समाज और देश का सबसे महत्वपूर्ण भविष्य हमारे बच्चे हैं। आज के बच्चे ही कल देश को आगे ले जाने वाले महत्वपूर्ण स्तंभ होंगे। इसलिए उनके भविष्य को लेकर किसी भी तरह की राजनीति अथवा वैचारिक षड्यंत्र के बहुत खराब परिणाम हो सकते हैं। सोशल मीडिया पर इन दिनों इस तरह की खबरों की भरमार दिखाई दे रही है। इन दिनों सनसनी खबर के रूप में यह प्रचारित किया जा रहा है कि देश के क ई राज्यों में, स्कूलों के बच्चे अपनी स्कूल की व्यवस्थाओं को लेकर नाराज हैं और सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उतर रहे हैं।

किसी भी विषय पर असंतुष्टि जताने का भी एक तरीका होता है। यदि बच्चों को स्कूल में किसी तरह की समस्या है तो उनके अभिभावक उस समस्या से जिला प्रशासन और सरकार को अवगत करा सकते हैं और उसके समाधान का प्रयास कर सकते हैं। यह आवश्यक है कि स्कूलों में बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाओं के साथ आधुनिक और आदर्श शैक्षणिक संरचना उपलब्ध हो। लेकिन यदि बच्चे स्वयं ऐसी शिकायतों को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन करने लगें तो इससे उनकी पढ़ाई-लिखाई प्रभावित होनी तय है। सही और गलत तरीके के बीच का अंतर बच्चों को समझाना आवश्यक है।

बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। उन्हें जिस रूप में ढाला जाए, वे उसी रूप में आकार ग्रहण करते हैं। इसलिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि उनके व्यक्तित्व और सोच में समय से पहले कहीं कोई विकृति न आ जाए। समाज में जब कोई घटना या विषय बहुतायत में दिखाई देने लगे तो उसकी छिपी हुई कहानी को पढ़ने की दृष्टि भी हमें विकसित करनी होगी। हमें न केवल स्वयं, बल्कि अपने बच्चों को भी समझाना होगा कि नकारात्मकता को बढ़ावा देकर देश के भविष्य को अंधकार में धकेलने की कोशिशों को पहचानना जरूरी है। देश में अस्थिरता पैदा करने के कुप्रयासों को भी समझना होगा। बच्चों को भ्रमित करने वालों को शिक्षा विरोधी कहना सही होगा 

   एक ओर ये शिक्षा विरोधी तत्व देश के भविष्य यानी बच्चों के बालमन को भी भ्रमित करने से नहीं चूक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समाज में कई स्कूल ऐसे भी हैं जो भारतीय संस्कृति और परंपराओं के माध्यम से बच्चों को संस्कारित करने में जुटे हुए हैं। इसका एक सुंदर उदाहरण मुझे देखने को मिला, जिसने मेरे मन को छू लिया।

रायपुर स्थित राजकुमार कॉलेज अपनी ऐतिहासिक धरोहर के लिए पहचाना जाता है। करीब 150 वर्ष पुराने इस विद्यालय में हर वर्ष महाकवि गोस्वामी तुलसीदास, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और मुंशी प्रेमचंद की जयंती को एक साथ ‘तिलक-तुलसी’ नाम से मनाया जाता है। ‘तिलक-तुलसी’ नाम सुनते ही भारतीयता की मिठास कानों में घुलने लगती है। इस अवसर पर स्कूली बच्चे भारतीय परिधान पहनकर तुलसीदास, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और मुंशी प्रेमचंद के कृतित्व और व्यक्तित्व को भजन, कहानी और नाटक के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।

कहा जाता है कि इस स्कूल में देश के संपन्न परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं। ऐसी जगह पर भी यदि बच्चों को संस्कारित करने के लिए इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं तो निश्चित रूप से सभी अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन को बच्चों को संस्कारी, संवेदनशील और राष्ट्रहित के प्रति जागरूक बनाने की दिशा में चिंतन-मंथन और निरंतर प्रयास करना चाहिए।

आज बच्चों ने मोबाइल को शिक्षा और मनोरंजन का प्रमुख माध्यम मान लिया है। मोबाइल की बढ़ती लत पर रोक लगाने में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। मोबाइल के काल्पनिक संसार में बच्चों के दिग्भ्रमित होने की आशंका से जुड़ी खबरें भी लगातार सामने आती रहती हैं। ऐसी स्थिति में परिवार ही बच्चों को विवेकशील बनाकर सही और गलत के बीच का फर्क समझा सकता है। परिवार बच्चों को यह भी बता सकता है कि किसी भी राष्ट्र को विकसित और मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय भावना का होना जरूरी है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र में अपनी बात रखना गलत नहीं है, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके और अराजकता के बीच के अंतर को समझना भी उतना ही जरूरी है। हमें अपने बच्चों को यह बताना होगा कि भारत को किसी दूसरे देश के हालात से जोड़कर देखने या देश में अस्थिरता पैदा करने वाली किसी भी साजिश का हिस्सा बनना हमारे भविष्य के लिए घातक हो सकता है।

हम उन भारतीय पूर्वजों की संतान हैं, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया और स्वतंत्रता के लिए अहिंसा तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का मार्ग अपनाया। इसलिए अपनी बात रखने के अधिकार के साथ जिम्मेदारी और अनुशासन की समझ भी जरूरी है।

जब हमारे देश में बाल श्रम जैसे गंभीर मामलों के खिलाफ भी कड़े कानूनी प्रावधान हैं, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बच्चों को आंदोलन या प्रदर्शन के लिए प्रेरित अथवा इस्तेमाल करने वाले तत्वों की पहचान करने और उन पर आवश्यक कार्रवाई करने की जिम्मेदारी किसकी है। जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन को भी ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए यह देखना चाहिए कि कहीं बच्चों के मासूम मन और उनके भविष्य का इस्तेमाल किसी राजनीतिक, वैचारिक अथवा अराजक उद्देश्य के लिए तो नहीं किया जा रहा।

बच्चे देश का भविष्य हैं। उन्हें सड़क का संघर्षकर्ता नहीं, बल्कि देश के निर्माण का सशक्त भागीदार बनाना होगा। कच्ची मिट्टी को सही आकार देने की जिम्मेदारी परिवार, विद्यालय और पूरे समाज की है। यदि हम आज बच्चों को संस्कार, विवेक, अनुशासन, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रहित की समझ दे पाए, तो यही बच्चे कल भारत को सही दिशा में आगे ले जाने वाली सबसे मजबूत शक्ति बनेंगे।

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