यश–  एक वाक्य में कहें तो ‘यश’ अच्छे कार्यों की लोकचर्चा, विश्रुति, प्रसिद्धि अथवा ख्याति है। यह संस्कृत के ‘यशस्’ का हिंदी में प्रयुक्त होने वाला रूप है। हिंदीप्रेमियों को जानना चाहिए कि ‘यशस्’ से कई महत्त्वपूर्ण शब्दों की निर्मिति होती है, यथा:– यशस्कर – यशस्वी या यश देने वाला। यशस्काम– यश की कामना करने वाला, उच्चाकांक्षी, महत्त्वाकांक्षी आदि। यशश्शेष– जिसका केवल यश ही शेष हो, दिवंगत। यशस्वी (यशस्विन् – यशस् + विन्)  – प्रसिद्ध, विख्यात। यशस्य– यश की ओर ले जाने वाला, यश से संबंधित ।

कीर्ति– विदित हो कि कीर्ति और कीर्तन एक ही मूल ‘कृत्’ से व्युत्पन्न शब्द हैं। [कृत् + क्तिन् = कीर्ति; कृत् + ल्युट् = कीर्तन]। कीर्तन का अर्थ लोकवर्णन, कथन, सस्वरपाठ आदि है। कीर्तन को ‘कीर्तिवर्णन’ भी कहा जाता है। जब कोई लगातार अच्छे कार्य करता है तो देरसबेर लोक में उसकी चर्चा होने लगती है। उन अच्छे कार्यों की जो लोकचर्चा होती है, उससे मिलने वाले आदर अथवा सम्मान को ‘कीर्ति’ कहा जाता है। 

जानना चाहिए कि ‘यश’ में लोकचर्चा का भाव है, जबकि ‘कीर्ति’ में उससे मिलने वाले आदर अथवा सम्मान का भाव है। एक और बात – कीर्ति फैलती है, जबकि ‘यश’ अर्जित किया जाता है। कीर्तिशेष का भी लगभग वही अर्थ है, जो ‘यशश्शेष’ का अर्थ है; पर इसमें दिवंगत के प्रति लोकचर्चा की तुलना में आदर का भाव प्रमुख है। 

श्रेय– किसी कृत्य के कारण मिलनेवाला सम्मान ‘श्रेय’ है। श्रेय में श्रेष्ठता का बोध अन्तर्निहित होता है, जैसे ‘प्रेय’ में प्रेम का तत्त्व मूल है।