सरदार वल्लभभाई पटेल उन विरले महानायकों में से हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए तो संघर्ष किया ही, साथ ही भारतीय नागरिकों के स्वत्व, स्वाभिमान और नागरिक अधिकारों के लिए भी संघर्ष किया। इसका उदाहरण खेड़ा और बारडोली आंदोलनों में मिलता है। आज भारत का जो एकीकृत स्वरूप हम सबके सामने है, उसके निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सरदार वल्लभभाई पटेल की थी।जिन परिस्थितियों में भारत स्वतंत्र हुआ था, वे साधारण नहीं थीं। विभाजन की त्रासदी, करोड़ों शरणार्थियों की सहायता और उपद्रवकारी तत्वों पर नियंत्रण एक विकट समस्या थी। देश के गृहमंत्री के रूप में इन सभी जटिल समस्याओं से निपटने का दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल पर था। उन्होंने बहुत साहस, युक्ति और कुशलता से इन जटिलताओं के निराकरण का मार्ग बनाया। उन्हें एक साथ अनेक मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा। बाहरी समस्याओं के समाधान के लिए भी और सरकार के भीतर अंग्रेजपरस्त तंत्र के अवरोधों से भी। अनेक विषय ऐसे आए, जब उनका प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से खुलकर मतभेद हुआ। ये पाकिस्तान और चीन के प्रति सतर्कता, भाषा और विशेषकर स्वतंत्रता के बाद सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना जैसे विषय थे।

रियासतों का एकीकरण और पटेल की कूटनीतिक कुशलता

भारत के भीतर कुछ ऐसी भी रियासतें थीं, जिन्होंने भारतीय गणतंत्र में मिलने से इनकार कर दिया था और पाकिस्तान से मिलने की घोषणा कर दी थी। इनमें भोपाल, जूनागढ़ और हैदराबाद जैसी रियासतें थीं। जबकि कश्मीर जिन्ना के बहकावे में आकर अनिश्चय की स्थिति में था। सरदार वल्लभभाई पटेल ने जहाँ-जहाँ बिना कोई खून-खराबा किए रियासतों को भारतीय गणतंत्र का अंग बनाया, वहीं जूनागढ़ और हैदराबाद में सैन्य बल भेजकर तथा भोपाल रियासत को युक्ति से भारतीय गणतंत्र से जोड़ा।उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के खुले विरोध के बावजूद सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।

सादगीपूर्ण जीवन और परिवार को राजनीति से दूर रखा

जब 75 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, तब भारत भर में उनका कोई अपना निजी मकान नहीं था। उनका परिवार अहमदाबाद में एक किराये के मकान में रहता था और बैंक खाते में भी केवल 260 रुपये थे। उन्होंने अपने जीवन में अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया। उनके निधन के बाद गुजरात कांग्रेस के आग्रह पर उनकी बेटी को लोकसभा चुनाव लड़ाया गया। ऐसे महानायक सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था।

किसान परिवार में जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

उनके पिता झवेरभाई पटेल एक साधारण किसान थे और माता लाड़बा देवी भारतीय परंपराओं और संस्कृति के लिए समर्पित महिला थीं। वल्लभभाई के तीन बड़े भाई सोमाभाई, नरसीभाई और विट्ठलभाई थे। विट्ठलभाई पटेल भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वल्लभभाई पटेल का विवाह 16 वर्ष की आयु में ही हो गया था और जब वे तैंतीस वर्ष के हुए, तब उनकी पत्नी का निधन हो गया था।

प्रारंभिक शिक्षा और सिद्धांतनिष्ठ व्यक्तित्व

वल्लभभाई की आरंभिक शिक्षा नडियाद में ही हुई। वे पढ़ने में बहुत कुशाग्र थे। निर्धारित पाठ्यक्रम के अतिरिक्त उन्होंने योग और आध्यात्मिक शिक्षा भी ग्रहण की। घर में संतों का आना-जाना था। परिवार के इसी वातावरण ने उन्हें बहुआयामी चिंतक और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ बनाया। वे कितने संकल्पनिष्ठ और सिद्धांतवादी थे, इसका उदाहरण उनके स्कूल जीवन में मिलता है। विद्यालय के एक शिक्षक पढ़ाने के साथ बच्चों पर सामान खरीदने का दबाव बनाते थे। किशोरवय वल्लभभाई ने बच्चों को एकत्र करके इसका विरोध किया। चार दिन तक पढ़ाई बंद रही। अंत में शिक्षक को अपने व्यवसाय के लिए बच्चों पर दबाव बनाना बंद करना पड़ा। लेकिन पारिवारिक कारणों से पढ़ाई में कुछ गतिरोध आया और वे बाईस वर्ष की आयु में मैट्रिक पास कर सके।

