आज का वो दुखद दिन, जब लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने 26 हिंदुओं की हत्या की ! 

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी 

जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले के चपनारी गाँव की स्मृतियों में दर्ज 19 जून 1998। यह एक दिन भारतीयों के लिए विशेष तौर पर हिन्‍दुओं के लिए तारीख से अधि‍क वह भयावह रात है, जिसने खुशियों को मातम में बदल दिया था। शादी की शहनाइयाँ बज रही थीं, घर-आँगन रोशनी से जगमगा रहे थे, रिश्तेदार और बाराती उत्सव में डूबे थे। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि कुछ ही क्षणों बाद गोलियों की गड़गड़ाहट उन गीतों को हमेशा के लिए खामोश कर देगी। लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन के जिहादी इस्‍लामिक आतंकवादी सेना की वर्दी में आए और उन्होंने ऐसा नरसंहार किया, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। 

इस घटना में 26 भारतीय नागरिकों की हत्या सिर्फ इसलिए की गई, क्‍योंकि इन सभी का इस्‍लाम पर विश्‍वास न होकर अपने देवी-देवताओं पर आस्‍था भाव था। क्‍योंकि उनकी नजर में ये सभी गैर इस्‍लामिक (काफिर) हिन्‍दू थे। आज, जब उस त्रासदी को याद किया जाता है, तो सिर्फ पीड़ा ही नहीं उभरती, यह प्रश्न भी सामने आता है कि आतंकवाद के विरुद्ध भारत की लड़ाई कहाँ तक पहुँची है और उन बलिदानों ने राष्ट्र को क्या सिखाया है।

जब शादियों की खुशियाँ खून से लाल हो गईं

इतिहास में जाएं तो चपनारी गाँव डोडा शहर से लगभग दस किलोमीटर दूर एक शांत और रमणीय क्षेत्र था। 19 जून 1998 की शाम वहाँ दो परिवारों में विवाह समारोह चल रहे थे। बारातें आई थीं, गीत-संगीत का माहौल था और पूरा गाँव उत्सव में डूबा हुआ था। इसी दौरान भारी हथियारों से लैस आतंकवादी गाँव में घुस आए। उन्होंने स्वयं को सुरक्षा बलों का सदस्य बताकर लोगों को विश्वास में लिया। 

कुछ ही देर बाद उन्होंने बारातियों और ग्रामीणों को एक स्थान पर इकट्ठा किया। महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को अलग किया गया। फिर बिना किसी चेतावनी के एके-47 राइफलों से अंधाधुंध गोलियाँ बरसाई गईं।कुछ ही मिनटों में खुशियों का वह उत्सव चीखों और सन्नाटे में बदल गया। जमीन पर लाशें बिछ गईं। कई परिवारों के घरों के चिराग एक साथ बुझ गए। बच्चे अनाथ हो गए और बुजुर्गों ने अपने जवान बेटों को खो दिया। 

आतंक का मकसद: भय और विभाजन

चपनारी नरसंहार कोई अकेली घटना नहीं थी। 1990 के दशक में आतंकवादियों ने जम्मू संभाग के डोडा, किश्तवाड़, भद्रवाह और राजौरी जैसे इलाकों में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं को विशेष रूप से निशाना बनाया। इन सभी इस्‍लामिक जिहादियों का उद्देश्य भय का ऐसा वातावरण बनाना था कि लोग अपने पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हो जाएँ। कश्मीर घाटी से कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन के बाद आतंकवादी संगठन जम्मू के पहाड़ी क्षेत्रों में भी वही रणनीति लागू करना चाहते थे। चपनारी नरसंहार इसी सुनियोजित अभियान का हिस्सा था। आतंकियों का लक्ष्य सामाजिक ताने-बाने को तोड़ना और सांप्रदायिक विभाजन को गहरा करना था।

जीवित बचे लोगों की गवाही: दर्द जो आज भी ताजा है

इस नरसंहार में कुछ लोग चमत्कारिक रूप से बच गए। दुल्हन और कुछ अन्य लोगों ने या तो स्वयं को मृत दिखाया या परिस्थितियों के कारण आतंकियों की नजर से बच गए। उनके बयान बाद में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य बने, लेकिन जो लोग बच गए, उनके लिए जीवन पहले जैसा कभी नहीं रहा। उन्होंने अपने परिवारों, मित्रों और रिश्तेदारों को अपनी आँखों के सामने मरते देखा। कई दशकों बाद भी चपनारी का नाम सुनते ही उन रातों की यादें लौट आती हैं।

