भादों की सुगंध सिवान में बिचर रही होगी । बिछलते पगडंडियों पर घास उग आई होगी, ताल ठहर गए होंगे, नदी भी दधि- हांडी सिर पर रखे जाती हुई किसी गोपी सी गति कर रही होगी, पात पात को पुलकित करती, वार्द्धक्य को तरुण बनाती, प्रेम में सनी ऋतु का अस्वादन कराती पुनर्नवा बयार देह को छू कर अनायास उसमें मीठे रस भर रही होगी। माथे पर माधव नाम छपता जा रहा होगा। हरे कृष्णा कहते टोलियां मंदिर को जा रही होंगी, हर कामना, वासना, लास्य, रूप, रस, गीत की निर्मल निर्दोष अभिव्यक्ति करने जन्माष्टमी आयी होगी।

मंदिर के प्रांगण बंदनवारों से सज गए होंगे, मालिन माला गूंथने में लग गयी होगी, राधा कृष्ण के सिंगार पटार के लिए सुनार अपनी पारम्परिक पेटी खोल रहा होगा। दर्जी लड्डू गोपाल के लिए कपड़े और हलवाई मिठाई बना रहा होगा।दुकानों में लक्खा का अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो कि दर पे सुदामा वाला गाना बज रहा होगा, जथा जोग सभी झांकी सजाने की तैयारी में जुट गए होंगे।

जन्माष्टमी आयी होगी, मंदिर में धूप दीप नैवेद्य, सोहर और मंगलगान के साथ मिलकर कण कण की अपावनता को पावन कर रहे होंगे। राधे कृष्ण के जयबोल हो रहे होंगे। झांकियां सजी होंगी। कहीं कालिया नाग मर्दन, कहीं रास, कहीं देवकी वासुदेव की कैद, कहीं कान्हा यशोदा मैया को ब्रह्मांड दिखा रहा है, कहीं माखन चुराया जा रहा है। केले के तने, पत्तों, कनेर के फूलों, रंग बिरंगे कागजों से बनाए गए महल कितने सुंदर दिख रहे हैं। लाइट में लगे बल्ब किसी फूल जैसे खिल रहे होंगे।

मंदिर के आस पास मेला लगा होगा, मिठाईयों की सुगंध पाते ही बच्चे पिता की उंगली पकड़ उस ओर ले जाते होंगे। चूड़ी और सेनुर की दुकान पर सुहागिने बैठक लगाई होंगी। मेले के किसी कोने में गुड़ की जलेबी बन रही होगी, पास ही पोस्टर, कैलेंडर और फोटो की दुकान होगी। उसके बगल में किस्सा तोता मैना और शीत बसंत की किताबों से सजी दुकानों पर बच्चों की भीड़ लगी होगी।

गीत गाती टोलियों के जवाबी कीर्तन चरम पर होंगे, मृदंग ढोल और झाँझ बज रहे होंगे, किसी ने तान टेरी होगी, के चरावे मोर गईया मोहन बिना, जिन मांओं के बेटे परदेस में होंगे उनका आंचर भीज गया होगा। जैसे ही, ललिता और बिसाखा गोपी ठाढ रहीं मन मारे, राधा औ अनुराधा जेकरे तुमही प्राण अधारे, गीत गाया गया होगा, ढोल की धमक में कई जोड़ी हृदय भी धड़के होंगे। स्वर संगीत के माध्यम से हर असहमति,सहमति शिकायत उलाहने आपस में संवाद कर रहे होंगे।

बारह बज गए होंगे। घंटे, शंख, घड़ियाल,ढोल, ताशे जोर जोर से बजने लगे होंगे, हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल के स्वर गूंज उठे होंगे। घर घर में आरती कुंज बिहारी की हो रही होगी, बच्चे परसाद पर टुकटुकी लगाए होंगे।

जन्माष्टमी ऐसे आई होगी।

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