किसी राजनेता या मनुष्य की पहचान यही है कि कठिन, विकट और विपरीत परिस्थितियों में भी बिना दबाव में आए, डरे या सहमे हुए, आत्मविश्वास के साथ व्यापक और बड़े लक्ष्य निर्धारित करे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के सत्ता के जीवन का मूल्यांकन करें तो आपको दिख जाएगा कि उन पर यह सिद्धांत सटीक बैठता है। कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। यह संभव ही नहीं कि निर्धारित किए गए सभी बड़े लक्ष्य उसी रूप में हासिल भी हो जाएँ। सरकार के प्रमुख होने के नाते जो लक्ष्य निर्धारित होते हैं, उनमें केवल मंत्रिमंडल ही नहीं, नौकरशाह, केंद्र से लेकर राज्य और निचले स्तर तक के सभी सरकारी कर्मचारियों, मशीनरी और देश के लोगों की भी भरपूर भागीदारी और सहयोग चाहिए होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब इतिहास में सर्वाधिक निंदा, आलोचना, विरोध और पूरा राजनीतिक जीवन समाप्त करने के शक्तिशाली हमलों तथा षड्यंत्रों से जूझते हुए राष्ट्रीय क्षितिज पर आए, तो अपने भाषणों से उन्होंने देश में अपेक्षाएँ बढ़ाईं। श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में अपने पहले भाषण में उन्होंने कहा कि मैं यह नहीं कहता कि हमें बदला हुआ कानून और बदली हुई पूरी व्यवस्था मिले, तभी मैं विकास करूँगा, बल्कि जो ढाँचा है, उसी में मैं भारत को विश्व की प्रमुख शक्ति बनाऊँगा। स्वाभाविक ही देश ने उन पर विश्वास किया और उसके अनुरूप उन्हें 2014 में चुनावी सफलता मिली।

सरकारी योजनाओं की सफलता में संघ विचार परिवार की भूमिका

प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के कार्यक्रमों की सफलताओं के बड़े अंश का दायित्व उस पूरे संघ विचार परिवार को भी जाता है, जिसके वे स्वयंसेवक और प्रचारक रहे हैं। दरअसल, भाजपा अन्य पार्टियों से इस मायने में भिन्न है, क्योंकि पूरे संघ संगठन परिवार के लोगों के अंदर यह भाव रहता है कि यह पार्टी या तो हमारी विचारधारा और लक्ष्य का प्रतिनिधित्व करती है या कम से कम उसके सबसे निकट है। इसलिए जो कुछ उन्हें अपने अनुकूल लगता है, उसमें चरित्र के अनुरूप संगठन लग जाते हैं। कोई विरोधी भले ही नकारे, लेकिन मोदी की सफलताएँ भी अद्भुत हैं। इनका व्यापक विवरण यहाँ देना संभव नहीं है। कुछ उदाहरण ले सकते हैं—सरकारी नीतियों में समाज सुधार जैसे कार्यक्रम, यानी स्वच्छता अभियान, उज्ज्वला योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सौर ऊर्जा अपनाएँ और बिजली बेचें, खेत की मेड़ों पर वृक्ष लगाएँ, फुहारे वाली यानी स्प्रिंकल सिंचाई का उपयोग करें, मोबाइल का धन लेने और भुगतान में उपयोग करें, लखपति दीदी योजना तथा सरकारी जमीन और आवास की रजिस्ट्री घर की महिलाओं के नाम करवाना आदि।

योजनाओं से बदली लोगों की मानसिकता और व्यवहार

समाज के निचले स्तर पर इनके प्रभावों का अध्ययन करने वाले निष्पक्ष लोग देख रहे हैं कि क्या हुआ। यह नहीं कहा जा सकता कि जैसे लक्ष्य थे और जिस प्रकार अभियान आरंभ हुआ, वैसे ही सब कुछ हो गया। लेकिन लोगों के अंदर स्वच्छता, स्वच्छ ईंधन, सिंचाई में पानी बचाने आदि का विचार पैदा हुआ। यह भी सच है कि अनेक राज्यों में सरकारी महकमों ने लोगों के बीच जाकर जन-जागरूकता फैलाने और अभियान के स्तर पर इन कार्यक्रमों को सफलता तक ले जाने की ईमानदार भूमिका नहीं निभाई। अगर हमारे स्वभाव में ही गंदगी है, तो फिर कोई प्रधानमंत्री उसे पूरी तरह दूर नहीं कर सकता। इसके बावजूद यह मानना पड़ेगा कि 2014 से लेकर 2026 तक लोगों की मानसिकता, व्यवहार और इन कार्यक्रमों की परिणतियों में बहुत बड़ा अंतर आया है।

राजनीतिक विरोध के कारण सामाजिक अभियानों को अपेक्षित सहयोग नहीं

विरोधियों में नरेंद्र मोदी और भाजपा आदि को लेकर अजीब किस्म की वितृष्णा और घृणा है। इसलिए वे हर कार्यक्रम का मजाक उड़ाते हैं और स्वाभाविक ही देश के नागरिक तथा नेता के नाते उन्हें जैसा सहयोग मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता है। सारे विषय सामाजिक-आर्थिक क्रांति के हैं और इसमें सबकी भागीदारी चाहिए, जो नहीं हो पाई है। राहुल गांधी से लेकर अनेक नेता स्वच्छता अभियान का मजाक उड़ाते हैं, लेकिन क्या उनका दायित्व नहीं था कि इसमें सहभागिता करके इसे सफलता तक ले जाने के लिए परिश्रम करें? स्वच्छता अभियान तो गांधी जी के जन्मदिवस पर आरंभ हुआ और उनके डेढ़ सौवें जन्मशती वर्ष को ध्यान में रखते हुए शुरू किया गया।

