भारत की पहचान बताते समय विविधता का उल्लेख सहज ही आ जाता है। कहीं भाषा बदल जाती है, कहीं खानपान और पहनावा, कहीं पूजा-पद्धति और कहीं सामाजिक रीति-रिवाज। कुछ दूर चलने पर बोली का लहजा बदल जाता है और कुछ प्रदेश आगे बढ़ने पर देवी-देवताओं के नाम, लोकगीतों की धुन तथा त्योहार मनाने के तरीके भी बदल जाते हैं। फिर भी इन सबके बीच एक साझा देश बना रहता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर अपने संबोधन में विविधता को अलगाव मानने की प्रवृत्ति छोड़ने और समाज के बीच भावनात्मक एकता मजबूत करने पर जोर दिया। उनके इस विचार पर विचार करते हुए भारतीय समाज की बनावट और मौजूदा परिस्थितियों को साथ रखकर देखना जरूरी है।

भारत की विविधता किसी एक दिन में तैयार नहीं हुई। सदियों से अलग-अलग समुदायों ने अपनी भाषाओं, मान्यताओं, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों के साथ इस भूभाग में जीवन बिताया है। कहीं इन समुदायों के बीच संघर्ष हुए, कहीं मेलजोल बढ़ा और कहीं एक-दूसरे से सीखते हुए नई सांस्कृतिक परंपराएँ बनीं। भारतीय समाज का वर्तमान स्वरूप इसी लंबे ऐतिहासिक अनुभव का परिणाम है। इसलिए विविधता को केवल सहन करने की चीज मानना भी पर्याप्त नहीं है। उसे समझना और उसके साथ सम्मानपूर्वक रहना अधिक जरूरी है।

छत्तीसगढ़ में ही यह विविधता कई रूपों में दिखाई देती है। बस्तर के जनजातीय अंचलों की परंपराएँ सरगुजा से अलग हैं। मैदानी क्षेत्रों के लोकाचार और वनांचल के रीति-रिवाजों में अंतर है। देवी-देवताओं के स्थानीय रूप, पर्वों की विधियाँ, लोकगीत, नृत्य और प्रकृति से जुड़े विश्वास अलग-अलग समुदायों की अपनी पहचान रखते हैं। इन परंपराओं को देखकर कोई यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि उनके बीच कोई संबंध नहीं है। एक ही प्रदेश में रहते हुए लोग अपनी विशिष्टता बनाए रखते हैं और साझा सामाजिक जीवन में भी भाग लेते हैं। यही स्थिति भारत के दूसरे हिस्सों में भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।

समस्या तब शुरू होती है, जब अपनी पहचान के प्रति लगाव दूसरे की पहचान के प्रति अस्वीकार में बदलने लगता है। अपनी भाषा पर गर्व करना स्वाभाविक है, लेकिन दूसरी भाषा बोलने वाले को कमतर समझना उचित नहीं। अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करना व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार है, लेकिन उससे दूसरे की आस्था के प्रति अपमान का अधिकार नहीं मिल जाता। क्षेत्रीय संस्कृति के संरक्षण की चिंता भी आवश्यक है, पर उसके नाम पर दूसरे क्षेत्र के लोगों को बाहरी मान लेना समाज को संकीर्ण बनाता है। अपनी परंपरा से प्रेम और दूसरी परंपरा के प्रति सम्मान, दोनों साथ रह सकते हैं। इनके बीच विरोध मान लेने से ही अलगाव की जमीन तैयार होती है।

डॉ. भागवत के संदेश का एक महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि सामाजिक एकता केवल किसी नारे या औपचारिक आयोजन से नहीं बनती। इसके लिए लोगों के बीच भावनात्मक संबंध आवश्यक हैं। संविधान ने नागरिकों को समान अधिकार दिए हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था ने अपनी बात रखने की स्वतंत्रता दी है। लेकिन संवैधानिक प्रावधानों के साथ सामाजिक व्यवहार भी महत्त्व रखता है। किसी व्यक्ति को बराबरी का अधिकार कागज पर मिल जाए, लेकिन व्यवहार में उसकी भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण उसे अपमानित होना पड़े, तो समानता का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

