दुनिया जब 21 सितंबर को ‘अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस’ के रूप में याद करती है, तब मन में एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि शांति की यह तलाश आखिर कितनी पुरानी है? क्या यह केवल आधुनिक युद्धों, परमाणु हथियारों और देशों के बीच बढ़ते तनाव से पैदा हुई चिंता है, या मनुष्य ने बहुत पहले ही यह समझ लिया था कि साथ रहने के लिए केवल शक्ति पर्याप्त नहीं, एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करने की दृष्टि भी चाहिए?

सनातन संस्कृति में इस प्रश्न का उत्तर किसी युद्ध-विराम की शर्त के रूप में नहीं मिलता। वह एक छोटे-से वाक्य में पूरी पृथ्वी को परिवार मान लेने की कल्पना करता है, “वसुधैव कुटुम्बकम्।” यह विचार उस समय सामने आया, जब आज जैसी राष्ट्र-राज्य की सीमाएँ और वैश्विक संस्थाएँ अस्तित्व में नहीं थीं। फिर भी ऋषियों की चिंता केवल अपने समुदाय या अपने समय तक सीमित नहीं थी। वे मनुष्य के बीच सामंजस्य की कामना करते हैं, सभी प्राणियों में एक ही आत्मतत्त्व देखने की बात करते हैं, पृथ्वी को माता और स्वयं को उसका पुत्र कहते हैं तथा अंत में समूचे जगत के लिए शांति की प्रार्थना करते हैं।

इसीलिए अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस के अवसर पर जब हम भारत की ओर देखते हैं तो प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि सनातन परंपरा में ‘शांति’ शब्द कितनी बार आया है। असली प्रश्न यह है कि जिस सभ्यता ने ‘यह अपना है और यह पराया’ जैसी सीमित सोच को छोटे मन की बात कहा, उसने शांति और सह-अस्तित्व को किस तरह समझा था? वेदों के मंत्रों, उपनिषदों की अनुभूति और गीता के उपदेशों को साथ रखकर देखें तो एक ऐसी दृष्टि सामने आती है, जिसमें शांति युद्ध न होने से कहीं व्यापक है। वह मनुष्य के भीतर से शुरू होकर परिवार, समाज, प्रकृति और अंततः पूरी वसुधा तक जाती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का मूल संदर्भ महाउपनिषद् के छठे अध्याय में मिलता है—

अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

अर्थात्, ‘यह अपना है और यह पराया है’, ऐसी गणना संकीर्ण चित्त वाले लोग करते हैं। उदार चरित्र वाले लोगों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है।

इस श्लोक में शांति की एक बुनियादी शर्त दिखाई देती है। जब मनुष्य अपनी पहचान और हित को इतना सीमित कर लेता है कि दूसरे का अस्तित्व उसे खतरा लगने लगता है, तब संघर्ष की जमीन तैयार होती है। इसके विपरीत, उदारता का अर्थ है अपने हित के दायरे को इतना विस्तृत करना कि उसमें दूसरे के अस्तित्व के लिए भी स्थान रहे। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इसी व्यापक चेतना का नाम है। शांति की यह दृष्टि वैदिक साहित्य में भी दिखाई देती है, ऋग्वेद 10.191.2 में कहा गया है—

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते॥

अर्थात साथ चलो, मिलकर संवाद करो और तुम्हारे मनों में परस्पर समझ विकसित हो। अगले मंत्र में कहा गया है—

समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहचित्तमेषाम्।

अर्थात् सभा और विचार-विमर्श में सामंजस्य हो तथा सबके मनों में परस्पर समझ हो।

सनातन संस्कृति में शांति के लिए संवाद को आधार बनाया गया है। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद का परिणाम अनिवार्य रूप से वैमनस्य या हिंसा हो, ऐसा आवश्यक नहीं। संवाद का रास्ता खुला रहे तो असहमति भी सामाजिक जीवन का हिस्सा बनी रह सकती है। आज के लोकतांत्रिक समाज में इस वैदिक आग्रह को नए संदर्भ में समझा जा सकता है। सनातन परंपरा में शांति का संबंध केवल बाहरी संसार से नहीं, मनुष्य के अंतर्मन से भी है। तैत्तिरीय उपनिषद् के शांति-पाठ में कहा गया है—

शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

यहाँ मित्र, वरुण, अर्यमा, इंद्र, बृहस्पति और विष्णु से कल्याण और मंगल की प्रार्थना की गई है। आगे सत्य और ऋत के पालन का संकल्प आता है।

शांति का यह घोष भारतीय परंपरा में बहुत अर्थपूर्ण है। जीवन में आने वाले विघ्नों और अशांति से मुक्ति की कामना के साथ मनुष्य स्वयं को सत्य और ऋत के अनुशासन से जोड़ता है। इसका संकेत यह है कि बाहरी शांति के लिए भीतर का संतुलन भी आवश्यक है। ईशावास्य उपनिषद् में शांति का आधार और गहरा हो जाता है—

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥

अर्थात् जो सभी प्राणियों को अपने आत्मस्वरूप में और अपने आत्मतत्त्व को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता।

यहाँ शांति केवल समझौते का विषय नहीं रह जाती, बल्कि दृष्टि का विषय बन जाती है। यदि दूसरे में भी वही जीवन दिखाई देने लगे, तो उसके प्रति घृणा और हिंसा का आधार कमजोर पड़ता है। उपनिषद् की यह अनुभूति व्यक्ति को अपने सीमित अहं से बाहर ले जाती है। भगवद्गीता में इसी भाव का आचरणपरक रूप दिखाई देता है—

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

अर्थात् जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से मुक्त रहता है तथा सुख-दुःख में संतुलित रहता है, वह श्रेष्ठ आचरण वाला है।

गीता का यह संदेश शांति को निष्क्रियता नहीं बनाता। मैत्री, करुणा, क्षमा और समत्व मनुष्य के सक्रिय आचरण के गुण हैं। शांति का अर्थ कठिन परिस्थितियों से भागना नहीं, बल्कि क्रोध, द्वेष और अहंकार को अपने निर्णयों का संचालक न बनने देना है। सनातन शांति-दृष्टि का विस्तार मनुष्य से आगे प्रकृति तक जाता है। आज पर्यावरण संकट, जल संकट और जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय विषय नहीं रह गए हैं। इनके कारण संसाधनों को लेकर समाजों और देशों के बीच तनाव भी बढ़ सकता है। ऐसे समय में पृथ्वी के साथ संबंध को अधिकार के साथ-साथ उत्तरदायित्व के रूप में देखने वाली यह वैदिक दृष्टि महत्वपूर्ण हो उठती है। भारतीय प्रार्थना-परंपरा में एक मंगलकामना लंबे समय से प्रचलित है—

सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

अर्थात् सभी सुखी हों, सभी स्वस्थ रहें, सभी कल्याण देखें और कोई भी दुःख का भागी न बने।

इस प्रार्थना का भाव भी ध्यान देने योग्य है। यहाँ मंगलकामना केवल अपने लिए नहीं है। उसमें ‘सभी’ शब्द बार-बार आता है। भारतीय चिंतन में लोककल्याण की यह भावना अनेक धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में दिखाई देती है।ऋग्वेद संवाद और सामंजस्य की बात करता है। उपनिषद् दूसरे में अपने अस्तित्व को देखने की दृष्टि देता है। गीता मैत्री, करुणा, क्षमा और समत्व को आचरण का आधार बनाती है। अथर्ववेद पृथ्वी को माता मानकर प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व जगाता है। महाउपनिषद् इसी व्यापक चेतना को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के रूप में अभिव्यक्त करता है।

इस दृष्टि में शांति केवल राजाओं और राज्यों की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार में संवाद, समाज में सहिष्णुता, मतभेदों में मर्यादा, प्रकृति के प्रति संयम और दूसरे के अस्तित्व का सम्मान, ये सभी शांति के छोटे-छोटे आधार हैं। इसीलिए सनातन परंपरा की शांति-दृष्टि को केवल युद्ध-विरोधी विचार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह जीवन के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण है।आज दुनिया पहले से कहीं अधिक जुड़ी हुई है। एक देश में पैदा हुआ आर्थिक संकट दूसरे देश को प्रभावित करता है, एक क्षेत्र का युद्ध दूर बैठे समाजों तक उसकी आंच पहुँचा सकता है और पर्यावरण का संकट किसी सीमा-रेखा को नहीं मानता। ऐसे समय में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ और व्यापक हो जाता है।
 

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