लंदन में वकालत की पढ़ाई और जवाहरलाल नेहरू से भेंट

मैट्रिक के बाद उनकी शिक्षा पटरी पर दौड़ी। स्थानीय शिक्षा पूरी करने के बाद वे वकालत करने के लिए लंदन गए। वहाँ उनकी भेंट अन्य भारतीय छात्रों के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू से हुई। यद्यपि नेहरूजी उनसे आयु में लगभग चौदह वर्ष छोटे थे, परंतु आरंभिक पढ़ाई में कुछ बाधाओं के कारण पटेल पीछे रह गए थे। इसीलिए लंदन में वकालत के दौरान वे नेहरूजी के समकालीन थे।

वकालत से सार्वजनिक जीवन और अहमदाबाद नगरपालिका तक

वल्लभभाई पटेल फरवरी 1913 में वकालत की पढ़ाई पूरी करके भारत लौटे और अहमदाबाद में वकालत करने लगे। वकालत के साथ उन्होंने 1917 में अहमदाबाद नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ा। वे पाँच वर्ष तक इस पद पर रहे। सरदार वल्लभभाई पटेल भारत के पहले नगरपालिका अध्यक्ष बने। वकालत और नगरपालिका में काम करने के दौरान उनके सामने अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भारतीयों के शोषण और दमन की घटनाएँ आने लगीं। ऐसा शोषण उन्होंने अपने गाँव में किसानों के साथ होते देखा था और लंदन में अंग्रेजों का अपमानजनक व्यवहार भी देखा था। उनकी स्मृति में यह सब था। इसलिए अब यह शोषण और दमन देखकर वे व्यथित हुए और वकालत के साथ आंदोलन से जुड़ गए।

खेड़ा आंदोलन : किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष

यह समय देश में महामारी और फसलों के उजड़ जाने का था। फिर भी अंग्रेज अधिकारी जनसामान्य और किसानों से बलपूर्वक वसूली कर रहे थे। इस वसूली में अपमान की पराकाष्ठा होती थी। वल्लभभाई पटेल ने इसके विरुद्ध संघर्ष आरंभ किया। इतिहास के पन्नों में यह आंदोलन 'खेड़ा संघर्ष' के नाम से दर्ज है। अहिंसक आंदोलन करने की यह प्रेरणा उन्हें गांधीजी के चंपारण आंदोलन से मिली थी। चंपारण में आंदोलन 1917 में हुआ था। उसी प्रकार वल्लभभाई ने 1918 में यह खेड़ा आंदोलन आरंभ किया।

गुजरात का यह खेड़ा डिवीजन भयंकर सूखे की चपेट में था। उस पर हैजा महामारी का प्रकोप था। बीमारी और सूखे से गाँव उजड़ गए थे। गाँवों में खाने तक के लाले पड़े थे। सूखे से किसानी उजड़ने और बीमारी के कारण स्थानीय शिल्पकला का निर्माण भी मानो शून्य हो गया था। इससे व्यापार भी उजड़ने लगा । परंतु अंग्रेजी सरकार द्वारा वसूली का लक्ष्य कम नहीं हुआ। अंग्रेज अफसर वसूली के लिए किसानों और व्यापारियों के साथ अमानवीय तरीके अपनाने लगे। तब वल्लभभाई पटेल ने पीड़ितों को संगठित किया और आंदोलन आरंभ किया।

उन्होंने अंग्रेज सरकार से मानवीय व्यवहार करने तथा वसूली में छूट देने की माँग की। सरकार ने उनकी माँग अस्वीकार कर दी। तब वल्लभभाई पटेल ने किसानों, व्यापारियों और स्थानीय लोक शिल्पकारों को संगठित करके आंदोलन तेज किया। गाँव-गाँव में धरना-प्रदर्शन और कीर्तन आरंभ हुए। पहले बल प्रयोग हुआ, फिर गिरफ्तारियाँ हुईं, परंतु आंदोलन कम नहीं हुआ। अंत में सरकार को झुकना पड़ा और वसूली में राहत दी गई। इस आंदोलन का नेतृत्व करने और सफलता के बाद स्थानीय जनमानस में वे 'सरदार' के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

