2 सितंबर 2000 : स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण ‘सरल’ का निर्वाण दिवस

सुप्रसिद्ध राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण ‘सरल’ का पूरा जीवन भारत के क्रांतिकारियों की गाथा लिखने और गाने में बीता। उन्होंने अपना पूरा जीवन और अपनी श्रम-साधना से कमाया हुआ धन भी क्रांतिकारियों की गौरवगाथा को एकत्र करने और उन्हें समाज के सामने लाने में समर्पित कर दिया।वस्तुतः वे एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जिन्होंने स्वतंत्रता से पहले स्वतंत्रता के लिए समाज का जागरण किया और स्वतंत्रता के बाद स्वतंत्रता को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने के लिए राष्ट्र-जागरण किया।

उनका जन्म 1 जनवरी 1919 को मध्यप्रदेश के अशोकनगर में हुआ। उन दिनों अशोकनगर पृथक जिला नहीं था। अशोकनगर तब गुना जिले के अंतर्गत ग्वालियर रियासत का अंग हुआ करता था।उनका परिवार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार था। 1857 में उनके परिवारजनों ने तात्या टोपे के नेतृत्व में हुई क्रांति में बलिदान दिया था। उनके पिता भगवती प्रसाद विरथरे सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के अज्ञातवास के दौरान उनके सहयोगी रहे। माता यमुना देवी भारतीय संस्कारों और परंपराओं के लिए समर्पित थीं।

घर में माता के पूजन-पाठ, भजन और हवन की गूंज रहती थी, तो पिता द्वारा समाजजनों के बीच भारत राष्ट्र के गौरव का वर्णन किया जाता था। आध्यात्म और स्वाधीनता आंदोलन में सहयोग एवं चर्चा के वातावरण के बीच सरल जी ने जन्म लिया और होश संभाला।

परंतु उन्हें माता का सुख अधिक समय तक नहीं मिल पाया। वे अभी पाँच वर्ष के ही हुए थे कि माता यमुना देवी संसार से विदा हो गईं। श्रीकृष्ण जी पिता के सानिध्य में बड़े हुए और राष्ट्रसेवा में लग गए।वे स्वयं तो स्वाधीनता सेनानी रहे ही, साथ ही अपने साथी-सहपाठी नौजवानों को भी स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा। वे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सहभागी बने और प्रभात फेरियां निकालीं। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे शासकीय महाविद्यालय, उज्जैन में प्रोफेसर हो गए।

बाल्यावस्था से ही लेखन की ओर झुका मन

लेखन कार्य उन्होंने बाल्यावस्था से ही आरंभ कर दिया था। जब वे दस वर्ष के थे, तब अपनी स्वरचित रचनाएं विद्यालय में सुनाया करते थे। विद्यार्थी रहे हों या महाविद्यालय में शिक्षक, उनका लेखन कार्य निरंतर चलता रहा।

उनके लेखन के मुख्यतः तीन विषय रहे—पहला, स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के बलिदान से समाज को अवगत कराना; दूसरा, भारत राष्ट्र और भारतीय संस्कृति का गौरवगान; और तीसरा, वर्तमान पीढ़ी से सकारात्मक कार्यों तथा राष्ट्रसेवा का आह्वान।उनका लेखन जीवन के अंतिम क्षणों तक यथावत रहा। हालांकि, जीवन के उत्तरार्ध में उनकी लेखनी आध्यात्म की ओर भी मुड़ी।

क्रांतिकारियों की गाथा को बनाया जीवन का ध्येय

क्रांतिकारियों पर उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें पंद्रह महाकाव्य हैं। उनका अधिकांश लेखन क्रांतिकारियों पर ही केंद्रित रहा। उन्होंने लेखन के क्षेत्र में कई विश्व कीर्तिमान स्थापित किए। सर्वाधिक क्रांति-लेखन और सर्वाधिक पंद्रह महाकाव्य लिखने का श्रेय सरल जी को ही जाता है।

भारतीय सैनिकों और क्रांतिकारियों की बलिदानी परंपराओं का स्मरण कराने के कारण पूरे समाज ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ और ‘क्रांति-कवि’ जैसे संबोधनों से सम्मानित किया। लेकिन उन्होंने स्वयं को ‘युग चारण’ ही कहा।

उनकी रचना—

“मैं अमर शहीदों का चारण,

उनके गुण गाया करता हूँ।

जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है,

मैं उसे चुकाया करता हूँ।”

