दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत की आवाज संयुक्त राष्ट्र में सुनी जाती है, लेकिन दुनिया की शांति और सुरक्षा से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण फैसले करने वाली संस्था में उसे स्थायी स्थान प्राप्त नहीं है। भारत कई बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है। उसके सैनिक विभिन्न शांति अभियानों में योगदान देते रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों की सूची में भारत का नाम नहीं है। सवाल केवल यह नहीं कि भारत को स्थायी सदस्यता क्यों नहीं मिली। सवाल यह भी है कि क्या आज की दुनिया का प्रतिनिधित्व करने के लिए बनी संस्था अपनी वर्तमान संरचना में दुनिया की वास्तविकताओं को पर्याप्त जगह दे पा रही है?

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध की तबाही के बाद दुनिया को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता थी, जो देशों के बीच विवादों को सुलझाने और भविष्य में युद्ध रोकने में प्रभावी भूमिका निभा सके। उस समय 51 देश इसके संस्थापक सदस्य थे। आज संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य हैं। एशिया और अफ्रीका के अनेक देश स्वतंत्र हो चुके हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था के नए केंद्र उभरे हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की परिस्थितियाँ बदल गई हैं। लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढाँचा अब भी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की शक्ति व्यवस्था पर आधारित है।

सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। पाँच स्थायी सदस्य हैं अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। शेष दस सदस्य महासभा द्वारा दो वर्ष के लिए चुने जाते हैं। स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार भी प्राप्त है। किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पर्याप्त समर्थन मिलने के बावजूद एक स्थायी सदस्य का नकारात्मक मत उसे रोक सकता है। इस प्रकार सुरक्षा परिषद में सभी सदस्य देशों को एक मत तो मिलता है, लेकिन सभी के अधिकार समान नहीं हैं। स्थायी सदस्यता केवल लगातार परिषद में बने रहने का अधिकार नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विशेष स्थान भी है।

भारत इस परिषद का अस्थायी सदस्य आठ बार रह चुका है। उसका पिछला कार्यकाल 2021 और 2022 में था। अस्थायी सदस्यता के दौरान भारत को परिषद की चर्चाओं और निर्णयों में भाग लेने का अवसर मिलता है, लेकिन कार्यकाल समाप्त होने पर यह स्थान किसी दूसरे निर्वाचित देश को मिल जाता है। स्थायी सदस्यों की स्थिति इसके विपरीत है। वे लगातार परिषद में बने रहते हैं और उन्हें वीटो का विशेषाधिकार भी प्राप्त है। यही अंतर भारत की स्थायी सदस्यता की मांग को महत्वपूर्ण बनाता है।

भारत की दावेदारी का आधार केवल उसकी आबादी नहीं है। भारत दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला देश है, एक बड़ी अर्थव्यवस्था है और अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में उसका योगदान रहा है। एशिया में उसकी भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है। भारत विकासशील देशों के हितों, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, आतंकवाद और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था जैसे विषयों पर सक्रिय भूमिका निभाता है। इन परिस्थितियों में भारत का तर्क है कि सुरक्षा परिषद को आज की दुनिया का अधिक प्रतिनिधिक स्वरूप देना चाहिए। भारत ने स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग की है।

यहाँ एक प्रश्न उठता है। यदि सुरक्षा परिषद दुनिया की शांति और सुरक्षा के लिए निर्णय करती है, तो उसकी संरचना में दुनिया की वर्तमान राजनीतिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताएँ कितनी दिखाई देती हैं? भारत को स्थायी सदस्यता न मिलना इस प्रश्न को सामने लाता है। दुनिया की बड़ी आबादी जिस देश में रहती है, उसे निर्णय लेने वाली सर्वोच्च सुरक्षा संस्था में स्थायी स्थान प्राप्त नहीं है। इससे भारत की दावेदारी के साथ साथ वैश्विक प्रतिनिधित्व की बहस भी जुड़ जाती है।

संयुक्त राष्ट्र के भीतर सुरक्षा परिषद में सुधार पर लंबे समय से चर्चा चल रही है। वर्ष 2024 में अपनाए गए भविष्य के लिए समझौते में सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधिक, समावेशी, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता स्वीकार की गई। इसमें अफ्रीका के ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व को दूर करने तथा एशिया प्रशांत और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत भी रेखांकित की गई। इसका अर्थ है कि सुरक्षा परिषद के सुधार का प्रश्न केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक वैश्विक प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ है।

फिर सुधार का रास्ता इतना कठिन क्यों है? इसका एक कारण स्थायी सदस्यता और वीटो की व्यवस्था है। यदि नए स्थायी सदस्य बनाए जाते हैं, तो क्या उन्हें भी वीटो का अधिकार दिया जाएगा? यदि यह अधिकार नहीं दिया जाता, तो क्या स्थायी सदस्यों के भीतर ही दो श्रेणियाँ नहीं बन जाएँगी?भारत को स्थायी सदस्यता देने की मांग को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न भर मानना उचित नहीं होगा। यह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को समय के अनुरूप बनाने की बहस है। यदि सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है, तो नए सदस्यों को वास्तविक भागीदारी मिलनी चाहिए और परिषद की निर्णय क्षमता भी बनी रहनी चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय दुनिया की परिस्थितियाँ अलग थीं। आज अंतरराष्ट्रीय चुनौतियाँ अधिक जटिल हैं। युद्ध, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य संकट और तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसी समस्याएँ किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहतीं। इनसे निपटने के लिए ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता है, जिनके निर्णयों को व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय वैध और प्रतिनिधिक माने। यदि निर्णय लेने वाली संस्था की संरचना पुरानी शक्ति व्यवस्था पर टिकी रहेगी, तो उसकी प्रतिनिधिकता पर प्रश्न उठते रहेंगे।

भारत के बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अधूरी है, इस कथन का आशय यही है कि दुनिया की वर्तमान आबादी और बदलती वैश्विक परिस्थितियों को निर्णय प्रक्रिया में अधिक उचित स्थान मिलना चाहिए। भारत की स्थायी सदस्यता इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।दुनिया बदल चुकी है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता अब इस बात से भी तय होगी कि वह इस बदलाव को अपनी संरचना में कितनी जगह देती है। भारत की स्थायी सदस्यता का प्रश्न इसी परीक्षा का हिस्सा है। यदि दुनिया की बड़ी आबादी वाले देश और महत्वपूर्ण क्षेत्र स्थायी निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं पाते, तो वैश्विक शासन की समानता पर सवाल उठते रहेंगे। अब जरूरत केवल सुधार की आवश्यकता स्वीकार करने की नहीं, बल्कि उस दिशा में सहमति और ठोस कार्रवाई करने की है।
 

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