रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का वह पवित्र पर्व है, जिसकी एक छोटी-सी रक्षासूत्र की डोर अपने भीतर प्रेम, विश्वास, कर्तव्य, समर्पण और आत्मीयता का पूरा संसार समेटे हुए है। सामान्यतः इसे भाई-बहन के प्रेम और भाई द्वारा बहन की रक्षा के संकल्प के पर्व के रूप में देखा जाता है, लेकिन भारतीय परंपरा में इसका अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक रहा है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जो सक्षम है, उसका दायित्व है कि वह जरूरतमंद, कमजोर और असहाय के साथ खड़ा हो।

जब रक्षाबंधन का इंतजार पूरे साल रहता था

आज जब त्योहारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, तब 90 के दशक का रक्षाबंधन सहज ही स्मृतियों में लौट आता है। उस दौर में रक्षाबंधन के आने का बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को बेसब्री से इंतजार रहता था। सावन शुरू होते ही बाजारों में राखियों की दुकानें सजने लगती थीं। रंग-बिरंगी राखियों से बाजारों में अलग ही रौनक दिखाई देती थी।

राखी खरीदना भी अपने आप में एक उत्सव हुआ करता था। बहनें अपने भाइयों के लिए राखी चुनती थीं और भाई भी बहनों के लिए उपहार लेने को उत्साहित रहते थे। दूर रहने वाले भाई-बहनों के बीच डाक से राखी भेजने की परंपरा में भी एक अलग ही आत्मीयता थी। कई बार राखी समय पर पहुंचेगी या नहीं, इसकी चिंता बनी रहती थी। यदि रक्षाबंधन का दिन निकल जाए और भाई तक बहन की राखी न पहुंच पाए, तो बहन को सचमुच दुख होता था।

उस समय राखी केवल एक धागा नहीं थी। वह प्रतीक्षा, प्रेम, विश्वास और रिश्तों की गहराई का संदेश थी। आज संचार के साधन बेहद तेज हो गए हैं। वीडियो कॉल और ऑनलाइन माध्यमों से दूरियां कुछ क्षणों में मिट जाती हैं, लेकिन उस दौर की प्रतीक्षा और आत्मीयता हमें यह याद दिलाती है कि त्योहारों की असली शक्ति सुविधाओं में नहीं, भावनाओं में होती है।

श्रावणी से रक्षाबंधन तक

प्राचीन भारत में रक्षाबंधन को श्रावणी पर्व के रूप में भी जाना जाता था। इसका संबंध स्वाध्याय, यज्ञ, ऋषि परंपरा और ज्ञान-साधना से था। समय के साथ पर्व का स्वरूप बदला और रक्षासूत्र परिवार तथा समाज के विभिन्न संबंधों को जोड़ने वाला प्रतीक बन गया।

पौराणिक परंपराओं में इंद्राणी द्वारा इंद्र को रक्षासूत्र बांधने, भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी तथा राजा बलि और देवी लक्ष्मी से जुड़ी कथाएं इस पर्व के मूल भाव—रक्षा, विश्वास और कर्तव्य—को अलग-अलग रूपों में सामने रखती हैं।

रक्षासूत्र की सबसे सुंदर विशेषता यही है कि वह अलग-अलग व्यक्तियों को एक सूत्र में जोड़ता है। जैसे अनेक मोतियों को एक धागा माला का रूप देता है, वैसे ही प्रेम, विश्वास और आत्मीयता समाज की विविधताओं को एकता में बदल सकती है।

भाई-बहन से आगे पूरे समाज तक

रक्षाबंधन का भाव केवल परिवार तक सीमित न रहकर पूरे समाज तक पहुंच सकता है। आज देश के अनेक सामाजिक और सेवा संगठन अपने-अपने स्तर पर वंचित एवं जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचकर त्योहारों को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। रक्षाबंधन भी इसके लिए एक स्वाभाविक अवसर है।

इस दिन समाज के उन लोगों के बीच जाना, जो किसी कारणवश मुख्यधारा से दूर हैं, उनके साथ बैठना, उन्हें राखी बांधना और उनके साथ त्योहार की खुशियां साझा करना इस पर्व के मूल भाव को व्यापक बनाता है। इससे यह संदेश जाता है कि समाज में कोई भी व्यक्ति अकेला या उपेक्षित नहीं है।

यही भावना सामाजिक समरसता, प्रेम और भाईचारे को मजबूत करती है। जाति, भाषा, आर्थिक स्थिति या सामाजिक भेद से ऊपर उठकर एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होना रक्षाबंधन की सांस्कृतिक भावना को आज के संदर्भ में सार्थक बनाता है।

प्राचीन संस्कृति से सीख, वर्तमान के लिए संकल्प

आज परिवार छोटे हो रहे हैं, जीवन की गति तेज है और डिजिटल माध्यमों ने रिश्तों के संवाद का स्वरूप बदल दिया है। ऐसे समय में हमें अपनी प्राचीन संस्कृति के मूल भाव को नए संदर्भ में आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

रक्षाबंधन को केवल राखी बांधने और उपहार देने तक सीमित न रखकर इसे सामाजिक जिम्मेदारी का पर्व बनाया जा सकता है। बच्चों को राखी के साथ सम्मान, संवेदना, जिम्मेदारी और सहयोग का अर्थ समझाया जाए। बहनों और बेटियों की गरिमा के साथ समाज की प्रत्येक महिला के सम्मान को अपना दायित्व माना जाए। वृद्धों, जरूरतमंदों, दिव्यांगजनों और वंचित परिवारों के साथ त्योहार की खुशियां साझा की जाएं।

देश के सामाजिक संगठन, सेवा संस्थाएं और सामान्य नागरिक मिलकर इस पर्व को सामाजिक एकता का माध्यम बना सकते हैं। इससे हमारी प्राचीन परंपरा केवल स्मृति बनकर नहीं रहेगी, बल्कि वर्तमान समाज के जीवन में सक्रिय संस्कार के रूप में दिखाई देगी।

परंपरा का अर्थ अतीत में लौट जाना नहीं, बल्कि अतीत के श्रेष्ठ संस्कारों को वर्तमान की आवश्यकताओं से जोड़कर भविष्य तक पहुंचाना है।

इस रक्षाबंधन पर संकल्प हो कि राखी की डोर केवल कलाई पर न बंधे, बल्कि हृदय से हृदय, परिवार से समाज और व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़ने वाला विश्वास का सूत्र बने।

90 के दशक की वह प्रतीक्षा, बाजारों की वह रौनक, बहन की भेजी राखी के पहुंचने की चिंता और भाई की कलाई पर राखी बांधने की वह खुशी—इन स्मृतियों को आधुनिक जीवन की संवेदनशीलता से जोड़ते हुए रक्षाबंधन को फिर से पवित्र प्रेम, सामाजिक समरसता और भाईचारे का जीवंत पर्व बनाना ही हमारी संस्कृति के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी।

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