हिंदी साहित्य की एक अद्भुत और कालजयी रचना है।

मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने श्रीकृष्ण सरल जी के नाम पर कविता के लिए प्रतिवर्ष ‘श्रीकृष्ण सरल पुरस्कार’ आरंभ किया है। उन्हें विभिन्न संस्थाओं द्वारा ‘भारत गौरव’, ‘राष्ट्रकवि’, ‘क्रांति-कवि’, ‘क्रांति-रत्न’, ‘अभिनव-भूषण’, ‘मानव-रत्न’, ‘श्रेष्ठ कला-आचार्य’ आदि अलंकरणों से विभूषित किया गया।उन्होंने सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन जी से प्रेरित होकर अमर बलिदानी भगत सिंह की माता श्रीमती विद्यावती जी के सानिध्य में राष्ट्र के प्राणदानियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को अपने साहित्य का विषय बनाया।

वे चाहते थे कि आने वाली पीढ़ियां इन हुतात्माओं से परिचित हों और राष्ट्र-निर्माण के लिए आगे आएं। यह भावना उनकी रचनाओं में बहुत स्पष्ट दिखाई देती है—

“जिसे देश से प्यार नहीं है,

जीने का अधिकार नहीं है।

जीने को तो पशु भी जी लेते हैं,

अपना पेट भरा करते हैं।

कुछ दिन दुनिया में रहकर

वे अंततः मरा करते हैं।

ऐसे जीवन और मरण को,

होता यह संसार नहीं है।”

इस रचना में एक सक्रिय और सृजनात्मक जीवन जीने का स्पष्ट आह्वान है।

उनकी एक अन्य रचना है—

**“करो या मरो, वीर की तरह,

चलो सुरभित समीर की तरह,

जियो या मरो, वीर की तरह।

वीरता जीवन का भूषण,

वीर भोग्या है वसुंधरा।

भीरुता जीवन का दूषण,

भीरु जीवित भी मरा-मरा।

वीर बन उठो सदा ऊंचे,

न नीचे बहो नीर की तरह।

जियो या मरो, वीर की तरह।”

साहित्यकारों ने माना—‘जीवित शहीद’ थे सरल जी

उनकी रचनाओं और व्यक्तित्व पर सुप्रसिद्ध साहित्यकार पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने कहा था—“भारतीय शहीदों का समुचित श्राद्ध तो सरल जी ने ही किया है।” महान क्रांतिकारी पं. परमानंद ने कहा था—“सरल जी जीवित शहीद हैं।”

जीवन के उत्तरार्ध में आध्यात्म की ओर मुड़ी लेखनी

अपने जीवन के उत्तरार्ध में सरल जी आध्यात्मिक चिंतन की ओर मुड़े। उन्होंने तीन महाकाव्य लिखे—एक ‘तुलसी मानस’, दूसरा ‘सरल रामायण’ एवं तीसरा ‘सीतायन’।इन तीनों महाकाव्यों में संस्कृति, भक्ति और मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम तथा माता सीता के आदर्श चरित्र का वर्णन तो है ही, इसके साथ उनके जीवन और उनके अवतरण की लीला से समाज-जीवन को मिलने वाले संदेशों का भी संकेत मिलता है।

सरल जी ने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से 15 महाकाव्यों सहित 124 ग्रंथ लिखे और स्वयं ही उनका प्रकाशन कराया। उन्होंने अपनी पुस्तकों की लगभग पाँच लाख प्रतियां बेचीं। इस कार्य में उन्होंने अपनी सारी पूंजी लगा दी थी।

क्रांति-कथाओं का शोधपूर्ण लेखन करने के संदर्भ में वे अपने खर्च पर दस देशों की यात्राओं पर गए। पुस्तकों को लिखने और उन्हें प्रकाशित कराने में सरल जी की अचल संपत्ति से लेकर पत्नी के आभूषण तक बिक गए।उनकी सर्वाधिक अमर कृति ‘क्रांति गंगा’ को लिखने में 27 वर्षों का समय लगा। बलिदानी भगत सिंह पर लिखे महाकाव्य के विमोचन के अवसर पर भगत सिंह की माताजी स्वयं श्रीकृष्ण सरल जी के आमंत्रण पर उपस्थित हुई थीं।

आने वाली पीढ़ियों को कृतघ्न नहीं बनाना चाहते थे। सरल जी का कहना था कि वे क्रांतिकारियों पर इसलिए लिखते हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों को कृतघ्न न कहा जाए।

‘जीवित-बलिदानी’ की उपाधि से अलंकृत श्रीकृष्ण ‘सरल’ सिर्फ नाम के ही सरल नहीं थे, सरलता उनका स्वभाव था। राष्ट्र, संस्कृति और राष्ट्ररक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले क्रांतिकारियों की गाथा में अपना जीवन अर्पित करने वाले श्रीकृष्ण सरल जी ने 2 सितंबर 2000 को संसार से विदा ली।वे भले ही संसार से विदा हो गए, लेकिन उनका रचना-संसार आज भी समाज को प्रेरणा दे रहा है।

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