासियों ने पुश्तैनी कृषि भूमि बताते हुए उठाए सवाल

 अब व्यवस्था के व्यावहारिक पक्ष पर भी बहस तेज

धार की वाग्देवी भोजशाला में सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम निर्देश के बाद जिस स्थिति की आशंका व्यक्त की जा रही थी, घटनाक्रम अब उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। न्यायालय द्वारा विवादित परिसर से सटी भूमि पर जुम्मे की नमाज की अंतरिम व्यवस्था करने के निर्देश के बाद प्रशासन ने दो स्थान चिन्हित किए, लेकिन इन्‍हें लेकर स्थानीय रहवासियों ने खुलकर विरोध शुरू कर दिया है। सर्वे नंबर 611 की भूमि को अपनी सात पीढ़ियों की पुश्तैनी कृषि भूमि बताते हुए लोगों ने प्रशासन पर बिना सूचना धार्मिक उपयोग के लिए भूमि चिन्हित करने का आरोप लगाया है। इससे भोजशाला विवाद एक बार फिर केवल न्यायालय के आदेश तक सीमित न रहकर सामाजिक, प्रशासनिक और व्यवहारिक बहस का विषय बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तेज हुई प्रशासनिक गतिविधियां

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के पालन में धार कलेक्टर राजीव रंजन मीणा और पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा ने देर शाम भोजशाला परिसर के पीछे स्थित भूमि का निरीक्षण किया। सुरक्षा व्यवस्था, बैरिकेडिंग और अन्य आवश्यक तैयारियों का जायजा लेने के बाद प्रशासन ने नमाज की व्यवस्था के लिए तीन स्थान चिन्हित किए। प्रशासन का उद्देश्य न्यायालय के आदेश का पालन सुनिश्चित करना था, लेकिन आदेश लागू होने से पहले ही स्थानीय स्तर पर विरोध सामने आ गया।

विशेष रूप से भोजशाला परिसर के पीछे स्थित सर्वे नंबर 611 की भूमि को लेकर विवाद गहरा गया। बड़ी संख्या में स्थानीय रहवासी पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे और विरोध प्रदर्शन करते हुए कहा कि जिस भूमि को नमाज के लिए चिन्हित किया गया है, वह उनकी पुश्तैनी कृषि भूमि है, जिस पर उनका परिवार कई पीढ़ियों से खेती-बागवानी करता आ रहा है।

रहवासियों का दावा- राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है हमारा नाम

धार में जुमे की नमाज के लिए भोजशाला परिसर की बाउंड्रीवॉल से सटी खसरा नंबर 611 और 612 की भूमि पर प्रशासन द्वारा अनुमति दिए जाने के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। स्थानीय रहवासियों ने इस निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताते हुए दावा किया है कि जिस भूमि पर नमाज की अनुमति दी गई है, वह उनकी निजी स्वामित्व वाली कृषि भूमि है और वे वर्षों से उस पर खेती करते आ रहे हैं।

स्थानीय निवासी चंद्रकांत देवड़ा ने कहा, "जिस स्थान पर नमाज की अनुमति दी गई है, वह हमारी जमीन है। हम लंबे समय से इस पर खेती कर रहे हैं। हमारी अनुमति के बिना वहां किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि नहीं होने देंगे।"

वहीं राधाबाई ने भी प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि नमाज की व्यवस्था के लिए उनकी भूमि को समतल करने अथवा किसी अन्य प्रकार की कार्रवाई की जाती है, तो उसका पुरजोर विरोध किया जाएगा। उन्होंने कहा, "जब तक भूमि के स्वामित्व का विवाद स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक हमारी जमीन पर किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। यदि हमारे अधिकारों का अतिक्रमण करने का प्रयास हुआ, तो हम न्यायालय की शरण लेकर अपने स्वामित्व और अधिकारों की रक्षा करेंगे।"

विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि भूमि के स्वामित्व से जुड़े सभी राजस्व अभिलेख, रसीदें और दस्तावेज उनके नाम पर उपलब्ध हैं। उनका आरोप है कि प्रशासन ने बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के उनकी भूमि को धार्मिक गतिविधि के लिए चिन्हित कर दिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि उनकी फसलों को नुकसान पहुंचा या उनकी अनुमति के बिना भूमि का उपयोग किया गया तो वे न्यायालय सहित सभी कानूनी विकल्प अपनाएंगे।

