हाल के समय में भारत के शेयर बाजार में लगातार तेज गिरावट दर्ज हुई है। इससे देश में इस तरह का माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी संकट आने वाला है और भारतीय नागरिकों पर इसका अत्यधिक कष्टकारी असर पड़ने वाला है। यह आकलन किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि शेयर बाजार में गिरावट विदेशी संस्थागत निवेशकों के मन में बैठ रहे डर के आधार पर देखी जा रही है, जबकि भारतीय संस्थागत निवेशक लगातार अपना निवेश भारतीय शेयर बाजार में बढ़ा रहे हैं। म्यूचुअल फंड्स द्वारा प्रति माह 30,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का लगातार निवेश शेयर बाजार में किया जा रहा है।

यह सही है कि भारतीय शेयर बाजार का सेंसेक्स 1 अक्टूबर 2025 के 80,983 बिंदुओं के स्तर से 1 अक्टूबर 2026 को 71,910 बिंदुओं के स्तर पर नीचे आ गया है। इसी प्रकार, निफ्टी इंडेक्स भी 1 अक्टूबर 2025 के 24,836 बिंदुओं के स्तर से नीचे गिरकर 1 अक्टूबर 2026 को 22,422 बिंदुओं के स्तर पर आ गया है। पिछले एक वर्ष की अवधि में 10 से 11 प्रतिशत के बीच की गिरावट दर्ज हुई है। जबकि, इस बीच भारत में अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक विकास दर लगातार उच्च स्तर की बनी हुई है। फिर, ऐसे क्या कारण हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का चमकता चेहरा होने के बावजूद भारतीय शेयर बाजार लगातार गिरावट दर्ज कर रहा है?

शेयर बाजार भविष्य की संभावित आय को करता है प्रतिबिंबित

दरअसल, किसी भी देश का शेयर बाजार स्टॉक एक्सचेंज पर दर्ज कंपनियों की आने वाले वर्षों में होने वाली अनुमानित आय के आधार पर घटता अथवा बढ़ता रहता है। दूसरे, आजकल जब समस्त देश एक तरह से आपस में जुड़ से गए हैं और हम एक वैश्विक गांव में निवास कर रहे हैं, तब एक देश में होने वाली घटनाओं का प्रभाव दूसरे देश के शेयर बाजार पर भी पड़ता हुआ दिखाई देता है।

जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराइल-हमास युद्ध, अमेरिका-ईरान युद्ध, सऊदी अरब-हूथी युद्ध एवं खाड़ी के देशों के आपसी युद्ध आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनके चलते भारतीय शेयर बाजार भी सहमा हुआ दिखाई दे रहा है, हालांकि भारत किसी भी प्रकार से, अप्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से, इन युद्धों से नहीं जुड़ा है।

तीसरे, विदेशी निवेशक भारी मात्रा में कुछ देशों के शेयर बाजार में अपनी पूंजी का निवेश करते हैं, क्योंकि उन्हें इन देशों में किए गए निवेश से अच्छे रिटर्न की संभावना दिखाई देती है। परंतु जब इन विदेशी निवेशकों द्वारा अपना निवेश शेयर बाजार से निकाला जाता है, तब उस देश का शेयर बाजार तेजी से गिरने लगता है।

कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से बढ़ी चिंता

उक्त वर्णित युद्धों के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और यह 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गए हैं। एक वर्ष पूर्व यह 65 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर थे। अर्थात, इस एक वर्ष के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है।

भारत कच्चे तेल की कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। अतः भारत के उक्त युद्धों से किसी भी प्रकार से नहीं जुड़े होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था पर कुछ विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, ऐसा माहौल बनाए जाने के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश भारी मात्रा में निकाल रहे हैं।

हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के बावजूद भारत में मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रण में बनाए रखने के प्रयास अभी तक तो सफल ही रहे हैं। फिर भी, कैलेंडर वर्ष 2026 में अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 2.8 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि निकाल ली है।

विदेशी निवेशकों का रुख क्यों बदला?

