माँ दुर्गा को आदिशक्ति कहा गया है; अर्थात् सृष्टि की सभी शक्तियाँ इन्हीं से निःसृत होती हैं। माँ सृष्टि की नियामिका शक्ति भी हैं। इसका अर्थ है कि अखिल ब्रह्माण्ड को नियोजित, नियमित, निर्देशित व संचालित करने वाली शक्ति भी यही हैं। नवरात्र इसी आदि शक्ति की आराधना का महापर्व है।

वस्तुतः, वर्ष की चारों ऋतु-संधियों (चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ) पर शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाने वाला, आदिशक्ति की आराधना का महान् पर्व नवरात्र का न केवल धर्म और आस्था; अपितु भाषा, तर्क, दर्शन, योग, विज्ञान या कहें कि जीवन जीने की दृष्टि से भी महत्त्व है। इनमें भी शारदीय नवरात्र का विशेष महत्त्व है। अगर हम माँ की आराधना से जुड़े विविध शब्दों के अर्थ को समझ लें, तो इससे साधना में मदद मिलती है।

सर्वप्रथम, दुर्गा शब्द को समझते हैं:–  वेदों में ‘दुर्गा’ शब्द का उल्लेख नहीं है। उपनिषदों में ‘उमा’ या ‘हेमवती’ शब्द हैं, जबकि पुराण में ‘आदिशक्ति’ की चर्चा की गई है।

दुर्गा शब्द ‘दुर्ग’ में ‘आ’ प्रत्यय  जोड़कर बना है। इसका एक अर्थ है –"जो शक्ति दुर्ग की रक्षा करती हैं, दुर्गा हैं"। यह ‘दुर्ग’ साधक के लिए उसका शरीर हो सकता है, उसकी चेतना हो सकती है। भक्त के लिए सर्वशक्तिस्वरूपिणी दुर्गतिनाशिनी ही ‘दुर्गा’ है। पर्यावरणविद् के लिए यही ‘दुर्ग’ कठिनता से जाए जा सकने योग्य स्थल हो सकते हैं तो पृथ्वी के लिए यह उसका पर्यावरण हो सकता है, जिसमें जीवन है। व्यापक अर्थों में, व्यष्टि से समष्टि तक की नानाविध रक्षा करने वाली दुर्गा ही हैं।

व्युत्पत्तिगत दृष्टिकोण से ‘दुर्गा’ शब्द ‘दुर्’ और ‘गः’ अथवा ‘दुर्’ और ‘गम्’ से बना है। दुर् का अर्थ मुश्किल, कठिन आदि है। गः या गम् का अर्थ जाना या गमन करना है। इस तरह दुर्गा का अर्थ हुआ– जहाँ जाना कठिन हो या जिसे पाना कठिन हो। यह किसी साधक के लिए सर्वोच्च चेतना हो सकती है, भक्तों के लिए भगवत्ता की प्राप्ति हो सकती है, तो किसी योगी के लिए मूलाधार से सहस्रार की यात्रा हो सकती है।

देखा जाए तो पृथ्वी पर सबसे दुर्गम स्थान ऊँचे-ऊँचे पर्वत होते हैं और यह अनायास ही नहीं है कि माँ दुर्गा के लगभग सभी मंदिर ऊँचे-ऊँचे पर्वतों पर हैं, दुर्गम जगहों पर हैं; जहाँ जाने के लिए साधना करनी पड़ती है। यही कारण है कि दुर्गा को ‘पहाड़ों वाली माँ’ भी कहा जाता है ।

माँ दुर्गा को ‘महिषासुर मर्दिनी’ भी कहा गया है । 'महिषासुर' सामान्य जनों के लिए एक भैंसे की आकृति वाला राक्षस है, लेकिन भाषा-विज्ञान की दृष्टि से महिषासुर शब्द ‘महिष’ और ‘असुर’ के योग से बना है। महिष शब्द ‘मह्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ महान्, बलवान्, शक्तिमान् इत्यादि होता है। इस तरह से ‘महिष’ का अर्थ महान् होता है और इसी का स्त्रीलिंग रूप महिषी है। राजमहिषी राज्य की प्रथमस्त्री या महारानी होती है। इसी प्रकार, महिषासुर का अर्थ हुआ ‘महान् असुर’।  असुर को राक्षस भी कहा जाता है और अ(बिना) सुर का भी कहा जा सकता है। तो, हमारी चेतना का ताल या सुर का बिगड़ना ही अंदर का ‘अ-सुर है। दूसरे शब्दों में विकार का आना ही आसुरी वृत्ति का आना है। इस प्रकार महिषासुर का अर्थ हुआ : 'महान् है जो असुर' (जो हमारे अंदर ही होता है, कहीं बाहर नहीं।) नवरात्र वस्तुतः अपने अंदर की इस आसुरी वृत्ति को समाप्त कर परम-चेतना की अवस्था को प्राप्त करने के लिए ही मनाया जाता है। 

दुर्गा को जगदंबा भी कहा जाता है जगदंबा बना है जगत् +अम्बा से। अर्थात् आदिशक्ति ही जगत् की अम्बा (माँ) हैं (जगज्जननी भी); क्योंकि सभी शक्तियों की स्रोत वही हैं। कहते हैं कि माँ ने ‘धूम’ नामक राक्षस का वध किया। यह प्रतीकात्मक व्यवस्था है। धूम या धुँआ अज्ञानता का प्रतीक है। तो, प्रतीक में निहितार्थ यह है कि माँ दुर्गा की उपासना से अज्ञानता रूपी राक्षस का नाश होता है।

