भादो का महीना आने पहले ही गांवों में तीजा लाने ले जाने की चर्चा शुरू हो जाती है। पोरा आते-आते तीजा की तैयारी भी शुरु हो जाती है। यह एक ऐसा पर्व है जिसमें आधी आबादी तीन चार दिनों में ससुराल से मायके पहुंच जाती है। बसों, रेलग़ाड़ियों में पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी। सड़कों पर मोटर सायकिलों का रेला लग जाता है, छत्तीसगढ़ में जहां देखो वहीं, यह सीन दिखाई देगा तीजा में। यह समय महिलाओं में और परिवारों में उमंग का समय होता है, क्योंकि साल भर में भाई-बहन, माता पिता से मिलना होता है और मायके की आस तो सभी  को रहती है।

लोक का अपना ही महत्व होता है, मुझे यह बात रोचक लगती है कि जिस पर्व की मूल कथा पार्वती के तप और शिव को पति रूप में पाने की इच्छा से जुड़ी है, उसके छत्तीसगढ़ी लोक रूप में भाई और मायका महत्वपूर्ण हो गए।  तीजा के गीतों में एक बहन अपने भाई की राह देख रही है— “आगे हे तीजा तिहार, आवत होही लेनहार, रद्दा जोहत हौं भैया मोर...”

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाने वाली हरतालिका तीज का संबंध पार्वती की तपस्या से जोड़ा जाता है। पौराणिक कथा में पार्वती शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तप करती हैं। उनकी सखी उन्हें पिता के घर से दूर ले जाती है और पार्वती वहीं तपस्या करती हैं। इसी कथा से हरतालिका नाम की व्याख्या की जाती है। व्रत का एक सामान्य स्वरूप पूरे देश में दिखाई देता है। विवाहित महिलाएँ पति के दीर्घ जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं, जबकि अनेक स्थानों पर कुमारियाँ मनचाहे वर की कामना से व्रत रखती हैं।

करू भात की परंपरा

तीजा की तैयारी पोला के आसपास से ही दिखाई देने लगती है। तीजा से एक दिन पहले करू भात होता है। करेले की सब्जी इस दिन के भोजन का विशेष हिस्सा है। कई जगह बहन-बेटियाँ एक-दूसरे के घर जाती हैं और करू भात का निमंत्रण देती हैं। करेले की कड़वाहट के साथ शुरू होने वाले इस पर्व की अगली सुबह कैसी होगी, यह पहले से मालूम है। व्रत होगा। पूजा होगी। गीत होंगे और कई घरों में रात तक जागरण होगा।

करू भात की परंपरा को पार्वती द्वारा कंदमूल ग्रहण करके तप प्रारंभ करने की लोकमान्यता से भी जोड़ा जाता है। लोक ने अपनी सुविधा से उस कथा को भोजन और व्यवहार में ढाल लिया। कथा पुराण में रही, लेकिन उसका स्वाद छत्तीसगढ़ के घरों में आ गया। यही वह जगह है जहाँ शास्त्र और लोक अलग-अलग दिखाई नहीं देते।

तीजा के अवसर पर विवाहित बेटियों और बहनों को पिता, भाई या भतीजे के साथ मायके लाने की परंपरा है। यदि किसी कारण से उन्हें लाना संभव न हो तो मायके से साड़ी, श्रृंगार सामग्री और तीजा के पकवान भेजने की परंपरा भी रही है। जिस बेटी ने अपना बचपन जिस घर में बिताया था, विवाह के बाद वही घर उसका घर नहीं रह जाता। माँ से मिलने के लिए उसे जाना पड़ता है। भाई से मिलने के लिए समय निकालना पड़ता है। पुराने आँगन में बैठना अब उसके जीवन की सामान्य दिनचर्या नहीं है। फिर तीजा आता है। भाई लेने आता है और वह कुछ दिनों के लिए फिर उसी घर में लौटती है। शायद इसीलिए तीजा के गीतों में मायका इतना बार आता है।

“दाई ददा के दुलार, भाई बहिनी के प्यार,
मोर मईके के चिन्हा, मोर तीजा के लुगरा...”