सितंबर 2024 तक के 24 माह में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 38,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था, जबकि सितंबर 2026 तक के 24 माह में 56,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की निकासी की गई है।

विदेशी संस्थागत निवेशक इतनी भारी मात्रा में अपना निवेश भारत से निकालकर अमेरिकी बॉन्ड्स, अमेरिका के शेयर बाजार, वियतनाम एवं दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार तथा चीन के शेयर बाजार में कर रहे हैं। क्योंकि अमेरिका में ब्याज दरों (यूएस फेड दर) में वृद्धि के चलते बॉन्ड्स की यील्ड पिछले लगभग 24-25 वर्षों के उच्चतम स्तर 5.60 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है।

साथ ही, अमेरिकी शेयर बाजार में अभी भी तेजी बनी हुई है, क्योंकि वहां की कंपनियों द्वारा उच्च तकनीक के नवाचार करने के चलते उनकी उत्पादकता एवं लाभप्रदता में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। इसी प्रकार, वियतनाम एवं दक्षिण कोरिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र की कंपनियों में उच्च स्तर की लाभप्रदता दर्ज होने की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। इसलिए विदेशी निवेशक अमेरिका, वियतनाम एवं दक्षिण कोरिया जैसे देशों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और अपना निवेश इन देशों में बढ़ा रहे हैं।

भारत की तुलना में चीन का बाजार अधिक आकर्षक

चीन का शेयर बाजार बहुत तेजी से नीचे गिरा था, जिसके कारण वहां की कंपनियों के शेयरों का प्राइस-टू-अर्निंग (Price to Earnings-PE Ratio) यानी कीमत/आय अनुपात भारतीय कंपनियों के कीमत/आय अनुपात की तुलना में अत्यधिक आकर्षक हो गया है।

चीन में औसतन यह अनुपात 12 प्रतिशत से नीचे है, जबकि भारत में यह अनुपात औसतन 20 प्रतिशत से अधिक है। अतः विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारतीय कंपनियों के शेयर चीनी कंपनियों के शेयरों की तुलना में महंगे दिखाई दे रहे हैं।

डॉलर की मजबूती और रुपये पर दबाव

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर के लगातार मजबूत होने के चलते भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। इस कारण से भी विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश निकाल रहे हैं। आज भारतीय रुपये की कीमत 96 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई है।

साथ ही, डॉलर इंडेक्स जो 1 अक्टूबर 2025 को 97.71 के स्तर पर था, वह 1 अक्टूबर 2026 को बढ़कर 101.80 के स्तर पर आ गया है। स्वर्ण की कीमतें भी 3,871 अमेरिकी डॉलर प्रति औंस से बढ़कर 4,170 अमेरिकी डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई हैं।

भारत स्वर्ण का भारी मात्रा में, कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक, आयात करता है। स्वर्ण के आयात का भुगतान अमेरिकी डॉलर में ही करना होता है। अतः भारतीय रुपये पर इससे अतिरिक्त दबाव बनता हुआ दिखाई दे रहा है।

भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर अलग कहानी कहती है

उक्त संदर्भों को यदि भारतीय अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखा जाए तो स्थिति कुछ अलग ही दिखाई देती है। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में 7.8 प्रतिशत की आकर्षक वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह वृद्धि केवल 3 प्रतिशत एवं तेजी से आर्थिक विकास कर रही अर्थव्यवस्थाओं में यह 3.8 प्रतिशत रहने की संभावना व्यक्त की गई है।

जब भारत में आर्थिक विकास दर तुलनात्मक रूप से अधिक तेज गति से आगे बढ़ेगी तो भारतीय कंपनियों की आय एवं लाभप्रदता में भी तेज गति से वृद्धि संभव होगी।

इसी प्रकार, अगस्त 2026 माह में भारत की औद्योगिक विकास दर भी 8 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है, जो कि अगस्त 2025 में 4.7 प्रतिशत के स्तर पर थी। विभिन्न उत्पादों का भारत से निर्यात अगस्त 2026 में 4,380 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है, जो अगस्त 2025 में 3,480 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर था।

