'भाषा की पाठशाला' : सूचना, समाचार, ख़बर, संवाद और संवादी
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सूचना : शब्द किस तरह अपने अर्थ का विस्तार करते हैं, इसका एक सुंदर उदाहरण है– सूचना। यह
‘सूच्’ धातु से व्युत्पन्न है, जिसमें चुभाने, बींधने आदि का भाव है। इसी ‘सूच्’ से बने ‘सूच’ का हिंदी अर्थ है– कुशा (घास) का नुकीला हिस्सा, नोकदार पत्ता। निश्चित ही, चुभने के गुण कारण ही यह नाम आया होगा। इसी ‘सूच्’ से बने ‘सूचिका’ (सूई) में भी वही नुकीला हिस्सा है, जिससे बेधा जाता है, चुभाने का काम लिया जाता है।

अनुभवजन्य सत्य है कि दैनंदिन जीवन में किसी को अचानक किसी ओर दिखाने, कुछ बताने या निर्देशित करने के लिए भी उंगली को कुछ कोंचकर या चुभाकर ध्यान खींचा जाता है। कालांतर में कुछ भी बताने, जानकारी देने के लिए ‘सूचना’ शब्द का प्रयोग होने लगा। सूचना देनेवाले को ‘सूचक’ कहा गया। जिसे बींधा गया या सूचना दी गई, वह ‘सूचित’(सूच्+क्त) हुआ। यह प्रक्रिया ‘सूचना’(सूच् भावे ल्युट्) हुई, जबकि जो बताने या सूचित करने के योग्य है, वह ‘सूच्य’(सूच्+ण्यत्) कहलाया। धीरे-धीरे पुस्तकें, समाचारपत्र, इंटरनेट, लोकजीवन इत्यादि से जो भी कुछ पता लगा, निर्देश मिला, जानकारी मिली…सब ‘सूचना’ के दायरे में आ गई और यह युग ही ‘सूचना का युग’ हो गया। इससे अधिक अर्थविस्तार भला और क्या होगा?

संवाद : संस्कृत की ‘वद्’ धातु से बने ‘वाद’(वद्+घञ्) शब्द का मूल अर्थ है– बातें करना, बोलना। इसमें ‘सम्’ उपसर्ग (अर्थ : सम्यक् रूप से, अच्छी तरह) जुड़कर संवाद शब्द बना है। इस प्रकार संवाद का मूल अर्थ ‘सम्यक् रूप से बोलना’, संतुलित बोलना या अच्छा बोलना है। जो यह संवाद दे या अच्छा बोले, वह ‘संवाददाता’, जो ऐसा संवाद करे(सामने वाले की जिज्ञासा के अनुसार) वह ‘संवादी’। ‘संवादी’ केवल ‘सूचनाप्रदाता’ या ‘संवाददाता’ नहीं होता, वह सुंदर चर्चा करता है, संवाद करता है। 

समाचार : आचार शब्द में ‘सम्’(अर्थ– सम्यक्) उपसर्ग मिलकर समाचार शब्द बनता है। आचार शब्द स्वयं बना है, ‘चर्’ धातु से, जिसमें चलने अथवा गति का भाव है। जैसा किसी का चाल-चलन अथवा व्यवहार होता है, वह उसका ‘आचार’ कहलाता है। इस प्रकार, समाचार शब्द का मूल अर्थ है– सदाचार या अच्छा चालचलन। कालांतर में यह शब्द भी मोटा हुआ और अब बुरी या विषम सूचना भी ‘समाचार’ के अंतर्गत आती है।

ख़बर : ख़बर अरबी भाषा का स्त्रीलिंग शब्द है, जो सूचना, संवाद, इत्तिलाअ अथवा पैगाम का द्योतक शब्द है। ख़बर लेनेवाला ‘ख़बरगीर’, जबकि ‘ख़बररसाँ’ का अर्थ है– ख़बर अथवा सूचना पहुँचानेवाला या संदेशवाहक। मुख़बिर भी ख़बर ही पहुँचाता है, भले छुप-छुपाकर पहुँचाता है। और तो और, इसी ख़बर का बहुवचन बना ‘अख़बार’, जिससे हमें देश दुनिया की ख़बर मिलती है।

कमलेश कमल 
— सुप्रसिद्ध भाषा विज्ञानी एवं वैयाकरण