अंकित शर्मा हत्याकांड में न्यायालय का फैसला यह याद दिलाने वाला क्षण है कि दंगों की आग इमारतों को जलाने के अलावा समाज की चेतना, कानून के विश्वास और मानवीय संवेदनाओं को भी गहरी चोट पहुंचाती है।

आज भले ही उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा को छह वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, पर उसकी स्मृतियां अभी भी देश के मानस पटल से धुंधली नहीं हुई हैं। 53 लोगों की मौत, सैकड़ों घायल, हजारों परिवारों का विस्थापन और करोड़ों रुपये की संपत्ति का नुकसान, वस्तुतः ये आंकड़े उस त्रासदी की व्यथा-कथा कहते हैं, जिसने देश की राजधानी को कई दिनों तक भय और अविश्वास के माहौल में धकेल दिया था।

इसी हिंसा के दौरान खुफिया ब्यूरो (आईबी) के युवा अधिकारी अंकित शर्मा की नृशंस हत्या हुई थी। उनका शव नाले से बरामद होना पूरे देश के लिए अत्यंत पीड़ादायक दृश्य था। एक युवा अधिकारी, जो देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा था, दंगों की हिंसा का शिकार बन गया। उस समय प्रश्न यह भी था कि क्या संगठित हिंसा के बीच कानून का शासन कायम रह पाएगा? 

अब कड़कड़डूमा अदालत ने इस मामले में पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन सहित पांच आरोपियों को हत्या और अन्य गंभीर धाराओं में दोषी ठहराया है। इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि अदालत ने प्रत्येक आरोप का पृथक परीक्षण किया। जहां साक्ष्य पर्याप्त मिले, वहां दोषसिद्धि की। 

देश ये भूला नहीं है कि दिल्ली दंगों के बाद लंबे समय तक देश में राजनीतिक बहसें चलती रहीं। अलग-अलग दलों ने अपनी-अपनी व्याख्याएं प्रस्तुत कीं, आरोप लगाए और प्रत्यारोप किए, किंतु अदालत अपना काम करती रहीं। न्यायालय ने वर्षों तक चली सुनवाई, गवाहों के बयान, दस्तावेजी प्रमाण और अभियोजन एवं बचाव पक्ष की दलीलों का परीक्षण करने के बाद अब जाकर के अपना निष्कर्ष दिया है।

ऐसे में यह फैसला एक व्यापक संदेश भी देता है कि लोकतंत्र में हिंसा कभी भी वैध राजनीतिक माध्यम नहीं हो सकती। किसी भी विचार, आंदोलन या असहमति को हिंसा में बदलने का परिणाम अंततः निर्दोष नागरिकों को भुगतना पड़ता है। दिल्ली दंगों में जिन लोगों ने अपने परिजनों को खोया, जिनकी दुकानें और घर जल गए, उनके लिए न्याय की प्रक्रिया कानूनी औपचारिकता, सामाजिक विश्वास की पुनर्स्थापना का माध्यम है।

अंकित शर्मा प्रकरण आज याद दिलाता है कि दंगे किसी एक समुदाय, एक परिवार या एक मोहल्ले की समस्या नहीं होते। वे पूरे राष्ट्र के लिए चुनौती बन जाते हैं। 

यह भी उल्लेखनीय है कि अदालत ने कुछ आरोपों में दोषसिद्धि की और कुछ में नहीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था पूर्वनिर्धारित निष्कर्षों पर नहीं चलती। प्रत्येक आरोप को अलग-अलग साक्ष्यों के आधार पर परखा जाता है। यही कारण है कि न्यायिक निर्णयों का सम्मान लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है, भले ही किसी पक्ष को उनसे असहमति क्यों न हो। यदि किसी पक्ष को निर्णय पर आपत्ति है, तो उसके लिए उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अपील का संवैधानिक अधिकार उपलब्ध है।

आज दिल्ली देंगे देश के प्रत्येक नागरिक और सभी सरकारों के लिए सबक है, वहीं उन्होंने यह भी दिखाया कि सामाजिक सौहार्द कितना नाजुक होता है। वर्षों से साथ रहने वाले लोग अचानक एक-दूसरे के विरोधी बन गए। अफवाहें, उन्माद और हिंसा ने विश्वास की उस पूंजी को क्षति पहुंचाई, जिसे बनाने में दशकों लगते हैं, आज आवश्यकता इस बात की है कि दिल्ली दंगों जैसी घटनाओं से सबक लिया जाए। खुफिया तंत्र, पुलिस व्यवस्था, त्वरित प्रशासनिक प्रतिक्रिया, दंगा नियंत्रण की रणनीति, डिजिटल माध्यमों पर फैलने वाली अफवाहों पर प्रभावी नियंत्रण तथा सामाजिक संवाद की मजबूत व्यवस्था ; इन सभी क्षेत्रों में निरंतर सुधार आवश्यक है। हिंसा को रोकना, हिंसा के बाद न्याय सुनिश्चित करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

आज ये हम सभी को समझना होगा कि देश के लिए अंकित शर्मा उन सभी सरकारी कर्मचारियों, सुरक्षा बलों और नागरिकों का प्रतीक हैं, जो अशांत परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं।

वस्तुतः कड़कड़डूमा अदालत का यह निर्णय उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। अंतिम सजा पर फैसला अभी शेष है और आगे की न्यायिक प्रक्रिया भी चलेगी, लेकिन इतना स्पष्ट है कि छह वर्ष पहले दिल्ली की सड़कों पर फैली हिंसा आज भी देश की स्मृति में जीवित है। न्यायिक प्रक्रिया ने एक महत्वपूर्ण चरण पार किया है, परंतु इतिहास का सबसे बड़ा सबक अभी भी वही है , वह यही है कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं होती, बल्कि वह नए घाव छोड़ जाती है।