राजनीतिक लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी सफल होगी जब राज्य की सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्थाओं में लोकतांत्रिक व्यवहार निहित हो। शासन के रूप में लोकतंत्र को परिभाषित करना सतही उत्तर है। लोकतंत्र का मुल्यांकन करते वक्त इन सभी व्यवस्थाओं में भाषा, लिंग, जाति एवं वर्ग के भेद से ऊपर उठकर सहज प्रतिनिधित्व को देखना चाहिए। अनेक देशों में महिलाओं के मताधिकार को लेकर लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी। समाज की आस्थागत मान्यताओं ने भी लोकतंत्र को बड़े स्तर पर प्रभावित किया है। भारतीय संदर्भ में देखे तो लोकतंत्र की जड़े राज दरबार में मंत्रियों के समाज से चयन करने और पंच परमेश्वर की व्यवस्था में भी देखते है।

आधुनिक लोकतंत्र की बात करे तो तीन प्रमुख संवैधानिक स्तम्भ माने जाते हैं यथा विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इनके साथ पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ और समाज की सहयोग भावना को हम पाँचवीं शक्ति के रूप में देख सकते है। विधायिका की जवाबदेही का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक उपकरन जनता का मत है। पाँच वर्ष बाद जनता सरकार बदल सकती है। चुनाव के बीच भी जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछे जा सकते हैं, उन्हें घेरा जा सकता है और आवश्यक होने पर गांव की चौपाल तक पर बुलाया जा सकता है। हमने सांसदों और विधायकों को जनता के सामने जवाब देते भी देखा है। सुशासन के लिए कालखंड अनुसार कानून निर्माण के साथ विधायिका को योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए कार्यपालिका व न्याय प्रदान करने के लिए न्यायपालिका के साथ समन्वय भी रखना है।

लोकतंत्र की समीक्षा के लिए निर्वाचित विधायिका के अतिरिक्त चयनित कार्यपालिका और न्यायपालिका के सामने नागरिक की यात्रा की पड़ताल करनी चाहिए! एक साधारण शिकायत के समाधान के लिए कार्यालयों के चक्कर लगते हैं, न्यायालय की देहरी पर पहुँचते-पहुँचते न्याय की आस में वर्षों निकल जाते हैं और कुछ मामलों में पीढ़ियाँ तक बदल जाती हैं। साधारण व्यक्ति के लिए कार्यपालिका व विधायिका जैसे स्तम्भ के प्रति असंतोष व्यक्त करना भी सहज नहीं है। 

चौथे स्तंभ पत्रकारिता की लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण सामाजिक शक्ति के रूप में भूमिका है। वह उस नागरिक की आवाज बन सकती है, जिसकी शिकायत व्यवस्था की फाइलों में दब गई है। सड़क-नाली से लेकर अपराध तक के जन सरोकार से जुड़े विषय को उजागर करती है। किसी परिवार के पशुधन खो जाने पर डिजिटल मीडिया के माध्यम से स्थानीय पत्रकार ग्रामीणों का सहयोग कर रहे है। आज पत्रकारिता परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। सूचना तकनीक के विस्तार, सोशल मीडिया, एल्गोरिदम, फेक न्यूज, डीपफेक और सूचना-युद्ध ने पत्रकारिता की जिम्मेदारी को और बढ़ा दिया है। अब चुनौती केवल समाचार पहुँचाने की नहीं, बल्कि गति, सत्यापन, संदर्भ और विश्वसनीयता बनाए रखने की भी है। लोकतंत्र में नागरिक की आवाज को संबल देने का काम पत्रकारिता क्षेत्र कर रहा है।

हर समस्या के समाधान के लिए शासन के भरोसे रहने का व्यवहार लोकतंत्र को मजबूत नहीं, बल्कि निर्भर बना देगा। मजबूत समाज वह है, जहाँ नागरिक स्वयं भी समस्या के समाधान के लिए आगे आते हैं। समाधान की दिशा में भारतीय समाज परंपरागत रूप से अपना योगदान देता रहा है। भारतीय दर्शन के अनुरूप संसाधनों के साझे उपयोग में हम तत्पर रहे। गुरूकुल, धर्मशाला, जलाशय के निर्माण एवं संचालन समाज ने किया है। शैक्षणिक संस्थानों व चिकित्सालयों के लिए भूमि दान, भवन निर्माण व संचालन में समाज ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता रहा है। भारतीय दर्शन में धन को केवल निजी उपभोग की वस्तु तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि सामाजिक दायित्व का माध्यम भी माना गया है। हम आर्थिक विषमता की खाई को पाटने की तरफ अग्रसर हो। आज न्यास, परोपकारी संस्थाएं, सहकारी संस्थाएं और निगम सामाजिक उत्तरदायित्व इसके आधुनिक रूप हैं। 

25 नवंबर 1949 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए डॉ भीमराव अंबेडकर कहते है- “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक कायम नहीं रह सकता जब तक उसकी नींव में सामाजिक लोकतंत्र न हो।” महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप और और दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय का आधार भारतीय दर्शन का मूल विचार है।  सफल लोकतंत्र का अर्थ तंत्र के सुशासन के साथ समाज के समाधान दृष्टिगत योगदान में निहित है।

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