वन्दे मातरम् का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह स्वतंत्रता आंदोलन का सर्वाधिक चर्चित नारा बन गया और संपूर्ण देश में स्वतंत्रता सेनानी इसका मंत्र की तरह जाप करते थे। वह तो था ही, पर इससे भी बड़ा कारण यह था कि आधुनिक युग में भारत की राष्ट्रीय एकात्मता का सूत्र पहली बार इस मंत्र ने गढ़ा। हजारों वर्षों के इतिहास में ऐसा कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता कि किसी एक गीत अथवा संदेश अथवा उद्घोष ने संपूर्ण देश में राष्ट्रीय एकात्मता का ऐसा ज्वार उत्पन्न कर दिया हो, जैसा वन्दे मातरम् के घोष ने किया। यह एक असाधारण ऐतिहासिक घटना थी। इसकी विवेचना किए बिना हम वन्दे मातरम् के महत्व को नहीं समझ सकते।


भारत की पराधीनता का एक हजार वर्ष का कालखंड वास्तव में राष्ट्रीय एकता के छिन्न–भिन्न होने का भी कालखंड रहा है। यद्यपि यह एकात्मता राजनैतिक स्तर पर ही खंडित हुई थी; धार्मिक, सांस्कृतिक अथवा सामाजिक दृष्टि से भारत कभी खंडित नहीं हुआ, तथापि राजनैतिक स्तर पर हुए इस विखंडन के घोर दुष्परिणाम देश की जनता ने भोगे। सबसे बड़ी हानि यह हुई कि एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश के सुख– दुःख के प्रति निरपेक्ष बने रहे। एक राज्य में मन्दिर तोड़े जाते रहे और दूसरा राज्य उत्सव मनाता रहा। एक राज्य आतताईयों द्वारा रौंदा जाता रहा और दूसरा राज्य तीर्थयात्राएं करता रहा। एक राजा मुगल दरबारों में हाजिरी लगाता था तो दूसरे राजा का जीवन घोड़े की पीठ और युद्ध मैदानों में व्यतीत हो गया और तीसरा राजा इन सब से अनभिज्ञ जनता से कर एकत्र करने में व्यस्त रहा। इस अवधि में कोई ऐसा राजनैतिक व्यक्तित्व, महानायक अथवा रणनीतिकार देश में दिखाई नहीं देता जो संपूर्ण देश को एकसूत्र में बाँधे रखने में समर्थ होता। जैसे कभी चाणक्य और चंद्रगुप्त ने संपूर्ण देश को एकसूत्र में बांधकर राजनैतिक एकात्मता स्थापित की थी। देश की एकता केवल धार्मिक और सांस्कृतिक ताने–बाने पर टिकी रही।

भारत इसीलिए बचा रहा, क्योंकि यह एक चिर पुरातन सांस्कृतिक राष्ट्र है। आधुनिक पश्चिमी राष्ट्रों की तरह केवल राजनैतिक राष्ट्र होता तो यह कभी का नष्ट हो गया होता। भारत की यह खोई हुई राजनैतिक एकता हमको प्रथम बार बीसवीं सदी के आरम्भ में प्रकट होती दिखाई पड़ती है और इसका आधार बनता है वन्दे मातरम्।


सन् 1905 में अंग्रेजों ने खंडित तो केवल बंगाल प्रांत को ही किया था, पर वेदना पूरे भारतवर्ष ने महसूस की। सारे देश में उबाल आ गया और गाँव–गाँव में वन्दे मातरम् का जयघोष गूंज उठा। वन्दे मातरम् नारा नहीं मंत्र बन गया। कहाँ कलकत्ता और कहाँ सैकड़ों कोस दूर धुर दक्षिण में मद्रास! एक युवा तमिल क्रांतिकारी कवि सुब्रह्मण्यम भारती इस वन्दे मातरम् की डोर से खिंचा चला हुआ कलकत्ता आ पहुँचता है और भगिनी निवेदिता के चरणों में माथा टेक कर इस पावन मंत्र की दीक्षा लेता है। संपूर्ण गीत का तमिल भाषा में अनुवाद कर उसे मद्रास प्रांत के बच्चे–बच्चे के कंठ में उतार देता है। भारत के पश्चिमी छोर पंजाब के लोकनायक लाजपत राय गर्ज उठते हैं कि जब तक जीभ है, वन्दे मातरम् कहता रहूंगा। छोटे–छोटे विद्यार्थी विद्यालयों में वंदे मातरम् का घोष लगा रहे थे और ब्रिटिश सरकार इसको अपराध मान कर उनके पीछे दौड़ रही थी। संपूर्ण देश में एक नया परिदृश्य निर्मित हो रहा था। प्रश्न है कि किसी एक नारे से ऐसा विलक्षण जादू कैसे संभव हुआ? यह जानने के लिए हमें वन्दे मातरम् की पृष्ठभूमि में जाना होगा। उन राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्यों का अध्ययन करना होगा जिनके प्रभाव में बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस अमर गीत की रचना की।


