मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और परमाणु अप्रसार जैसे मुद्दों पर पश्चिमी जगत लंबे समय से स्वयं को वैश्विक नैतिकता का पहरेदार बताता आया है। किंतु जब इन्हीं आदर्शों को वास्तविक आचरण की कसौटी पर परखा जाता है, तो कथित नैतिक श्रेष्ठता के पीछे छिपे उसके दोहरे मापदंड बार-बार उजागर होते हैं। विडंबना यह है कि यह विरोधाभास अब केवल उसकी विदेश नीति अथवा वैश्विक राजनीति तक सीमित नहीं रहा। पश्चिमी समाजों में वाम-उदारवादी विचारधारा और कट्टरपंथी-जिहादी राजनीति के बीच बढ़ता वैचारिक सामंजस्य स्वतंत्रता, बहुलता, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मूल्यों की व्याख्या को भी प्रभावित करता दिखाई दे रहा है। जिस अमेरिका ने दशकों तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपने लोकतंत्र की आत्मा और असहमति के अधिकार को अपनी सभ्यतागत पहचान बताने का दंभयुक्त दावा किया, उसी अमेरिका में अब किसी विचार, संगठन अथवा व्यक्ति की स्वीकार्यता कई बार इस बात से तय होती दिखाई देती है कि वह उसके प्रचलित वैचारिक आख्यान के अनुकूल है या उसके प्रतिकूल।

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 29 अगस्त 2026 को आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ इसी बदलते विमर्श का उल्लेखनीय उदाहरण है। विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के बीच संवाद, सह-अस्तित्व और सार्वभौमिक एकता का संदेश देने के उद्देश्य से आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का संबोधन हुआ। आयोजन ‘अमेरिकन हिंदूज़ फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग’ द्वारा किया गया था और इसे विभिन्न हिंदू-अमेरिकी संगठनों का समर्थन प्राप्त था।

अमेरिका के लगभग 39 राज्यों, 853 शहरों तथा 31 देशों से आए लगभग 6,000 प्रतिनिधियों और 250 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठनों की सहभागिता ने इसकी व्यापकता को रेखांकित किया। इसके बावजूद न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने कार्यक्रम के प्रति सार्वजनिक असहमति जताई और 61 संगठनों ने कार्यक्रम रद्द करने की मांग की। कार्यक्रम अंततः संपन्न हुआ और अपने घोषित उद्देश्य में पूर्णतया सफल रहा, लेकिन इससे एक मूलभूत लोकतांत्रिक प्रश्न उठा, क्या किसी वक्ता को सुने बिना ही उसके विचारों और संगठन को ‘बहिष्कारी’ अथवा अस्वीकार्य घोषित कर देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहुलतावाद की उस उदार परंपरा के अनुरूप है, जिन्हें पश्चिम लंबे समय से वैश्विक मानक के रूप में प्रस्तुत व प्रचारित करता रहा है?

विरोध की इस शृंखला में ‘हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स’ (एचएफएचआर) भी प्रमुख रूप से सक्रिय था। घोर आश्चर्य है कि जिस संगठन के नाम के साथ "हिंदूज" जुड़ा है, वह भारत, हिंदुत्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मुद्दों पर आलोचनात्मक अभियानों का संचालन करता रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस संगठन का नाम भी सोच-समझकर रखा गया है, ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि संघ-भाजपा का विरोध हिंदू समाज के भीतर से ही हो रहा है। इसकी कार्यकारी निदेशक सुनीता विश्वनाथ नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और ‘हाऊदी मोदी’ कार्यक्रम के भी विरोध में शामिल रही हैं तथा ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ जैसे अभियानों तथा विमर्शों में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। 2023 में वॉशिंगटन डीसी में राहुल गांधी के थिंक-टैंक संवाद में भी उनकी उपस्थिति देखी गई थी। इस संगठन के वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसके सलाहकार सदस्यों में तीस्ता सीतलवाड़, फादर आनंद मैथ्यू, सैयदा हमीद, स्वरा भास्कर, अपूर्वानंद, हर्ष मंदर आदि के नाम सम्मिलित हैं। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि संघ-प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम के विरुद्ध वह क्यों खड़ी थीं?