प्रशासन ने संबंधित पक्षों से स्वामित्व संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है। इससे स्पष्ट है कि न्यायालय के आदेश के पालन के साथ-साथ भूमि स्वामित्व का प्रश्न भी अब प्रशासन के सामने महत्वपूर्ण चुनौती बनकर उभरा है। इसके बाद सभी अपने मूल जमीन के दस्‍तावेज लेकर भी प्रशासन के पास पहुंच गए हैं। आज इस मामले में विरोध स्‍वरूप ज्ञापन भी सौपा गया है। 

वर्षों पुराने विवाद ने लिया नया मोड़

उल्‍लेखनीय है कि धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर देश के सबसे चर्चित धार्मिक-पुरातात्विक विवादों में शामिल रहा है। दशकों तक चली कानूनी लड़ाई में हिंदू पक्ष ने इसे मां वाग्देवी सरस्वती का प्राचीन साधना एवं ज्ञान केंद्र बताया, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद से जुड़ा धार्मिक स्थल मानता रहा। जिस पर कि पिछले वर्षों में हुई पुरातात्विक जांच और न्यायिक सुनवाई के दौरान अनेक ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए। 

इन्हीं आधारों पर विभिन्न न्यायिक आदेशों में हिंदू पक्ष के दावों को महत्वपूर्ण आधार मिला। इसके बाद व्यापक स्तर पर यह धारणा बनी कि भोजशाला को उसके ऐतिहासिक स्वरूप के अनुरूप मान्यता मिलने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय ने अंतिम निर्णय आने तक मुस्लिम समुदाय के लिए विवादित परिसर से सटी भूमि पर जुम्मे की नमाज की अंतरिम व्यवस्था करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित स्थान व्यवहारिक रूप से उपयुक्त न हो तो दोनों पक्षों की सहमति से निकटवर्ती किसी अन्य स्थान का चयन किया जा सकता है।

यहीं से शुरू हुई नई बहस

स्थानीय विरोध के बाद अब बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं रह गई कि नमाज कहां होगी, बल्कि इस प्रश्न पर भी केंद्रित हो गई है कि क्या विवादित परिसर से बिल्कुल सटे क्षेत्र में नियमित धार्मिक गतिविधि भविष्य में स्थायी समाधान का मार्ग प्रशस्त करेगी या फिर प्रत्येक शुक्रवार प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी करेगी।

इसी संदर्भ में अनेक सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों द्वारा अयोध्या प्रकरण का उदाहरण भी दिया जा रहा है। उनका तर्क है कि अयोध्या में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए विवादित स्थल से 22 से 25 किलोमीटर, यानी काफी दूरी पर वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराई गई थी। ऐसे में यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि यदि उद्देश्य सम्मानजनक धार्मिक व्यवस्था उपलब्ध कराना है, तो क्या धार में भी विवादित परिसर से कुछ दूरी पर जो एक किलोमीटर पर स्‍थ‍ित है, वहां मुसलमान अपनी नमाज अदा नहीं कर सकते हैं? 

हर शुक्रवार प्रशासन के सामने रहेगी चुनौती

यदि वर्तमान अंतरिम व्यवस्था इसी स्वरूप में जारी रहती है तो प्रत्येक शुक्रवार प्रशासन के सामने सुरक्षा, यातायात नियंत्रण, भीड़ प्रबंधन और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती बनी रह सकती है। भोजशाला पहले से ही संवेदनशील स्थल माना जाता रहा है, जहां वर्षों से विशेष सुरक्षा व्यवस्था के बीच धार्मिक गतिविधियां संचालित होती रही हैं।

अब यदि विवादित परिसर से सटी भूमि पर भी नियमित धार्मिक गतिविधियां होंगी तो प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी। स्थानीय विरोध के बाद यह जिम्मेदारी और अधिक चुनौतीपूर्ण दिखाई दे रही है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है, वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि उनकी निजी भूमि और कृषि अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए। उनके पास स्वामित्व संबंधी दस्तावेज उपलब्ध हैं और वे उन्हें प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत कर दिए गए हैं । 

दूसरी ओर प्रशासन ने भी दस्तावेजों की जांच के बाद आगे की कार्रवाई का संकेत दिया है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण रहेगा कि भूमि के स्वामित्व संबंधी दावों का समाधान किस प्रकार किया जाता है। यानी अभी एक विवाद भोजशाला का पूरी तरह से मिटा नहीं कि यह एक दूसरा विवाद अनेक भूमि स्‍वामियों की निजि संपत्‍त‍ि और नमाज के लिए सुलभ जमीन को लेकर खड़ा होता हुआ दिखता है।