किसी भी राष्ट्र के जीवन में एक सदी का कालखंड केवल समय का एक पड़ाव नहीं होता, बल्कि वह उस समाज के सामूहिक संस्कारों, वैचारिक दृढ़ता और निरंतर तपस्या का जीवंत दस्तावेज होता है। वर्ष 1925 की विजयादशमी के पावन दिन नागपुर की धरती पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा बोया गया बीज आज सौ वर्षों की लंबी और देदीप्यमान यात्रा पूरी कर चुका है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)  अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे कर चुका है। यह यात्रा केवल एक संगठन के विस्तार की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे सांस्कृतिक संकल्प का इतिहास है जिसने करोड़ों दिलों में 'राष्ट्र प्रथम' की भावना को प्रज्ज्वलित किया है।

जब संघ की स्थापना हुई थी, तब देश विदेशी शासन की परतंत्रता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और समाज विभिन्न कुप्रथाओं, जातियों और संकीर्णताओं में बंटा हुआ था। ऐसे नाज़ुक दौर में डॉ. हेडगेवार ने यह गहराई से महसूस किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से समाज की वास्तविक मुक्ति संभव नहीं है। जब तक देश का नागरिक मानसिक रूप से सशक्त, अनुशासित और राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत नहीं होगा, तब तक स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं रह सकती।

यहीं से 'व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण' का वह मौलिक विचार जन्मा, जिसने संघ की पूरी कार्यपद्धति को गढ़ा। नागपुर की एक छोटी सी शाखा से शुरू हुआ यह सफर आज दुनिया के सबसे बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन बन चुका है। शाखा का वह मैदान कोई साधारण खेल का मैदान नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रयोगशाला है जहाँ "मैं से हम" की यात्रा तय होती है। वहाँ न कोई छोटा होता है, न बड़ा; सब भगवा ध्वज के समक्ष समान भाव से खड़े होकर देश के लिए समर्पण का संकल्प लेते हैं। 

संघ की सौ साल की यह यात्रा इस बात की साक्षी है कि जब भी देश पर कोई प्राकृतिक आपदा या राष्ट्रीय संकट आया, स्वयंसेवक सबसे पहले कतार में खड़े मिले। चाहे बाढ़, सूखा, भूकंप जैसी महाविपत्तियां हों या देश के विभाजन का वह दर्दनाक और खौफनाक दौर, स्वयंसेवकों ने बिना किसी स्वार्थ या प्रचार की इच्छा के राहत और बचाव कार्य में अपनी पूरी ताकत झोंक दी।

इतिहास के पन्नों में यह बात दर्ज है कि आपातकाल के काले दिनों में लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिन्होंने सबसे कड़ा संघर्ष किया, उनमें भी संघ के स्वयंसेवक अग्रणी रहे। इसके अलावा, सामाजिक सद्भाव और मानवीय संवेदनाओं का परिचय देते हुए कठिन परिस्थितियों में हर पीड़ित के आंसू पोछने का काम संघ की कार्यसंस्कृति का अहम हिस्सा रहा है। यह सेवा भाव किसी दिखावे के लिए नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के उस मूल मंत्र पर आधारित है जो 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'नराः नारायणः' की सीख देता है।

जब संघ ने अपनी यात्रा के सौ वर्ष पूरे किए, तो यह केवल उत्सव मनाने का समय नहीं था, बल्कि भविष्य के भारत की रूपरेखा तय करने का अवसर था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक अवसर पर संघ के शताब्दी समारोहों से जुड़ते हुए इसके राष्ट्रव्यापी योगदान को न केवल सराहा, बल्कि सौ साल के इस सफर को अनुशासन और राष्ट्रसेवा की मिसाल बताया। इस अवसर पर देश भर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हुआ और समाज को जोड़ने के नए आयाम रचे गए।

शताब्दी के इस पड़ाव पर संघ ने समाज के सामने कुछ ऐसे महत्वपूर्ण लक्ष्य रखे हैं जिन्हें 'पंच परिवर्तन' कहा गया है:

1-सामाजिक समरसता: समाज से छुआछूत, ऊंच-नीच और वैमनस्य को पूरी तरह मिटाकर एक समतावादी और एकजुट समाज की स्थापना करना।

2-कुटुंब प्रबोधन: आज के आधुनिक और यंत्रवत दौर में टूटते जा रहे पारिवारिक मूल्यों को बचाना, बच्चों में संस्कार सींचना और परिवार को एक मजबूत भावनात्मक केंद्र बनाना।

3-पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति के दोहन के बजाय उसका संवर्धन करना, जल संरक्षण, पौधे लगाना और प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली अपनाना ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ धरती मिल सके।

4-स्वदेशी आचरण: अपनी स्थानीय कलाओं, उत्पादों और कारीगरों का सम्मान करते हुए आर्थिक स्वावलंबन की ओर बढ़ना।

5-नागरिक कर्तव्य: अधिकारों की मांग के साथ-साथ देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करना, जैसे यातायात नियमों का पालन, स्वच्छता और देश के कानूनों का सम्मान।

आज भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र है, लेकिन वैचारिक रूप से अभी भी कई मायनों में औपनिवेशिक मानसिकता की जंजीरें पूरी तरह टूटी नहीं हैं। संघ का शताब्दी वर्ष इस बात पर विशेष जोर देता है कि हमें अपनी भाषा, अपनी वेशभूषा, अपने इतिहास और अपनी जीवनशैली पर गर्व करना चाहिए। जब तक हम अपनी जड़ों से नहीं जुड़ेंगे, तब तक एक आत्मनिर्भर और शक्तिशाली भारत का सपना पूरा नहीं हो सकता।संस्कृति केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज कोई प्राचीन वस्तु नहीं है, बल्कि यह वह जीवंत ऊर्जा है जो वर्तमान को दिशा देती है और भविष्य का मार्ग प्रशस्त करती है। संघ ने इन सौ वर्षों में इसी सांस्कृतिक चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का ऐतिहासिक कार्य किया है

सौ वर्षों की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि यदि विचार पवित्र हो, नीयत साफ हो और समर्पण निस्वार्थ हो, तो समय की बड़ी से बड़ी बाधाएं भी स्वतः दूर हो जाती हैं। आज जब संघ अपने दूसरे सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है, तो उसके सामने चुनौतियां भी हैं और अनंत संभावनाएं भी।यह समय केवल अतीत की उपलब्धियों पर पीठ थपथपाने का नहीं, बल्कि आने वाले कल के भारत को अधिक समर्थ, सुरक्षित, स्वावलंबी और सुसंस्कृत बनाने के लिए नए सिरे से कमर कसने का है। राष्ट्र सेवा का जो दीप डॉ. हेडगेवार और उनके सहयोगियों ने जलाया था, आज वह करोड़ों हाथों की श्रृंखला से एक विशाल प्रखर आदित्य बन चुका है। यह शताब्दी यात्रा हमें यह याद दिलाती है कि देश सेवा कोई अंशकालिक कार्य नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शाश्वत मार्ग है।

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