आतंकवाद का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यही है कि वह केवल शरीरों को नहीं मारता, बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाले मानसिक घाव छोड़ जाता है। इसके बाद चपनारी नरसंहार ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह सोचने पर मजबूर किया कि पहाड़ी और दूरदराज इलाकों में रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा के लिए नई रणनीति अपनानी होगी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। सबसे महत्वपूर्ण निर्णय था विलेज डिफेंस कमेटियों (VDCs) को सशक्त बनाना। स्थानीय युवाओं को हथियार दिए गए, प्रशिक्षण प्रदान किया गया और गाँवों की सुरक्षा में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की गई। डोडा, किश्तवाड़ और भद्रवाह के संवेदनशील क्षेत्रों में सेना, राष्ट्रीय राइफल्स और सीआरपीएफ की अतिरिक्त चौकियाँ स्थापित की गईं।

यह रणनीति बाद में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई। स्थानीय लोगों की भागीदारी ने आतंकियों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ऑपरेशन हंट: आतंकियों को मिला जवाब

चपनारी नरसंहार के बाद सुरक्षा बलों ने व्यापक अभियान शुरू किया। सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस के विशेष अभियान समूह (SOG) और अर्धसैनिक बलों ने मिलकर आतंकियों की तलाश तेज कर दी। डोडा के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों में लगातार अभियान चलाए गए। शुरुआती महीनों में नरसंहार से जुड़े कई आतंकवादी मारे गए। अगले कुछ वर्षों में डोडा-किश्तवाड़ क्षेत्र में सक्रिय आतंकी नेटवर्क को गंभीर क्षति पहुँची।

यह अभियान आतंकवादियों के लिए एक संदेश था कि भारत अपने नागरिकों पर हुए हमलों को भूलता नहीं और अपराधियों को न्याय के कटघरे तक पहुँचाने के लिए हरसंभव प्रयास करता है, लेकिन यह भी सच है कि चपनारी नरसंहार के बाद भय का ऐसा वातावरण बना कि अनेक परिवारों ने अपने गाँव छोड़ दिए। कुछ डोडा शहर पहुँचे, कुछ जम्मू चले गए और कई अन्य सुरक्षित स्थानों की तलाश में भटकते रहे।

अपने घर, खेत, पशुधन और सामाजिक संबंधों को छोड़ना किसी भी परिवार के लिए आसान नहीं होता। आतंकवाद का यही सबसे क्रूर पक्ष है कि वह लोगों को उनकी जड़ों से काट देता है। सरकार ने पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता, अनुकंपा नियुक्तियाँ और पुनर्वास पैकेज दिए। फिर भी किसी भी मुआवजे से उन परिवारों की क्षति की भरपाई संभव नहीं थी, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया था।

भारत की लड़ाई अभी भी जारी है

अब आज चपनारी की घटना को 28 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आतंकवाद के विरुद्ध भारत की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। स्वरूप बदल गया है, रणनीतियाँ बदल गई हैं, लेकिन खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। आज भारत आतंकवाद से मुकाबले के लिए बहुआयामी रणनीति अपना रहा है। सीमा पर घुसपैठ रोकने के लिए आधुनिक निगरानी प्रणाली, ड्रोन, थर्मल सेंसर और मजबूत बाड़बंदी का उपयोग किया जा रहा है। सुरक्षा बलों की खुफिया क्षमताएँ पहले से कहीं अधिक सशक्त हुई हैं।

आतंकवाद के वित्तीय नेटवर्क पर भी कड़ा प्रहार किया जा रहा है। आतंक को धन उपलब्ध कराने वाले तंत्रों को ध्वस्त करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित प्रयास किए जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों, पुलिस और स्थानीय नागरिकों के बीच बढ़ता सहयोग भी आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई की बड़ी ताकत बनकर उभरा है।जिन लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया, उनका दर्द राष्ट्र की सामूहिक स्मृति का आज हिस्सा है।

स्मृति से संकल्प तक

आज जब हम चपनारी के उन 26 निर्दोष नागरिकों को श्रद्धांजलि दे रहे हैं, तो यह शोक व्यक्त करने का अवसर होने के साथ एक संकल्प लेने का भी क्षण है कि आतंकवाद के सामने भारत कभी नहीं झुकेगा। जिन परिवारों ने अपने प्रियजन खोए, उनकी पीड़ा भारत की चेतना का हिस्सा है। और यही चेतना देश को आतंकवाद के विरुद्ध निरंतर संघर्ष की शक्ति देती है। वास्‍तव में चपनारी गांव आज उन असंख्य भारतीयों की स्मृति का प्रतीक है जिन्होंने आतंकवाद की कीमत चुकाई और उन सुरक्षा बलों के साहस का भी, जो आज भी देश की सीमाओं और नागरिकों की रक्षा के लिए दिन-रात डटे हुए हैं।