बांग्लादेश में लोकतंत्र को समाप्त कर शेख हसीना की सरकार को गिराने वाले आंदोलन को अब भारत में कम्युनिस्ट नेता और माओवादियों को हीरो मानने वाली पार्टी की ही छात्र नेता नेहा बोरा ने देश युवाओं के लिए आदर्श बताया है।

जिस तरह बांग्लादेश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को गिराने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को समाप्त किया गया, उसी तरह भारत में भी अपना मुखौटा उतार दिया है। यही माओवाद का असली चेहरा है, जिसे नेहा बोरा ने अति-आत्मविश्वास में सबके सामने रख दिया है।

कम्युनिस्ट पार्टी के स्टूडेंट विंग ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की नेता नेहा बोरा ने 14 अक्तूबर को बांग्लादेश के सोशलिस्ट स्टूडेंट्स फ्रंट (SSF) के छठे राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए भेजे गए वीडियो संदेश में बांग्लादेश के तथाकथित Gen Z आंदोलन को भारतीय युवाओं के लिए रास्ता दिखाने वाला बताया।

“वामपंथी नेहा बोरा ने संगठन को ‘लाल सलाम’ कहा, उसके आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात कही और दोनों देशों में संघर्षों के बीच समानताएं स्थापित कीं। बांग्लादेश के ‘द बिजनेस स्टैंडर्ड’ ने उनके संदेश को रिपोर्ट किया कि बोरा ने बांग्लादेशी छात्र संगठन को युवाओं के सामूहिक संघर्ष का रास्ता दिखाने का श्रेय दिया।”

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस आंदोलन को वामपंथी नेहा बोरा युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बता रही हैं, वह केवल छात्र प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा था। जुलाई और अगस्त 2024 में बांग्लादेश का आंदोलन शेख हसीना सरकार के विरुद्ध व्यापक जनविद्रोह में बदल गया। 5 अगस्त 2024 को हसीना ने प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया और देश से बाहर चली गईं। उसके बाद देश में अंतरिम शासन स्थापित हुआ। इस दौरान हिन्दुओं के नरसंहार से लेकर तमाम लोकतंत्र विरोधी गतिविधियाँ हुई।

जब किसी छात्र संगठन का अध्यक्ष किसी विदेशी आंदोलन को रास्ता दिखाने वाला बताता है, तो उस आंदोलन की प्रकृति, उसके संगठनात्मक नेतृत्व और उसके बाद पैदा हुए राजनीतिक संकट को देखना आवश्यक है।

शेख हसीना के सत्ता छोड़ने तक यह आंदोलन सरकार के खिलाफ जनाक्रोश का केंद्र बन चुका था। वास्तव में यह डीप स्टेट का रिज़िम चेंज ऑपरेशन था, जिसे बांग्लादेश में सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया।

नेहा बोरा ने बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात कही, क्या यह प्रेरणा नागरिक अधिकारों की रक्षा से संबंधित है, या रिज़ीम चेंज ऑपरेशन से? क्या यह छात्रों की व्यापक लामबंदी है या लोकतंत्र को ख़त्म करने की कोशिश? या सरकार के खिलाफ आंदोलन को निर्णायक राजनीतिक परिवर्तन तक ले जाने की रणनीति है?

जब नेहा बोरा जैसी कम्युनिस्ट नेता दूसरे देश के लोकतंत्र विरोधी और रिज़िम चेंज वाले आंदोलन को रास्ता दिखाने वाला बताती हैं, तो हमें समझना चाहिए कि यह ख़तरा भारत के लिए कितना बड़ा है।

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