सुविदित है कि इस बांग्ला–संस्कृत मिश्रित गीत की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को की थी, जो बाद में उनके उपन्यास आनंदमठ का अंग बना। आनंदमठ उपन्यास 1882 में छपा। बंकिम चंद्र ने आनंदमठ उपन्यास लिखकर वस्तुत: भारत माता की साकार मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की थी। आनन्द मठ के इस बीजतत्त्व को समझे बिना हम वन्दे मातरम् के भावप्रवाह को नहीं जान सकते। यह उपन्यास लगभग एक सौ बीस वर्ष पूर्व बंगाल में हुए संन्यासी विद्रोह की घटना पर केंद्रित था। ये ब्रह्मचारी संन्यासी भारत माता की पूजा करते हैं। इस तरह आनंद मठ उपन्यास एक ऐसे आधुनिक पुराण की भांति हमारे सामने आता है जो भारतीय जनमानस में भारत भूमि को माता के रूप में स्थापित करता है और भारत माता के साकार स्वरूप को प्रतिष्ठापित करने वाला प्रथम संदर्भ ग्रन्थ बन जाता है। वस्तुत: "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" की वैदिकी अवधारणा आधुनिक काल में अंग्रेजों को चुनौती देने के लिए भारत माता के रूप में अवतरित हुई और इसके मंत्रद्रष्टा ऋषि बने बंकिम चंद्र चटर्जी। राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने वाले गीतों की परम्परा बंगाल में पूर्व से ही चल पड़ी थी, जो अंग्रेजों के दमन का ही नहीं अपितु उनके द्वारा थोपे जा रहे ब्रिटिश सम्राट के प्रति भक्ति के गान "गॉड सेव द किंग" (अथवा "गॉड सेव द क्वीन") का एक प्रत्युत्तर भी थी। इस प्रकार भारत माता के स्तुतिपरक गीत लिखने का संस्कार बंगाल में चल पड़ा था।


वन्दे मातरम् गीत की रचना प्रक्रिया को समझने के लिए बंगाल में आयोजित होने वाले ‘हिंदू मेला’ की पृष्ठभूमि जानना भी आवश्यक है। बंगाल में सन् 1867 में हिंदू मेला प्रारंभ होना एक महत्वपूर्ण उल्लेखनीय घटना थी। एक सुविचारित रणनीति से प्रारंभ किया गया यह मेला वस्तुत: यह कोई सामान्य मेला न होकर राष्ट्रीय भावना और स्वदेशी चेतना के जागरण का सांस्कृतिक उत्सव था। इस मेले में गीत-संगीत, नाटक, कला प्रदर्शन आदि सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा खेलकूद, कुश्ती प्रतियोगिता, आदि शारीरिक प्रदर्शनों के साथ देशभक्ति पूर्ण कविता पाठ और व्याख्यान भी आयोजित होते थे। इसका आयोजन बंगाली वर्ष के अंतिम दिन चैत्र संक्रांति पर किया जाता था। यह भी ध्यान देने की बात है कि यहाँ हिंदू शब्द का तात्पर्य धार्मिक उपासना से संबंधित न होकर, सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पहचान से था। ‘नेशनल मित्र’ के नाम से प्रसिद्ध बंगाली लेखक, कवि नबगोपाल मित्र द्वारा प्रारंभ किए गए इस हिंदू मेला को राजनारायण बसु, मनोमोहन बसु, गणेन्द्रनाथ ठाकुर, देवेंद्रनाथ ठाकुर आदि प्रबुद्धजनों का सहयोग मिला। रबीन्द्र नाथ ठाकुर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ ठाकुर ने हिंदू मेला के अवसर पर एक देशभक्ति गीत की रचना की "मिले सबे भारत संतान, एकतान गाहो गान" इस गीत का हिंदी भावानुवाद इस प्रकार है–