शिक्षा सुधार में बदलाव, लेकिन क्रियान्वयन में चुनौतियाँ

इसी तरह प्राथमिक से लेकर मध्य विद्यालयों का कलेवर बदलने के अनेक कार्यक्रम नरेंद्र मोदी सरकार ने दिए और इनमें स्मार्ट क्लास भी एक था। यह सफेद झूठ है कि इस दिशा में कुछ नहीं हुआ। अगर आप धरातल पर जाएँगे, तो बहुत कुछ हुआ है, लेकिन फिर सरकारी महकमों और पंचायतों की भूमिका कई स्तरों पर शर्मनाक रही है। जब ग्राम पंचायत के प्रधान और वहाँ के वार्ड मेंबर ही चोरी करने लगेंगे और उनका उद्देश्य कार्यक्रम की सफलता से ज्यादा धन कमाना होगा, तो कठिनाई आएगी। इन सबके बावजूद जमीनी स्तर पर इन कार्यक्रमों को काफी हद तक सफलता मिली है और परिवर्तन साफ दिखाई देता है। जहाँ लोग जागरूक थे, वहाँ परिवर्तन आया है और वैसे स्कूलों की संख्या भारत में अब कम नहीं है। शिक्षा सुधार की दृष्टि से नई शिक्षा नीति स्वतंत्रता के बाद ऐसा पहला प्रयास है, जिसमें छात्रों के बचपन से लेकर युवावस्था तक उनकी वास्तविक प्रतिभा के साथ आगे बढ़ने, अनुभवों के साथ उनकी जीवन दिशा स्वयंमेव निर्धारित होने तथा भारत की विविधताओं से एक-दूसरे को परिचित कराने के कार्यक्रम हैं। जहाँ जितना लागू हो रहा है, वहाँ धीरे-धीरे परिवर्तन आ रहा है, लेकिन जिन सरकारों को या सरकार के अंदर बैठे विकृत मानसिकता वाले विशेषज्ञों और अधिकारियों को किसी तरह केवल विरोध करना है और इसे भगवाकरण बताना है, वहाँ आप क्या कर सकते हैं?

विदेश नीति और आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई में भी एकजुटता जरूरी

विदेश नीति और आतंकवाद विरोधी नीतियों तक का जब देश में विरोध होगा और एकजुटता नहीं दिखेगी, तो किसी भी प्रधानमंत्री के लिए शत-प्रतिशत सफलता तक पहुँचना कठिन होगा। इसके बावजूद मोदी सरकार ने पाकिस्तान के संदर्भ में सीमा पार आतंकवाद पर घर में घुसकर मारने का जो साहस दिखाया, उसे दुनिया स्वीकार रही है। जम्मू-कश्मीर पहले से मौलिक तौर पर ज्यादा सुरक्षित हुआ है। पूरे वातावरण और राज्य के चरित्र में आमूल परिवर्तन आ चुका है। अभी इसकी पूर्ण सुरक्षा और पाकिस्तान की हरकतों पर संपूर्ण नियंत्रण होना शेष है।

जातीय पहचान की राजनीति से बाहर निकलने की चुनौती

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को केंद्र में रखकर देखें, तो कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जो वाकई चिंताजनक हैं और उन पर गहराई से ध्यान केंद्रित कर काम करने की आवश्यकता है। उन्हें देश ने भारत के पहले हिंदू नेता के रूप में सिर पर बिठाया और ऐतिहासिक लोकप्रियता दी। इसे और आगे ले जाने का दायित्व उनके नेतृत्व में समूची सरकार और भाजपा का था और है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में जातीय पहचान और जातीय अस्तित्व का कारक फिर डरावने रूप में खड़ा हुआ है। अगर तुरंत सचेत होकर इससे साहसपूर्वक राजनीतिक जोखिम उठाकर बाहर निकलने और देश को निकालने के लिए व्यवहार तथा नीतियों में बदलाव नहीं किए गए, तो यह फिर से बहुत बड़ी समस्या बन सकती है।

2047 के लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध और योग्य टीम की जरूरत

दूसरे, जब देश को 2047 तक दुनिया की बड़ी शक्तियों के समक्ष हर दृष्टि से खड़ा करने का लक्ष्य है, तब सरकार और संसद से लेकर पार्टी के अंदर उसी तरह के प्रतिबद्ध, योग्य, समझ रखने वाले और इसके लिए ही जान लगा देने वाले लोगों की संख्या होनी चाहिए। ऐसा न हो कि पार्टी के ज्यादातर नेता स्वयं को सुरक्षित करने में लगे रहें और केवल औपचारिक रूप से कार्यक्रमों में भागीदारी करें। मोदी जी और उनके निकटतम साथी गृह मंत्री अमित शाह ने जो किया, वह अद्भुत है। लेकिन क्या भाजपा में ऐसी टीम खड़ी हो रही है, जो इतनी व्यापक सोच, प्रतिबद्धता और निष्ठा से केवल देश को केंद्र में रखकर राजनीति और सत्ता का संचालन करे? उनके जिम्मे ये दो महत्वपूर्ण दायित्व हैं, जिन्हें उन्हें अपने सेवानिवृत्त होने से पहले हर हाल में पूरा करना चाहिए।

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