भारत की राजनीतिक एकता की बात हो तो सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। 1947 में अंग्रेजी शासन समाप्त हुआ, लेकिन स्वतंत्रता के साथ ही देश के सामने एक कठिन प्रश्न खड़ा था। सैकड़ों देशी रियासतों का भविष्य क्या होगा? यदि वे स्वतंत्र रहने या अलग रास्ता चुनने पर अड़तीं तो नवजात राष्ट्र का स्वरूप आज कुछ और ही होता लेकिन सरदार पटेल ने गृह मंत्री और रियासतों के विभाग के प्रमुख के रूप में इस चुनौती का सामना किया। वी.पी. मेनन ने इस काम में उनका साथ दिया। बातचीत, समझाइश, राजनीतिक कौशल और आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ निर्णयों के सहारे अधिकांश रियासतें भारतीय संघ में शामिल हुईं। जूनागढ़ और हैदराबाद जैसे कठिन प्रश्नों का समाधान भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा था।


सरदार पटेल ने केवल कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर नहीं करवाए थे; उन्होंने एक ऐसे देश की राजनीतिक नींव मजबूत की, जिसे स्वतंत्रता के साथ विभाजन का घाव भी मिला था। उनकी भूमिका के कारण ही उन्हें लौह पुरुष कहा गया। लेकिन भारत की एकता की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। भूगोल को एक राजनीतिक सीमा में बाँधना एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, लोगों के मन में एक-दूसरे के लिए जगह बनना एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा है।

यह यात्रा बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। काशी, पुरी, द्वारका और रामेश्वरम् जैसे तीर्थों तक पहुँचने के लिए लोग दूर-दूर से निकलते थे। उत्तर का यात्री दक्षिण जाता, दक्षिण का श्रद्धालु काशी, मथुरा पहुँचता। यात्राओं ने लोगों को बताया कि देश का दूसरा सिरा कोई अनजान दुनिया नहीं है। वहाँ भी परिवार हैं, अतिथि का आदर है, उत्सव हैं और जीवन की वही छोटी-बड़ी चिंताएँ हैं।


भारत के मेलों और बाजारों ने भी यह परिचय बढ़ाया। व्यापारी एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक जाते रहे। कारीगर अपने हुनर के साथ नए ठिकानों पर पहुँचे। संगीतकारों, संतों और कथावाचकों ने अपनी रचनाएँ और विचार दूर-दूर तक पहुँचाए। भक्ति आंदोलन की अनेक धाराओं में स्थानीय भाषाओं का इस्तेमाल हुआ। कबीर, गुरु नानक, मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु और दक्षिण के आलवार-नायनार संतों की परंपराएँ अपने-अपने क्षेत्र में विकसित हुईं, लेकिन उनकी वाणी और विचारों का प्रभाव क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर भी गया। 


रामकथा इसका एक सुंदर उदाहरण है। तुलसीदास की रामचरितमानस उत्तर भारत में घर-घर पहुँची, तो तमिल कवि कंबन ने रामायण को अपनी भाषा और काव्य परंपरा में नया रूप दिया। ओड़िया, बंगाली, असमिया, मराठी और अन्य भाषाओं में भी रामकथा के अपने रूप हैं। कथा का आधार परिचित है, लेकिन हर भाषा ने उसमें अपने लोकजीवन, कल्पना और संवेदना के रंग भरे। एक ही कथा के इतने रूप यह बताते हैं कि सांस्कृतिक निकटता का अर्थ सबका एक जैसा हो जाना नहीं है।

भारत के त्योहारों में भी यही बात दिखाई देती है। पंजाब की बैसाखी, असम का बिहू, केरल का ओणम, गुजरात का नवरात्र, महाराष्ट्र की गणेशोत्सव परंपरा और उत्तर भारत की दीपावली अपने-अपने क्षेत्र की स्मृतियों से जुड़े हैं। फिर भी किसी दूसरे प्रदेश का व्यक्ति जब इन उत्सवों में शामिल होता है तो उसे अपने जीवन से जुड़ी कोई न कोई अनुभूति मिल जाती है। फसल की खुशी, परिवार का मिलना, ऋतु का बदलना और सामूहिक भोजन, इन भावनाओं को समझने के लिए अनुवाद की जरूरत नहीं पड़ती।


जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक परंपराएँ भी भारत की पहचान का अविभाज्य हिस्सा हैं। गोंड, भील, संथाल, उरांव, नागा, मिजो और समुदायों की अपनी भाषाएँ, लोककथाएँ, नृत्य, देवस्थल और प्रकृति से जुड़ी मान्यताएँ हैं। उनकी परंपराओं को किसी एक साँचे में ढालना या उन्हें मुख्यधारा से अलग रखकर देखना उचित नहीं। भारत की संस्कृति का विस्तार इन्हीं विविध अनुभवों से हुआ है। अपनी भाषा और रीति बचाए रखते हुए दूसरे समुदाय की परंपरा का सम्मान करना ही साझा जीवन की खूबी है।


स्वतंत्रता आंदोलन ने इस सांस्कृतिक परिचय को राजनीतिक उद्देश्य से भी जोड़ा। बंगाल का स्वदेशी आंदोलन, पंजाब के क्रांतिकारियों का संघर्ष, महाराष्ट्र और गुजरात के जनआंदोलन, दक्षिण भारत के सत्याग्रह और देश के अनेक हिस्सों में उठी आवाजें एक-दूसरे से प्रेरणा लेती रहीं। स्वतंत्रता के बाद संविधान ने इस विविधता को जगह दी। नागरिकों को समानता का अधिकार मिला और भाषा, संस्कृति तथा शिक्षा से जुड़े अधिकारों के माध्यम से अपनी पहचान सुरक्षित रखने का आधार भी मिला।


सरदार पटेल की विरासत को याद करते हुए वर्तमान मोदी सरकार ने भी कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिनका उद्देश्य उनके योगदान को राष्ट्रीय स्मृति में प्रमुख स्थान देना और एकता के विचार को जनभागीदारी से जोड़ना है। वर्ष 2014 में 31 अक्टूबर को उनकी जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इस अवसर पर देशभर में ‘रन फॉर यूनिटी’, एकता की शपथ और अन्य कार्यक्रम शुरू किए गए। 2015 में ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ पहल की घोषणा हुई, जिसके तहत अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के बीच सांस्कृतिक तथा शैक्षिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया गया। 


इसका उद्देश्य था कि एक क्षेत्र के विद्यार्थी और नागरिक दूसरे क्षेत्र की भाषा, खानपान, कला और परंपराओं को जानें। इस पहल में राज्यों की जोड़ी बनाकर विद्यार्थियों, युवाओं और सांस्कृतिक समूहों के बीच संवाद, भाषा सीखने और पर्यटन को बढ़ावा देने की व्यवस्था की गई। इससे दूसरे प्रदेश को केवल नक्शे पर देखने के बजाय उसके लोगों के बीच जाकर समझने का अवसर मिलता है। राष्ट्रीय एकता दिवस की परेड और शपथ इस स्मरण को जनभागीदारी से जोड़ते हैं।


31 अक्टूबर 2018 को गुजरात के केवड़िया में 182 मीटर ऊँची ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का लोकार्पण हुआ। यह विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा है और सरदार पटेल को समर्पित है। प्रतिमा के निर्माण को केवल स्मारक खड़ा करने की परियोजना नहीं, बल्कि देशभर के लोगों की भागीदारी से जुड़ा अभियान भी बनाया गया। इसके अतिरिक्त, 2019 में केंद्र सरकार ने ‘सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता पुरस्कार’ स्थापित किया। इसका उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता को बढ़ावा देने में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को सम्मानित करना है। 


किसी महापुरुष को याद करने का एक तरीका उनकी प्रतिमा बनाना है, दूसरा उनके विचारों को व्यवहार में उतारना। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी दूर से दिखाई देती है, लेकिन एकता का असली अर्थ तब सामने आता है जब हम अपने से अलग भाषा बोलने वाले व्यक्ति को बराबरी से सुनते हैं, दूसरे प्रदेश से आए व्यक्ति को सम्मान देते हैं और किसी समुदाय की परंपरा को कमतर नहीं आँकते। सरकारी आयोजन लोगों को अवसर दे सकते हैं, पर रोजमर्रा के व्यवहार में अपनापन हमें ही पैदा करना होता है।राष्ट्रीय एकता दिवस पर सरदार पटेल को याद करते हुए उन अनगिनत यात्रियों, कलाकारों, संतों, व्यापारियों, किसानों और सामान्य परिवारों को भी याद करना चाहिए जिनकी आवाजाही ने भारत के मानव समुदाय को एक-दूसरे से परिचित कराया। पटेल ने बिखरी रियासतों को एक राजनीतिक संघ में जोड़ा। संस्कृति ने अलग-अलग भाषाओं और परंपराओं वाले लोगों को एक-दूसरे के सुख-दुख, स्वाद, गीत को लोक से जोड़ा। भारत की खूबी यही है कि यहाँ एक होने के लिए एक जैसा होना जरूरी नहीं।

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