श्रीनिवासन जैन 30 साल तक NDTV के स्टूडियो में बैठकर जिस पत्रकारिता को सच बताते रहे, वो सच कभी था ही नहीं। वो एक नैरेटिव था - एक सोचा-समझा एजेंडा, जिसमें हिंदू समाज की हर चिंता को "फिक्शन" बता देना ही पत्रकारिता बन गया।

उनकी किताब लव जिहाद एंड अदर फिक्शन इसी एजेंडे का डॉक्यूमेंट है।

जैन कहते हैं लव जिहाद होता ही नहीं। तो फिर केरल हाई कोर्ट ने इस शब्द का इस्तेमाल क्यों किया? NIA ने सैकड़ों मामलों में धर्मांतरण और शोषण के पैटर्न की जांच क्यों की? यूपी, केरल, कर्नाटक में रोज़ जो लड़कियां कैमरे पर आकर कहती हैं कि नाम बदलकर फंसाया गया, फिर धर्म बदलने का दबाव बनाया गया, वो सब फिक्शन है? जमीनी हकीकत को डेटा के खेल से झुठलाना ही तो इनकी फैक्ट-चेकिंग है।

पॉपुलेशन जिहाद पर वो फर्टिलिटी रेट का गणित पढ़ाते हैं। गणित सही हो सकता है, लेकिन सवाल गणित का नहीं, मंशा का है। जब बंगाल और असम के बॉर्डर जिलों में डेमोग्राफी 20 साल में पलट जाती है, तो वो किस फिक्शन से होती है? आंकड़ों की आड़ में आंखों देखी सच्चाई को नकारना ही इनकी सेक्युलरिज्म है।

जबरन धर्मांतरण को भी वो फिक्शन बताते हैं। तो फिर छत्तीसगढ़, झारखंड के आदिवासी इलाकों में प्रलोभन और सेवा के नाम पर चलने वाले कन्वर्जन रैकेट पर FCRA क्यों रद्द होते हैं? कानून क्यों बनते हैं?

और तुष्टिकरण? जैन पूछते हैं कि ईद पर ज्यादा बिजली मिलती है इसका सबूत कहां है। अरे सबूत बिजली का नहीं, मानसिकता का है। हज सब्सिडी 2018 तक इस देश में थी या नहीं? मदरसों को सरकारी फंड मिलता था या नहीं? चार शादी की इजाजत कानून में थी या नहीं? सवाल बिजली का नहीं, बराबरी का है। 

असली विवाद ये है कि श्रीनिवासन जैन पत्रकार कम, नैरेटिव मैनेजर ज्यादा हैं। इशरत जहां जो नरेंद्र मोदी को मारने आई थी, उसके लिए "छोटा-मोटा ब्लास्ट" शब्द इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति आपको बताएगा कि खतरा फिक्शन है। को वैक्सीन जैसी स्वदेशी वैक्सीन पर फेक खबर चलाकर माफी मांगने वाला व्यक्ति आपको सिखाएगा कि सच क्या है।

जैन की पूरी पत्रकारिता एक ही फॉर्मूले पर चलती है - हिंदू डरे तो उसे अफवाह बताओ, और जब हिंदू पर वार हो तो उसे छोटा-मोटा बताओ।

जैन जैसे लोग जिहादियों से भी खतरनाक हैं क्योंकि वे पत्रकार का मुखौटा लगाए हमारे आपके बीच में हैं।

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