"सब मिल जाओ भारत के संतान,
एक सुर में मन-प्राण लगाकर,
गाओ भारत के यश का गान॥
भारत भूमि के समान कहाँ कोई स्थान?
कौन-सा पर्वत आकाश छूने वाला हिमालय-सा महान?
फल-फूलों से लदी वसुंधरा, पुण्यवती बहती नदियाँ,
सैकड़ों खानों में अनगिनत मणि-रत्नों का खजाना॥
हो भारत की जय, जय भारत की जय,
गाओ भारत की जय॥
क्या डर, क्या भय? गाओ भारत की जय!
रूपवती साध्वी सती भारत की ललना,
कहाँ मिलेगी उनकी तुलना?
शर्मिष्ठा, सावित्री, सीता, दमयंती—पतिव्रता नारियाँ,
अतुलनीय भारत की ललना॥
हो भारत की जय, जय भारत की जय,
गाओ भारत की जय॥
क्या डर, क्या भय? गाओ भारत की जय!
वशिष्ठ, गौतम, अत्रि जैसे महामुनि,
विश्वामित्र, भृगु तपोधन,
वाल्मीकि, वेदव्यास, भवभूति, कालिदास,
कवि-कुल भारत की शान॥
हो भारत की जय, जय भारत की जय,
गाओ भारत की जय॥
क्या डर, क्या भय? गाओ भारत की जय!
वीरों की भूमि यह भारत, वीरों की जननी,
अधीनता ने लाई अंधेरी रात,
पर क्या वह अंधकार चिरस्थायी रहेगा?
देखो, उदय होगा तेजस्वी सूरज॥
हो भारत की जय, जय भारत की जय,
गाओ भारत की जय॥
क्या डर, क्या भय? गाओ भारत की जय!
भीष्म, द्रोण, भीम-अर्जुन, क्या भूल गए?
पृथ्वीराज जैसे वीरगण याद करो!
भारत का सेतु था वे, शत्रुओं के लिए धूमकेतु,
दुखियों के मित्र, दुष्टों का दमन॥
हो भारत की जय, जय भारत की जय,
गाओ भारत की जय॥
क्या डर, क्या भय? गाओ भारत की जय!
क्यों डरते हो, हे भीरु? साहस को अपनाओ,
जिधर धर्म, उधर विजय!
छिन्न-भिन्न, हीनबल होकर भी,
एकता में मिलेगा बल,
माँ का मुख उज्ज्वल होगा निश्चय॥
हो भारत की जय, जय भारत की जय,
गाओ भारत की जय॥
क्या डर, क्या भय? गाओ भारत की जय!"

इस गीत में भारत माता का जयगान करता हुआ कवि भारत की संतानों को इसकी महान परंपराओं का स्मरण कराता है और आह्वान करता है कि हमारी एकता से ही इसको बल मिलेगा तथा भारत माता का मुख उज्ज्वल होगा।
इसी तरह हिंदू मेला के अवसर पर गणेन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बांग्ला गीत लिखा "लज्जय भारत-यश"। इसका हिंदी भावानुवाद इस प्रकार है–


"लज्जा से भारत के यश का गान कैसे गाऊँ मैं,
यह रत्नों का खजाना लुट रहा है परदेस जाकर।
खोजने पर रत्न मिल जाते हैं,
पर उसमें यत्न नहीं करते, आनंद में मदमस्त होकर अवहेलना करते हैं॥
विदेशी लोग भोगते हैं भारत की धन-दौलत,
हाय! इस देश का धन विदेशियों के लिए चला जाता है।
हम सब अपनी मातृभूमि की उपेक्षा करते हैं वहाँ,
माँ की गोद का धन पराए लोग ले उड़ते हैं॥"

 

यह गीत विदेशियों द्वारा भारत माता को लूटने की पीड़ा व्यक्त करता है। ऐसी ही भावभूमि के गीतों, कविताओं और व्याख्यानों के द्वारा यह हिंदू मेला भारतीयों में आत्मगौरव पैदा करने, ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध साहसपूर्वक उठ खड़े होने और राष्ट्रीयता की भावना जगाने का महत्वपूर्ण संगठित प्रयास था। यह प्राचीन हिंदू राष्ट्रीयता के पुनर्जागरण का भी प्रथम प्रयास माना जा सकता है जिसने कालांतर में वीर सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिंदुत्व चिंतन का पथ प्रशस्त किया। ‘वन्दे मातरम्’ इसी पृष्ठभूमि पर रचा गया गीत है, जिसे बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1975 को लिखा और कुछ वर्षों बाद अपने उपन्यास आनंदमठ का अंग बनाया।

