बंगाल के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा दुर्गा उत्सव जबलपुर का है। अकेले जबलपुर शहर में 800 से ऊपर दुर्गा प्रतिमाएं रखी जाती हैं, तो जबलपुर जिले में यह संख्या 1,500 से ऊपर है। अर्थात, सभी अर्थों में यह भव्य है, विशाल है, अद्भुत है।
कल जबलपुर का यह ऐतिहासिक दुर्गोत्सव बिना किसी बाधा के, सफल संपन्न हुआ। अनेक प्रतिमाओं का कल ही विसर्जन हो गया, तो अनेक प्रतिमाएं आज और कल विसर्जित होगी। 

इस दुर्गोत्सव की एक अनूठी और शानदार परंपरा है। दुर्गा पंडालों के साथ ही यहां रामलीला भी खूब चलती है। हजारों दर्शक मंत्रमुग्ध होकर भगवान श्रीराम की लीला देखते हैं। जबलपुर मे यह दस से ज्यादा स्थानों पर होती हैं। षष्ठी से बांग्ला भाषिक दुर्गा पंडालों में विधि विधान से पूजा प्रारंभ होती है और रौनक बढ़ने लगती है। लगभग 17 से ज्यादा स्थानों पर बांग्ला भाषिकों के दुर्गा पंडाल है। पहले गुजराती मंडल तक सीमित रहने वाला गरबा, अब पूरे जबलपुर का बन गया है। नवरात्रि के पहले दिन से लाखों लोग गरबा नृत्य का आनंद लेते हैं। अष्टमी के दिन श्री दत्त मंदिर में बड़ी संख्या में मराठी भाषिक अष्टमी का खेला खेलते हैं। कुल मिलाकर  इन दिनों जबलपुर में अपार उमंग और उत्साह रहता हैं। 

इस बार के दुर्गा उत्सव में कुछ विशेष बातें दिखी - 

1. अनेक पंडालों में मां भगवती को पार्वती के रूप में दिखाया गया था, तो अनेक स्थानों पर (शायद पहली बार), दुर्गा पंडालों में हनुमान जी को स्थान मिला था। यह स्पष्ट रूप से फिल्म 'हनुमान अंश' का, जबलपुर के दुर्गा उत्सव पर पड़ा सकारात्मक प्रभाव था। 

2. इस बार महाकाली मंडप मंडपों की संख्या, पिछले बार की तुलना में, बहुत ज्यादा थी। पिछले वर्ष तक जिस पंडाल में मां भगवती, दुर्गा के रूप में पूजी गई थी, इस बार वहां महाकाली की स्थापना हुई। बरसों पहले जबलपुर में महाकाली की संख्या अत्यंत सीमित थी। गढाफाटक की महाकाली, लटकारी पड़ाव की, 1955 से स्थापित होने वाली महाकाली, कछियाना की जगदीश विश्वास ने बनाई हुई महाकाली, तथा अन्यत्र कुछ और चार-पांच महाकाली की प्रतिमाएं। बस, इतना ही। पर अब ऐसा नहीं। शायद 'मन्नत वाली महाकाली' की संकल्पना के कारण महाकाली की मूर्ति रखने की होड़ बढी हैं। यहां तक तो ठीक है। किंतु इस वर्ष कुछ स्थानों पर महाकाली को आधुनिक शैली में प्रस्तुत किया किया गया। यह मन को खटकने वाला था। देवत्व की अपनी संकल्पना शालीन और सभ्य होती है। होलिका की मूर्ति के साथ आप मजाक कर सकते हैं, कारण वह देवता नहीं है। पर महाकाली के साथ नहीं। यह देवत्व का अपमान है। 

3. एक और बात खटकी। अनेक स्थानों पर हॉरर थीम या जिन्न की थीम बनाई गई थी। यह स्पष्ट रूप से अंग्रेजी त्योहार हेलोवीन से ली गई थी, जो भूत, प्रेतों का का त्यौहार है। हमें आसुरी शक्ति प्रदर्शित करने के लिए जिन्न, जिंतान, हॉरर शो क्यों चाहिए? हमारी मां भगवती ने शुंभ - निशुंभों का नाश किया था। मधु - कैटभ राक्षसों को मारा था। चंड - मुंड का विनाश किया था। महिषासुर और रक्तबीज को समाप्त किया था। एक-एक प्रसंग अद्भुत हैं। जबरदस्त हैं। उनको छोड़ हम इन जिन्नों के पीछे क्यों भाग रहे हैं? 

4. एक और गलत परंपरा इस बार दिखी। चार-पांच दुर्गा पंडालों ने, जहां हॉरर शो या जिन्न की थीम थी, रुपए लेकर 'शीघ्र दर्शन' की व्यवस्था की थी। बाकायदा क्यू आर कोड भी लगाया था। यह उचित नहीं हैं। यह उत्सव सर्व सामान्य लोगों का है। ग्रामीण अंचल से आने वाले श्रद्धालुओं का है। उनकी श्रद्धा को शिर्डी या तिरुपति के तर्ज पर, पैसों में बांटना ठीक नहीं लगता। 

5. अनेक अच्छे पंडाल भी दिखे। रसल चौक ने तुलजा भवानी को राजमाता जीजाबाई के रूप में प्रस्तुत किया था, जो अत्यंत प्रेरक था। संक्षेप में, इस भव्य, दिव्य, विशाल दुर्गोत्सव ने इस बार अपनी अमिट छाप छोड़ी हैं।

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