भारतीय देव-प्रतिमाएँ केवल उपासना की वस्तुएँ नहीं, बल्कि दर्शन, प्रकृति-निरीक्षण, मनोविज्ञान और प्रतीक-विज्ञान को दृश्य भाषा में व्यक्त करने की विकसित परंपरा भी हैं। प्रस्तुत 10 वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा इसका सुंदर उदाहरण है। इसमें भगवान् गणेश जी के प्रत्येक अंग, आयुध, मुद्रा और सहायक आकृति के पीछे एक विशिष्ट प्रतीकार्थ दिखाई देता है। आधुनिक दृष्टि से इन प्रतीकों को शाब्दिक विज्ञान न मानकर मानव-व्यवहार और प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन से विकसित ज्ञान-संकेतों के रूप में समझना अधिक उचित है।

गणेश का विशाल मस्तक व्यापक चिंतन, स्मृति और विवेक का प्रतीक है। बड़े कान अधिक सुनने, सूचना ग्रहण करने और फिर उसका विवेकपूर्ण विश्लेषण करने का संदेश देते हैं। सूक्ष्म नेत्र एकाग्रता और सूक्ष्म निरीक्षण की ओर संकेत करते हैं। हाथी की सूँड़ प्रकृति में शक्ति और संवेदनशीलता का अद्भुत संयोजन है—वह भारी वस्तु को उठा सकती है और अत्यंत सूक्ष्म वस्तु को भी नियंत्रित कर सकती है। अतः गणेश की सूँड़ को आधुनिक भाषा में Strength with Sensitivity तथा Adaptability का उत्कृष्ट रूपक कहा जा सकता है।

गणेश का एकदन्त ज्ञान के लिए त्याग, संकल्प और अपूर्ण परिस्थितियों में भी पूर्ण कार्य करने की क्षमता का संकेत है। पुराण-परंपरा में गणेश द्वारा महाभारत लेखन से जुड़ी कथा इसे ज्ञान-साधना से और गहराई से जोड़ती है। उनके हाथ की अक्षमाला निरंतर साधना, पुनरावृत्ति, अनुशासन, गणना और ज्ञान-अर्जन का प्रतीक है। अंकुश मन की अनियंत्रित प्रवृत्तियों और आवेगों पर नियंत्रण का संकेत देता है, जबकि मोदक अनुशासन एवं साधना से प्राप्त आनंद और उपलब्धि का प्रतीक है।

प्रतिमा में दिखाई देने वाला नाग-यज्ञोपवीत भी महत्वपूर्ण है। भारतीय प्रतीक-परंपरा में सर्प ऊर्जा, सजगता, जीवन-शक्ति, पुनर्नवीकरण तथा प्रकृति की चक्रीयता से जुड़ा रहा है। इसी प्रकार गणेश का मूषक अत्यंत अर्थपूर्ण है। छोटी-छोटी जगहों में प्रवेश करने वाला, निरंतर सक्रिय और चंचल मूषक इच्छाओं एवं अस्थिर मन का रूपक माना जा सकता है। गणेश का उस पर नियंत्रण यह संदेश देता है कि इच्छाएँ बुद्धि के अधीन रहें, बुद्धि इच्छाओं के अधीन नहीं। आधुनिक व्यवहार-विज्ञान की भाषा में इसे Impulse Control और Self-Regulation से जोड़ा जा सकता है।

प्रतिमा के दोनों ओर बने मकर, शीर्षस्थ कीर्तिमुख, अलंकृत प्रभावली/तिरुवासी, परिचारक आकृतियाँ और पद्मपीठ यह प्रमाणित करते हैं कि भारतीय शिल्पकार केवल आकृति नहीं गढ़ता था; वह एक संपूर्ण Visual Knowledge System निर्मित करता था, जिसमें प्रकृति, सौंदर्य, अनुपात, प्रतीक और दर्शन एक-दूसरे से जुड़े रहते थे।

भगवान् गणेश-प्रतिमा आधुनिक न्यूरोसाइंस, जीवविज्ञान अथवा भौतिकी का प्रत्यक्ष चित्रण है। इसकी वास्तविक वैज्ञानिकता अवलोकन, वर्गीकरण, अनुपात, प्रकृति-बोध, मानव-मनोविज्ञान और प्रतीकों के तार्किक संयोजन में निहित है।इस दृष्टि से श्रीगणेश केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि बुद्धि, एकाग्रता, अनुकूलनशीलता, आत्मनियंत्रण, शक्ति, संवेदनशीलता और ज्ञान-साधना के समन्वित भारतीय प्रतिमान हैं।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

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