सरदार की उपाधि और राष्ट्रीय पहचान

उन दिनों नायक को सरदार कहा जाता था। बाद में गांधीजी के संबोधन ने उन्हें स्थायी रूप से 'सरदार' की उपाधि से विभूषित कर दिया। अहिंसक आंदोलन के लिए गांधीजी के बाद उनकी ख्याति पूरे देश में हुई और उनकी गणना कांग्रेस के अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं में होने लगी।

बारडोली सत्याग्रह और कांग्रेस अध्यक्ष पद

कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों और सक्रियता के साथ उन्होंने दूसरा बड़ा आंदोलन 1928 में किया। इतिहास में यह आंदोलन बारडोली सत्याग्रह के नाम से प्रसिद्ध है। उनके नेतृत्व में यह भी एक बड़ा किसान आंदोलन था। अंग्रेज सरकार ने लगान में भारी वृद्धि करके सख्ती के साथ वसूली आरंभ की थी। वल्लभभाई पटेल ने किसानों को संगठित किया और इस लगान वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन आरंभ कर दिया। सरकार ने पहले आंदोलन को दबाना चाहा, परंतु आंदोलन और तीव्र हो गया। जब इसकी प्रतिक्रिया गुजरात के बाहर होने लगी, तब सरकार झुकी और लगान वृद्धि वापस हुई। निरंतर संघर्ष और अपनी क्षमता के कारण उनकी गणना कांग्रेस के सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं में होने लगी और 1931 के कराची अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

स्वतंत्रता और भारत विभाजन के समय सरदार पटेल की भूमिका

उनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका स्वतंत्रता के साथ भारत विभाजन के समय देखी गई। आरंभ में कांग्रेस भारत विभाजन के पक्ष में नहीं थी, किंतु मुस्लिम लीग द्वारा अगस्त 1946 में 'डायरेक्ट एक्शन कॉल' के नाम पर बंगाल, पंजाब, बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में हुई हिंसा से पूरा देश काँप उठा। 3 जून 1947 को कांग्रेस ने विभाजन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इस बैठक में सरदार वल्लभभाई पटेल ने बहुत स्पष्ट शब्दों में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हिंदुओं की भयभीत स्थिति का वर्णन किया और समय रहते हिंदुओं को सुरक्षित वातावरण देने की आवश्यकता बताई।

सरदार वल्लभभाई पटेल उन नेताओं में प्रमुख थे, जिन्होंने जनसंख्या की पूरी तरह अदला-बदली का सुझाव दिया था। वे उन क्षेत्रों के सभी नागरिकों को पाकिस्तान भेजने के पक्षधर थे, जिन्होंने जनमत सर्वेक्षण में पाकिस्तान के पक्ष में राय व्यक्त की थी। लेकिन गांधीजी एक आदर्श समाज के निर्माण के पक्षधर थे और नेहरूजी भी संसार में एक सर्वमान्य व्यक्तित्व के रूप में स्वयं को स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। इसलिए भले ही पाकिस्तान वाले हिस्सों में भारी हिंसा, लूट और स्त्रियों के हरण की खबरों के साथ शरणार्थियों की भीड़ भारत आ रही थी, पर भारत सरकार ने अपने अधीन रहने वाले मुसलमान परिवारों को समझाइश और सुरक्षा प्रदान की।

प्रधानमंत्री पद से पीछे हटे पटेल, नेहरू बने प्रधानमंत्री

स्वतंत्रता के साथ कांग्रेस की लगभग सभी स्थानीय इकाइयाँ सरदार वल्लभभाई पटेल को प्रधानमंत्री के रूप में प्राथमिकता दे रही थीं, किंतु गांधीजी की इच्छा का सम्मान करके सरदार पटेल पीछे हटे और नेहरूजी प्रधानमंत्री बने। सरदार वल्लभभाई पटेल को उपप्रधानमंत्री पद के साथ गृह विभाग का दायित्व मिला। अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्रता बाद में दी, पहले भारत का विभाजन करके पाकिस्तान बनाया। इसके साथ भारत के राजाओं को यह अधिकार भी दे दिया था कि वे अपनी इच्छा से भारत और पाकिस्तान में से किसी एक को चुन सकते हैं।