बैंकिंग क्षेत्र में मजबूत वृद्धि

15 सितंबर 2026 को समाप्त पखवाड़े में समस्त बैंकों के ऋणों में 18.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह वृद्धि दर 10.4 प्रतिशत रही थी। इसी प्रकार, बैंकों की जमाराशि में वृद्धि दर भी पिछले वर्ष की 9.5 प्रतिशत की तुलना में इस वर्ष 17.3 प्रतिशत रही है।

बैंकों का ऋण-जमा अनुपात लगभग 81 प्रतिशत के पास पहुंच गया है। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि दर आंकी जा रही है।

बैंकों की सकल गैर-निष्पादनकारी आस्तियों में भी कमी दर्ज हुई है और यह जुलाई 2025 के 2.2 प्रतिशत की तुलना में जुलाई 2026 में घटकर 1.68 प्रतिशत के स्तर पर नीचे आ गई है। शुद्ध गैर-निष्पादनकारी आस्तियां तो पिछले वर्ष के 0.5 प्रतिशत की तुलना में 0.4 प्रतिशत ही रही हैं। अर्थात, बैंकों द्वारा प्रदत्त किए जा रहे ऋणों की अदायगी समय पर हो रही है।

भारतीय बैंकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात तो आज विकसित देशों के बैंकों से भी अधिक हो गया है, जो जुलाई 2025 के 17.5 प्रतिशत से बढ़कर जुलाई 2026 में 17.8 प्रतिशत के स्तर को पार कर गया है। इससे भारतीय बैंकों की मजबूत स्थिति झलकती है।

औद्योगिक क्षमता में बढ़ता उपयोग

उद्योगों द्वारा अपनी उत्पादन क्षमता का 75 प्रतिशत से अधिक उपयोग किया जा रहा है। यह ऐसी स्थिति है, जब संबंधित उद्योग को अपनी उत्पादन क्षमता में वृद्धि करने के बारे में विचार प्रारंभ करना होता है।

उक्त जानकारी की सत्यता की गवाही वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण में हो रही लगातार वृद्धि से भी मिलती है। सितंबर 2026 माह में 14.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ वस्तु एवं सेवा कर का संग्रहण 2.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक का रहा है और यह लगातार तीसरा महीना है, जब यह संग्रहण 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का रहा है।

डिजिटल अर्थव्यवस्था की मजबूती

भारत में सितंबर 2026 माह के दौरान यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface-UPI) सिस्टम के अंतर्गत प्रतिदिन औसतन 80 करोड़ से अधिक के व्यवहार दर्ज हो रहे हैं, जो पूरे विश्व में किसी भी देश में सबसे अधिक व्यवहार हैं।

अगस्त 2026 माह के दौरान उक्त व्यवहार 79 करोड़ के रहे थे और सितंबर 2025 में 65 करोड़ से अधिक व्यवहार प्रतिदिन के रहे थे।

शेयर बाजार की गिरावट को अर्थव्यवस्था का संकट मानना उचित नहीं

कुल मिलाकर भारत में अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में दर्ज हो रही विकास दर की कहानी स्पष्ट तौर पर कह रही है कि भारत का भविष्य बहुत सुरक्षित है। और, यह झूठा विमर्श खड़ा किया जाना कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी संकट आने वाला है और भारतीय नागरिकों पर इसका कष्टकारी प्रभाव पड़ने वाला है, पूर्णतः असत्य है।

घबराहट में विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा शेयर बाजार से निकाले जा रहे निवेश को आधार बनाकर उक्त झूठे विमर्श को खड़ा करने का प्रयास हो रहा है। शेयर बाजार में आई गिरावट और भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को एक ही तराजू पर तौलना उचित नहीं होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से सामने आ रहे आंकड़े इसके विपरीत एक मजबूत, गतिशील और संभावनाशील आर्थिक परिदृश्य की ओर संकेत करते हैं।

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