आनंदमठ के कलेवर में वन्दे मातरम् गीत इसी तरह विन्यस्त हो गया मानों यह गीत इसी कथानक के लिए रच रखा था। जैसे कोई दिव्य देवप्रतिमा, जो पहले ही निर्मित होकर अपने लिए किसी भव्य मंदिर के निर्माण की बाट जोहती हुई संदूक में लिपटी धरी हो। और वास्तु सम्मत मंदिर निर्मित हो जाने पर जिसकी प्राणप्रतिष्ठा की गई हो।
यह इस गीत की शक्ति का प्रभाव था कि शीघ्र ही यह संपूर्ण देश की धड़कन बन गया। सन् 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में महाकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वयं संगीतबद्ध कर प्रस्तुत किया। वन्दे मातरम् की शक्ति और प्रभाव देखना हो तो हमें बंग–भंग आंदोलन देखना चाहिए।

अंग्रेज शासन द्वारा सन् 1905 में किया गया बंगाल विभाजन, भारत विभाजन का ही एक लघु पूर्वरूप था। यदि हम सन् 1947 के भारत विभाजन से इसकी तुलना करें तो पाएंगे कि सन् 1947 के मुकाबले सन् 1905 में राष्ट्रीय जन जागरण देश में बहुत सीमित क्षेत्रों तक व्याप्त था और इधर ब्रिटिश सरकार भी अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली थी। सन् 1947 के विश्व में तो अंग्रेजों की शक्ति तुलनात्मक रूप में क्षीण हो गई थी। फिर भी 1905 में सारे देश में बंग विभाजन विरोधी जो तूफान उठा उसके आगे अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा और विभाजन वापस लेना पड़ा। इस देशव्यापी संघर्ष का सर्वप्रमुख आधार वन्दे मातरम् था। भारत ही नहीं भारत के बाहर रहने वाले देशभक्त भारतीयों के मन में भी वन्दे मातरम् के प्रति अपार श्रद्धा थी। मैडम भीकाजी कामा ने 1907 में जब पहली बार भारत के बाहर जर्मनी के स्टटगार्ड में जो भारत का ध्वज फहराया, उस पर वंदे मातरम् लिखा हुआ था।


किन्तु यह देश का दुर्भाग्य रहा कि एक सांप्रदायिक दल ने इस गीत में हिंदू देवी की वंदना होने के कारण इसका बहिष्कार कर दिया। इससे भी बढ़कर लज्जास्पद बात यह थी कि कांग्रेस के तात्कालीन नेताओं ने भी सांप्रदायिक तुष्टीकरण के कारण मुस्लिम लीग की आपत्तियों को शिरोधार्य करते हुए वन्दे मातरम् को खंडित कर दिया। विडंबना देखिए कि भारत को खंडित करने की माँग करने वाली मुस्लिम लीग ने ही वन्दे मातरम् को भी खंडित करने की माँग रखी और जिन्होंने वन्दे मातरम् का विखंडन स्वीकार किया उन्हीं ने आगे चलकर भारत विखंडन को भी स्वीकार कर लिया।

1909 में, मुस्लिम लीग की राष्ट्रीय बैठक, अमृतसर में इसके अध्यक्ष सैयद अली इमाम ने 'वन्दे मातरम्' को सांप्रदायिक नारा बताकर इसका विरोध दर्ज कराया था। फिर 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन की घटना को कौन भूल सकता है, जब सदन की अध्यक्षता मौलाना मुहम्मद अली कर रहे थे। प्रख्यात संगीतकार पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने जैसे ही 'वन्दे मातरम्' गाना शुरू किया, मौलाना मुहम्मद अली ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि यह गीत मुस्लिमों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। किन्तु पलुस्कर दृढ़तापूर्वक डटे रहे और पूरा गीत गाकर ही माने। उन्होंने मौलाना को यह कहकर चुप करा दिया कि यह एक राष्ट्रीय मंच है, मस्जिद नहीं। मौलाना मुहम्मद अली मंच छोड़कर चले गए।
अन्ततः मुस्लिम नेताओं के घोर विरोध और कांग्रेसी नेताओं के मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति ने सन् 1937 में इस गीत को स्थाई रूप से खंडित कर दिया। कांग्रेस के फैजपुर अधिवेशन में इसके आरंभिक दो छंद ही स्वीकार किए गए। शेष चार छंद मुस्लिम समुदाय की आपत्तियों के कारण गीत के हटा दिए गए।


