करवा चौथ पर दृश्य कुछ इस तरह बनता है कि रात को छत पर चाँद निकलने की प्रतीक्षा हो रही है। पत्नी के हाथ में छलनी है और पति सामने खड़ा है। चाँद दिखाई देते ही अर्घ दिया जाएगा, व्रत खुलेगा और फिर एक तस्वीर सोशल मीडिया पर पहुँच जाएगी। तस्वीर में चाँद, छलनी और पति का चेहरा होगा। प्रेम का यह दृश्य अब इतना लोकप्रिय हो चुका है कि लगता है, करवा चौथ मनाने के साथ उसकी तस्वीर खिंचवाना और रील बनाना भी जरूरी हो गया है।

कुछ दशक पहले करवा चौथ का दृश्य इससे अलग था। जिन परिवारों में यह व्रत रखा जाता था, वहाँ सुबह सरगी, दिन भर उपवास, शाम को पूजा और चाँद निकलने पर अर्घ्य देने की परंपरा थी। घर की बुजुर्ग महिलाएँ व्रत की कथा सुनाती थीं। मिट्टी का करवा, पूजा की थाली, रोली और चावल से रस्में पूरी हो जाती थीं। नए कपड़े और मेहंदी उत्सव का हिस्सा हो सकते थे, लेकिन त्योहार के लिए महँगे कपड़े, विशेष मेकअप और उपहारों की लंबी सूची हर घर में नहीं होती थी।

करवा चौथ मुख्यतः उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित व्रत था। टेलीविजन के विस्तार ने इसे घर-घर पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई। धारावाहिकों में नायिकाएँ सजी-धजी होकर व्रत रखतीं, पति की लंबी उम्र की कामना करतीं और चाँद निकलने तक प्रतीक्षा करतीं। कभी प्रेम की परीक्षा होती, कभी रूठने-मनाने का प्रसंग और कभी कहानी में ऐसा मोड़ आता कि दर्शक अगली कड़ी देखने के लिए उत्सुक रहें। 

हिंदी फिल्मों ने इस परंपरा को और रोमांटिक रूप दिया। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कभी खुशी कभी गम और बागबान जैसी फिल्मों ने करवा चौथ को प्रेम, पारिवारिक भावनाओं और नाटकीय दृश्यों से जोड़ा। पर्दे पर सजी पत्नी, चिंतित पति और चाँद की प्रतीक्षा का दृश्य लोकप्रिय हुआ। वास्तविक जीवन की पूजा में इतनी रोशनी और नाटकीयता हर घर में कहाँ होती है, लेकिन फिल्मों ने त्योहार की एक आकर्षक छवि जरूर बना दी।

बाजार ने इस लोकप्रियता को कारोबार के अवसर के रूप में पहचाना और इसे अपने कब्जे में ले लिया। साड़ियों और आभूषणों के विशेष संग्रह आने लगे। कॉस्मेटिक कंपनियों ने त्योहार के लिए प्रचार किया। ब्यूटी पार्लरों में बुकिंग बढ़ी और मेहंदी लगाने वालों, मिठाई की दुकानों तथा उपहार विक्रेताओं के लिए यह कमाई का अवसर बन गया। ऑनलाइन बाजार ने पूजा की थाली, सजावटी करवा, छलनी, कपड़े और उपहार घर बैठे खरीदने की सुविधा भी दे दी।

व्यापार संगठन कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के अनुमानों के अनुसार, करवा चौथ से जुड़ा कारोबार 2023 में लगभग ₹15,000 करोड़, 2024 में ₹22,000 करोड़ और 2025 में ₹28,000 करोड़ तक पहुँच गया। 2025 के अनुमान में दिल्ली का हिस्सा लगभग ₹8,000 करोड़ बताया गया। ये सरकारी स्तर पर सत्यापित राष्ट्रीय बिक्री के आँकड़े नहीं, बल्कि व्यापार संगठन के अनुमान हैं। 

ऑनलाइन कारोबार में भी यह विस्तार दिखाई दिया। 2025 में GoKwik के आँकड़ों पर आधारित इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट ने करवा चौथ के सप्ताह के दौरान प्रत्यक्ष-से-उपभोक्ता कारोबार में लगभग 40 प्रतिशत वृद्धि का उल्लेख किया। इस तरह करवा चौथ की लोकप्रियता उत्तर भारत से बाहर भी बाजार और डिजिटल माध्यमों के रास्ते फैलती दिखाई देती है।

इस बदलाव का एक सकारात्मक पक्ष भी है। मेहंदी लगाने वालों, छोटे दुकानदारों, दर्जियों, कुम्हारों, आभूषण विक्रेताओं और सौंदर्य सेवाएँ देने वालों को काम मिलता है। त्योहारों से स्थानीय कारोबार को सहारा मिलता है। अपनी पसंद की साड़ी खरीदना या पति का पत्नी को उपहार देना अपने आप में गलत नहीं है। परेशानी तब शुरू होती है, जब खरीदारी ही त्योहार की पहचान बनने लगे।

पत्नी ने कितनी महँगी साड़ी पहनी, कौन-सा मेकअप कराया, पति ने कितना बड़ा उपहार दिया और किसकी तस्वीर पर कितने लोगों ने पसंद जताई, यदि इन्हीं बातों से करवा चौथ की सफलता तय होने लगे तो व्रत की मूल भावना पीछे छूटने लगती है। बाजार प्रेम को ऐसी वस्तुओं में बदलना पसंद करता है, जिन्हें खरीदा और दिखाया जा सके। उपहार की कीमत को प्रेम का प्रमाण मानने की धारणा भी इसी माहौल में मजबूत होती है। जबकि दांपत्य जीवन का मूल्य किसी खरीदारी की रसीद से तय नहीं होता।

करवा चौथ पर आज भी अनेक महिलाएँ पारिवारिक परंपरा, निजी आस्था और अपने दांपत्य जीवन के प्रति भावनात्मक जुड़ाव के कारण व्रत रखती हैं। कई परिवार इसे साथ समय बिताने और पूजा करने का अवसर मानते हैं। कुछ पति भी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं या उसकी सुविधा का ध्यान रखते हैं। बाजार की चमक के बीच ऐसे अनुभव भी मौजूद हैं। करवा चौथ का बाजार अगले वर्ष भी सजेगा। नए डिजाइन आएँगे, विज्ञापन बनेंगे, सोशल मीडिया पर रील बनेंगी और कारोबार के नए अनुमान सामने आएँगे। यह बाजार अब त्योहार का हिस्सा बन चुका है। लेकिन चाँद निकलने पर जब पत्नी छलनी से उसे देखे और फिर पति का चेहरा देखकर पूजा पूरी करे, तब उस क्षण का अर्थ महँगे कपड़ों और उपहारों से कहीं बड़ा रह सकता है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
अपने लेख इस पते पर भेजें :- editatalraag@gmail.com