चाहें तो स्वतंत्र भी रह सकते हैं। इससे उत्साहित होकर अनेक राजा स्वतंत्र रहने का रास्ता बनाने लगे, तो भोपाल, जूनागढ़ और हैदराबाद ने पाकिस्तान से मिलने की खुली घोषणा कर दी। उन विषम परिस्थितियों में सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी टीम सक्रिय की और राष्ट्रहित का वास्ता देकर रियासतों को एकजुट करके भारत को वर्तमान स्वरूप दिया। इसमें जूनागढ़ और हैदराबाद के विरुद्ध सेना का उपयोग किया, जबकि भोपाल के मामले में रणनीति का उपयोग किया। तब भारत का वर्तमान स्वरूप उभर सका।

समतामूलक समाज और समान नागरिक आचार संहिता की अवधारणा

सरदार वल्लभभाई पटेल स्वतंत्रता के साथ भारत में एक नागरिक आचार संहिता और समतामूलक समाज रचना के पक्षधर थे। वे वर्ग और धर्म के आधार पर अलग-अलग प्रावधानों वाले कानून बनाने के पक्षधर नहीं थे। समय-समय पर उनके द्वारा दिए गए वक्तव्यों में उनके इस संकल्प का अनुमान सहज ही लगता है। वे कहते थे कि, "हमें ऊँच-नीच, अमीर-गरीब और जाति प्रथा के भेदभावों को समाप्त कर देना चाहिए।" वे शासन के ऐसे समरस स्वरूप के पक्षधर थे, जो किसी भी भेदभाव से मुक्त हो तथा प्रजा के पूर्ण विश्वास पर आधारित हो।

सशक्त, निर्भय और सांस्कृतिक भारत की परिकल्पना

वे भारत को एक सशस्त्र, सशक्त और निर्भय स्वरूप देने के पक्षधर थे। वे कहते थे कि भाषा और क्षेत्रीय जीवन की विविधता के बावजूद भारत की संस्कृति का स्वरूप एक है। अपने इसी सांस्कृतिक स्वरूप के आधार पर भारत को भावी विकास करना चाहिए। लेकिन भारत की स्वतंत्रता के साथ समस्याओं का मानो अंबार आ गया। विभाजन और शरणार्थी समस्या चल ही रही थी कि पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया।

कश्मीर का भारत में विलय और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका

सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरुजी को कश्मीर भेजा और उनकी सहायता से महाराजा को कश्मीर से दिल्ली बुलाया। विलय पत्र पर हस्ताक्षर हुए, तब शेष कश्मीर की रक्षा की। इसी बीच गांधीजी की हत्या हो गई। विषम स्थितियों से जूझते हुए वे आगे बढ़ ही रहे थे कि 15 दिसंबर 1950 को उनका निधन हो गया।

लौह पुरुष का निधन और मरणोपरांत भारत रत्न

अपने निर्णयों का दृढ़ता से पालन करने के संकल्प के कारण उन्हें 'लौह पुरुष' और 'भारत का बिस्मार्क' भी कहा जाता है।उनका निधन आधुनिक भारत के निर्माण में एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। उनके निधन के 41 वर्ष बाद, 1991 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित करने का निर्णय लिया। यह सम्मान उनके पौत्र विपिनभाई पटेल ने ग्रहण किया।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी : लौह पुरुष को राष्ट्र की श्रद्धांजलि

मोदी सरकार ने उनकी स्मृति में एक भव्य प्रतिमा की स्थापना की। इस प्रतिमा का आधार 58 मीटर और सतह की ऊँचाई 180 मीटर है। इस प्रकार इस प्रतिमा की कुल ऊँचाई 240 मीटर है। यह संसार की सबसे ऊँची प्रतिमा है। इस प्रतिमा के निर्माण का कार्य 31 अक्टूबर 2013 को तब आरंभ हुआ था, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। और 31 अक्टूबर 2018 को प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने यह भव्य स्मारक राष्ट्र को समर्पित किया। यह गुजरात के नर्मदा जिले के अंतर्गत सरदार सरोवर बाँध के सम्मुख एक छोटे चट्टानी द्वीप 'साधु बेट' पर स्थापित है। भारत की समस्त रियासतों के एकीकरण का श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को है। इसलिए उनकी स्मृति में 31 अक्टूबर को प्रतिवर्ष 'राष्ट्रीय एकता दिवस' के रूप में मनाया जाता है और उनकी स्मृति में निर्मित इस भव्य स्मारक का नाम भी 'एकता की मूर्ति' दिया गया।

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