इसे ‘रक्त-बीज’ का वध करने वाली भी कहा गया है। रक्त और बीज हमारे भौतिक रूप अर्थात् हमारी जडता के प्रतीक हैं। आदमी रक्त और बीज से ही तो बनता है। रक्तबीज का वध करने वाली माँ का अर्थ जडत्व का नाश कर अमृत देने वाली होता है; इसलिए ही तो माँ को अमृत-फल-दायिनी कहा गया है।

चंड-मुंड का वध करना भी प्रतीकात्मक है। चंड हमारी चिंता या अज्ञानता है और मुंड हमारा सिर है और अहंकार का प्रतीक है। तो, माँ दुर्गा हमारे अहंकार का नाश करने वाली भी हैं। माता के रौद्र रूप में जो गले में मुंडमाला लटकी है, वह वस्तुतः हमारे अहंकार के विविध रूपों की माला है। माँ दुर्गा की उपासना से इस अहंकार रूपी माला का समूल नाश हो जाता है।

इसी तरह माँ दुर्गा के हर नाम से ही उसका अर्थ उद्घाटित हो जाता है, यथा – भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली (भवप्रीता), भारी या महती तपस्या करने वाली (महातपा), जिस के स्वरूप का कहीं अंत न हो (अनंता), सब को उत्पन्न करने वाली (भाविनी), भावना एवं ध्यान करने वाली (भाव्या), जिससे बढ़कर भव्य कोई और नहीं हो (अभव्या), रेशमी वस्त्र पहनने वाली (पट्टाम्बरपरिधाना), असीम पराक्रम वाली (अमेय विक्रमा) इत्यादि।

नवरात्र की बात करें तो, माँ के नौ रूपों की पूजा होती है, लेकिन मूर्ति एक ही लगती है। यह एक मूर्ति दिखाती है कि नौ रूप नहीं हैं, एक ही रूप है। जैसे एक व्यक्ति कभी पिता, कभी भाई, कभी मित्र तो कभी पुत्र हो सकता है, वैसे ही माता का रूप एक ही है जो अलग-अलग समय में अलग-अलग साधना की अधिष्ठात्री बन जाती हैं। तभी तो कहा गया है– “भेद सहित अभेद की निर्मात्री शक्ति ही दुर्गा है।”

रात्रि अज्ञानता की प्रतीक है और उसमें जागरण अर्थात् साधना से अपने अंदर जाग्रति लानी होती  है। इस जागरण हेतु, कालुष्य के नाश हेतु, एक दीपक चाहिए। अंतस-चेतना ही वह दीपक है। उपवास का अर्थ ‘समीप वास’ या ‘अपनी चेतना के पास रहना’ है। ‘व्रत’ का अर्थ संकल्प है, जो चेतना की  सिद्धि के लिए है, तभी तो वह व्रत है। तो आइए, इन नौ दिनों में हम माता के नौ रूपों के  भाषाई और प्रतीकात्मक अर्थ को  समझने की कोशिश करते हैं!

शैलपुत्री  : माँ का प्रथम रूप 

आदि शक्ति के नौ रूपों में प्रथम रूप ‘शैलपुत्री’ का है, जिसे ‘पार्वती’ भी कहा जाता है। ‘शैल’ शब्द ‘शिला’ से बना है और शिला का अर्थ प्रस्तर या पर्वत लिया जा सकता है। इस प्रकार ‘शैल-पुत्री’ का अर्थ है– ‘शिला की है जो पुत्री’ या ‘पार्वती’ अर्थात् पर्वत की पुत्री भी कहा जाता है। माता के इसी रूप को अगर धार्मिक अथवा पौराणिक संदर्भों में देखें, तो पार्वती ‘गिरिराज हिमालय’ की पुत्री हैं (अर्थात् पर्वत की पुत्री हैं), जो उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुई थीं। अस्तु, जो शिवत्व के लिए तप करे या स्वयं को तपाए, साधना करे, वही पार्वती; जो परिवर्तन करा दे, वह पार्वती।

योग-साधना की दृष्टि से एक साधक मूलाधार चक्र (गुदा) में अपनी चेतना को संकेंद्रित करता है, यही योग-साधना का आरंभिक स्थल है, परिवर्तन की शुरुआत है। भौतिक-सृष्टि चक्र इसी के इर्द-गिर्द घूमता है। 

हम जानते हैं कि मानव शरीर साधना के निमित्त है। रघुवंशम् में कालिदास लिखते हैं–“शरीरं माध्यम् खलु धर्म साधनम” अर्थात् जितने भी धर्म हैं, उनमें देह की शुचिता आद्य धर्म है। इसी को मानस में  तुलसीदास कहते हैं– 
“देह धरे कर यह फलु भाई, भजिअ राम सब काम बिहाई।” 

अर्थात् मनुष्य देह प्राप्ति ऐसा अवसर है जिसमें इस जीवात्मा ने राम-भक्ति (ईश्वर भक्ति) का सुफल प्राप्त कर लिया है।  इस रूप के प्रतीक के रूप में माँ के दाहिने हाथ में त्रिशूल है। त्रिशूल का अर्थ है : तीन शूल (काँटे) जो सत्, रजस् और तमस् की त्रिगुणात्मिका प्रवृत्ति को प्रदर्शित करता हैे। बाएँ हाथ में कमल है, जो चेतना के जाग्रत अवस्था का परिचायक है और संस्कृति का प्रतीक है।

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