तीजा के बाद व्रत खोलते समय मायके की साड़ी पहने की परंपरा है। नई साड़ी तो बाजार से भी खरीदी जा सकती है, लेकिन मायके की साड़ी का महत्व कुछ और है। उसमें माँ का वात्सल्य है। भाई का स्नेह है। पिता का प्यार है और बचपन की वह स्मृति भी है, जो मायके लुगरा के साथ धड़कनों में समाई हुई है। लोक जीवन में वस्तुओं का अर्थ कई बार उनकी कीमत से नहीं, उनके पीछे महत्व से होता है।

तीजा का व्रत आसान नहीं है। निर्जला उपवास, पूजा की तैयारी, फुलेरा सजाना और रातभर जागरण, यह सब साथ साथ जुड़ा है। अनेक स्थानों पर महिलाएँ शिव-पार्वती की प्रतिमा बालू या मिट्टी से बनाती हैं। फुलेरा में उन्हें स्थापित कर पूजा की जाती है। ठेठरी, खुरमी, पूरी और दूसरे पकवानों का भोग लगाया जाता है। दिन भर व्रत और रात में जागरण। लेकिन इस कठिन उपवास के बीच गीत चलते रहते हैं।छत्तीसगढ़ के मैदानी हिस्सों में तीजा की चर्चा करते हुए मायका, भाई और करू भात सामने आते हैं। लेकिन बस्तर में तीजा के साथ नदी, बालू, बाली गौरा, फुलेरा और तीजा जगार की एक अलग दुनिया दिखाई देती है।

बस्तर में तीजा

बस्तर में तीजा सभी जनजातीय समुदायों में समान रूप से प्रचलित नहीं है। हलबा और भतरा समुदायों में इसकी परंपरा मिलती है, परन्तु यहां बस्तर में अन्य जितनी भी जातियाँ हैं जैसे कोष्टा, पनारा, धाकड़, ठाकुर, ब्राह्मण, बैरागी, गाड़ा-घसिया, सतनामी, कलार, राजपूत, आदि इस पर्व को सोल्लास मनाते हैं। बस्तर में तीजा की सुबह का दृश्य मैदानी क्षेत्र के तीजा से कुछ अलग है। महिलाएँ नदी की ओर जाती हैं। नदी की रेत को साफ किया जाता है। सात मुट्ठी बालू लेकर परात में रखी जाती है। फिर उसी बालू को दो भागों में बाँटकर शिव और पार्वती का रूप बनाया जाता है। फूल, अक्षत, धूप, दीप और कलश से पूजा होती है।बस्तर की तीजा में बाली गौरा की परंपरा भी मिलती है। किसी नवविवाहिता, कुंवारी या पहली बार तीजा व्रत रखने वाली महिला के सिर पर बाली गौरा रखी जाती है। दीप वाला कलश भी सिर पर लेकर महिलाएँ पूजा स्थल तक आती हैं। बाँस की कमचियों से चौकोर ढाँचा बनाया जाता है। उसे नए कपड़े या साड़ी से ढककर फुलेरा बनाया जाता है। उसके नीचे पीढ़ा रखा जाता है और बाली गौरा को वहाँ रखा जाता है।

यहाँ तीजा घर के भीतर की पूजा से आगे निकलकर एक सामूहिक आयोजन का रूप ले लेती है। शाम को महिलाएँ फिर फुलेरा के पास पहुँचती हैं। रामायण पाठ होता है। भजन होते हैं।कीर्तन होते हैं। और यदि तीजा जगार का आयोजन है तो रात जागते हुए जगार गाया जाता है। फ़िर अगली सुबह पूजा करते मोहरी बाजा के साथ नदी में विसर्जन कर दिया जाता है।इस तरह लोक संस्कृति की अपनी ही महिमा है, जो परम्पराओं को जीवित रखना जानती है और एक पीढी से दूसरी पीढी में स्थानांतरित करती है। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में स्थानीय लोक परम्पराओं के अनुसार इस पर्व को मनाया जाता है। 
आचार्य ललित मुनि
 

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
अपने लेख इस पते पर भेजें :- editatalraag@gmail.com