देश विभाजन तो 1947 में हुआ था पर इसका पूर्वरूप उसी दिन प्रकट हो गया जब 10 वर्ष पूर्व वन्दे मातरम् का विभाजन हुआ। 1937 में वन्दे मातरम् के टुकड़े करके यह निश्चित कर दिया गया कि आज यदि भारत माता का बीजमंत्र बंटा है तो कल भारत की भूमि भी बंटेगी। मंत्र को खंडित कर हम देवता को नहीं बचा सकते थे। वास्तविकता यह है कि वन्दे मातरम् में जिन हिन्दू प्रतीकों और देवियों का उल्लेख है वे संपूर्ण सृष्टि के सुख–समृद्धि और मंगल की देवियां हैं। हिंदू प्रतीक और हिंदू अवधारणा मूलतः सेक्यूलर चरित्र रखते हैं। यह वही सिद्धांत है जो यह मानता आया है कि हिंदू राज्य कभी सांप्रदायिक नहीं होता। उसका चरित्र मूलतः प्रजातांत्रिक और सर्वपंथ समादार का होता है। वन्दे मातरम् की गंगा ने जिस हिमालय में आश्रय पाया वह आनंद मठ इसका उज्ज्वल साक्ष्य है।


आनंद मठ का एक प्रसंग है। संतान सैनानियों ने अंग्रेज और मुसलमान सैन्य दल को परास्त कर दिया। उनकी कोठियों पर संन्यासियों का कब्जा हो गया। गुरु सत्यानन्द अपने शिष्यों से कहते हैं, "इस समय यह समूचा प्रदेश हमारे अधिकार में आ गया है। अब यहां कोई हमारा प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। अतएव इस वीरेन्द्र भूमि में तुम लोग अपना सन्तान-राज्य प्रतिष्ठित करो। प्रजा से कर वसूल करो और सैन्य-संग्रह करो। हिन्दुओं का राज्य हो गया है, यह सुनकर बहुतेरी संतान-सैन्य तुम्हारे झण्डे के नीचे आ जाएगी।"
सुनकर उनके विजेता शिष्य जीवानन्द कहा–, "यदि आज्ञा हो महाराजाधिराज ! तो हम लोग इसी जंगल में आपका सिंहासन स्थापित कर सकते हैं।"
सत्यानन्द यह सुनकर कुपित हो गए और बोले–


"क्या कहा? क्या मुझे केवल कच्चा घड़ा ही समझ लिया है? हमलोग कोई राजा नहीं है, हम केवल संन्यासी हैं। इस प्रदेश के राजा स्वयं बैकुण्ठनाथ है, जहां प्रजातन्त्र-राज्य स्थापित होगा। नगर अधिकारी के बाद तुम्ही लोग कार्यकर्ता होगे। मैं तो ब्रह्मचर्य-शक्ति के अतिरिक्त और कुछ भी स्वीकार न करूंगा। अब तुम लोग अपने-अपने काम में लगो।"
गुरुदेव के वचनों में तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक, हिंदुओं का राज्य स्थापित हो गया है। दूसरी, हिन्दुओं के इस राज्य में गुरु अथवा कोई भी योद्धा स्वयमेव शासक नहीं, शासन का रक्षक मात्र है। शासक तो बैकुंठनाथ प्रभु हैं। और तीसरी यहाँ प्रजातंत्र राज्य स्थापित होगा। वास्तविक कार्यकर्ता जनता ही होगी।

इन तीनों बातों का समेकित तात्पर्य यही है कि हिंदू राज्य की अवधारणा मूलतः प्रजातांत्रिक और भेदभाव रहित है। विजेता शासक स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर प्रजातांत्रिक प्रणाली को ही स्वीकार करता है।सन् 1982 में बंकिम चंद्र चटर्जी आनंद मठ में जिस हिंदू राज्य की स्थापना का स्वप्न देखते हैं, वह पूर्णतः लोकतांत्रिक राज्य होता है। और यह घटना स्वतंत्रता प्राप्ति से 65 वर्ष पूर्व की है जब भारत माता की एक महान् संतान अपने पराधीन राष्ट्र को न केवल स्वाधीन अपितु लोकतांत्रिक भी बनाने का स्वप्न देखती है।
 

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