राष्ट्रीय एकता की चर्चा में असहमति और अलगाव के बीच अंतर बनाए रखना भी जरूरी है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, नीतियों का विरोध और व्यवस्था में सुधार की मांग स्वाभाविक हैं। हर विरोध को राष्ट्रविरोधी मान लेना उतना ही अनुचित है, जितना किसी वास्तविक विभाजनकारी प्रवृत्ति को सामान्य असहमति बताकर अनदेखा करना। देश के प्रति निष्ठा का अर्थ यह नहीं कि सभी नागरिक हर विषय पर एक ही राय रखें। एक ही देश के नागरिक अलग-अलग विचार रखते हुए भी उसकी संवैधानिक व्यवस्था और परस्पर सम्मान के प्रति प्रतिबद्ध हो सकते हैं।

भावनात्मक एकता की परीक्षा बड़े आयोजनों में कम और रोजमर्रा के व्यवहार में अधिक होती है। दूसरे प्रदेश से आए मजदूर, विद्यार्थी या कर्मचारी के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है? किसी व्यक्ति की भाषा और पहनावे को देखकर उसके बारे में कैसी धारणा बना ली जाती है? किसी धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा से अपरिचित व्यक्ति को समझने का प्रयास किया जाता है या उसका उपहास किया जाता है? ऐसे प्रसंगों में समाज की वास्तविक मानसिकता सामने आती है। भाषणों में एकता की प्रशंसा करना आसान है, लेकिन अपने व्यवहार में उसके लिए जगह बनाना अधिक कठिन है।

विविधता के प्रति सम्मान का अर्थ यह भी नहीं कि समाज अपनी साझा समस्याओं से आँखें मूँद ले। गरीबी, अशिक्षा, भेदभाव, बेरोजगारी और संसाधनों तक असमान पहुँच जैसे विषय किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। इनका समाधान मिलकर ही खोजा जा सकता है। 

यदि सामाजिक पहचान के आधार पर लोगों के बीच अविश्वास बढ़ता है, तो साझा समस्याओं पर सहयोग भी कठिन हो जाता है। इसके विपरीत, जब नागरिक एक-दूसरे को बराबरी का भागीदार मानते हैं, तब मतभेदों के बावजूद समाधान की संभावना बनी रहती है।

भारत में राष्ट्रीय एकता का विचार किसी एकरूप समाज की कल्पना पर आधारित नहीं हो सकता। यहाँ सभी भाषाएँ एक जैसी नहीं होंगी, सभी समुदायों के रीति-रिवाज समान नहीं होंगे और न ही प्रत्येक नागरिक की धार्मिक तथा सामाजिक मान्यताएँ एक जैसी हो सकती हैं। एकता का आधार इन अंतरों को मिटाना नहीं, बल्कि इनके रहते हुए साझा नागरिकता और परस्पर सम्मान को मजबूत करना है। किसी समुदाय की विशिष्टता को राष्ट्रीय जीवन के लिए बाधा मानने के बजाय उसे देश की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा समझना इसी दिशा में एक कदम है।

डॉ. मोहन भागवत के संदेश पर विचार करते हुए यह भी ध्यान रखना होगा कि विविधता के सम्मान की जिम्मेदारी केवल किसी संगठन, सरकार या राजनीतिक दल की नहीं है। परिवार में बच्चों को दूसरी भाषाओं और समुदायों के प्रति सम्मान सिखाने से लेकर विद्यालयों में स्थानीय संस्कृतियों को समझने का अवसर देने तक, अनेक स्तरों पर काम करना होगा। सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार भाषा का प्रयोग और सामाजिक माध्यमों पर अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर किसी समुदाय को निशाना बनाने से बचना भी इसी प्रयास का हिस्सा है।

अतः देश की एकता इस बात से तय नहीं होती कि यहाँ के लोग कितनी समान बातें करते हैं। उसका वास्तविक आधार यह है कि वे असहमति और भिन्नता के बीच एक-दूसरे के साथ किस तरह रहते हैं। अपनी पहचान बचाए रखते हुए दूसरे की पहचान को स्वीकार करना, अपने अधिकारों के साथ दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना और मतभेद होने पर भी संवाद के रास्ते खुले रखना आसान काम नहीं है। लेकिन विविधताओं से बने भारत में एकता की राह इसी व्यवहार से निकलती है। अलग-अलग रंगों को मिटाकर एक रंग बना देना विविधता का समाधान नहीं है; जरूरी यह है कि रंगों के अंतर को अलगाव का कारण न बनने दिया जाए।
 

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