विरोध करने वाले 61 संगठनों की सूची में ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (आईएएमसी), ‘जस्टिस फॉर ऑल’, ‘इंटरफेथ सेंटर ऑफ न्यूयॉर्क’ सहित अनेक धार्मिक, नागरिक अधिकार और एक्टिविस्ट संगठन दिखाई देते हैं। आईएएमसी और इसके प्रमुख मुहम्मद जवाद भारत में हिंदुत्व, संघ और मोदी सरकार से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से विरोधी अभियान चलाते रहे हैं। गाजा और इजरायल के प्रश्न पर भी उनका रुख अत्यंत मुखर रहा है। इसी प्रकार ‘जस्टिस फॉर ऑल’ के अध्यक्ष अब्दुल मलिक मुजाहिद लंबे समय से अमेरिकी मुस्लिम एक्टिविज्म और अंतर्धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। उनके संगठन के अभियानों में फिलिस्तीन, इजरायल और भारत से जुड़े प्रश्नों पर तीखी वैचारिक व मज़हबी भाषा दिखाई देती रही है। 

इसी संदर्भ में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी की भूमिका भी प्रश्नों के घेरे में आती है। वे फिलिस्तीन समर्थक रुख के लिए जाने जाते हैं और भारत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा इजरायल से जुड़े प्रश्नों पर भी मुखर राजनीतिक रुख अपनाते रहे हैं। 2023 में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान उनके विरोध में संयुक्त बयान, नागरिकता संशोधन कानून और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने का विरोध, उमर खालिद के समर्थन में बयान तथा "हमास" जैसे आतंकवादी संगठन व ‘ग्लोबलाइज द इंतिफादा’ जैसे नारों की निंदा से इनकार उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को समझने के लिए पर्याप्त हैं। इसलिए यह पूछना असंगत नहीं होगा कि उनकी निष्ठा लोकतांत्रिक परंपराओं व मान्यताओं में है या मज़हबी रिवाजों, तक़रीरों व यकीनों में?

विरोध के इसी क्रम में 26 अगस्त को अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) के अध्यक्ष आसिफ महमूद द्वारा डॉ. मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा के संदर्भ में भारत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाए गए गंभीर आरोप तथा संघ से जुड़े लोगों के विरुद्ध प्रतिबंधात्मक कार्रवाई के समर्थन ने इस विमर्श के पीछे सक्रिय टूलकिट की सच्चाई सामने रखी। भारत पर आयोग के पूर्ववर्ती वक्तव्यों और सुनवाइयों में सीएए, एनआरसी, जम्मू-कश्मीर, उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे विषयों को धार्मिक स्वतंत्रता के विमर्श से जोड़ा जाता रहा है। इस पूरी शृंखला को केवल अलग-अलग संगठनों की स्वतंत्र प्रतिक्रियाओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। न्यूयॉर्क की स्थानीय राजनीति, एक्टिविस्ट संगठनों, भारत-केंद्रित मुस्लिम एवं मानवाधिकार समूहों और धार्मिक-स्वतंत्रता संस्थाओं की भूमिकाओं को एक साथ रखने पर एक ऐसा वैचारिक ईकोसिस्टम दिखाई देता है, जिसमें अलग-अलग मंचों से उठने वाले आरोप और नैरेटिव कई बार एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं। एक मंच पर लगाया गया आरोप दूसरे मंच पर संदर्भ बनता है, दूसरा मंच उसे वैधता देता है और अंततः वही आरोप सार्वजनिक विमर्श में स्थापित तथ्य की तरह प्रस्तुत होने लगता है।

लेकिन इन समस्त विरोधों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि स्वयं डॉ. मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में क्या कहा? उन्होंने ‘विविधता स्वाभाविक है और एकता सत्य है’ कहते हुए ‘अस्तित्व की एकता’ को अपनी विश्व-दृष्टि का आधार बताया और स्पष्ट किया कि एकता के लिए एकरूपता आवश्यक नहीं है। उनके अनुसार मनुष्य की श्रेष्ठता दूसरों पर प्रभुत्व में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के प्रति अपने दायित्व को समझने में है। न्यूयॉर्क से उनका यह संदेश भारत की उस दीर्घ सभ्यतागत दृष्टि का वैश्विक प्रतिपादन था, जिसमें "वसुधैव कुटुंबकम" की भावना निहित है। 29 अगस्त के ‘एक विश्व : एक मानवता’ कार्य-आह्वान में भी घृणा और अमानवीकरण का प्रतिरोध, दूसरे समुदाय के संकट में उसके साथ खड़े होने तथा संवाद, सहयोग और सेवा के संबंध विकसित करने का आग्रह किया गया।विडंबना यह है कि जिस मंच से एकता, संवाद, सह-अस्तित्व और मानवता का संदेश दिया जाना था, उसी मंच के वक्ता के विचार सुने बिना उसके विरोध में अभियान चलाया गया। किसी व्यक्ति के विचारों से असहमति लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उसे सुने बिना ही अस्वीकार्य घोषित कर देना बहुलतावाद की मूल भावना पर प्रश्नचिह्न लगाता है। लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा सहमति में नहीं, असहमति को सहने की क्षमता में होती है। पश्चिमी लोकतंत्रों की परिपक्वता की एक कसौटी यह भी होनी चाहिए कि वे अपने समाजों में उभरते वामी-जिहादी गठजोड़ को पहचानें और उसकी विभाजनकारी एवं कट्टरपंथी प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लगाएँ, ताकि कलह, वैमनस्य और संघर्ष से पीड़ित विश्व को वास्तविक शांति और सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग मिल सके।

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