17 सितंबर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन है। भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी की यात्रा को केवल एक राजनीतिक नेता की सफलता की कहानी के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व और सार्वजनिक जीवन को सीमित कर देना होगा। यह यात्रा स्वतंत्र भारत में जन्मे एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा है, जिसने वडनगर के एक सामान्य परिवार से निकलकर संगठन, राजनीति, राज्य प्रशासन और अंततः राष्ट्रीय शासन के सर्वोच्च पद तक का लंबा सफर तय किया। 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जीवनी के अनुसार एक साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से आए और बचपन में परिवार की चाय की दुकान पर भी काम किया। वे स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं।

संघ की शाखा से संगठन और राष्ट्रबोध


इस यात्रा को यदि कुछ शब्दों में समझना हो तो कहा जा सकता है,चाय की दुकान से सामाजिक संपर्क, संघ की शाखा से संगठन और राष्ट्रबोध, प्रचारक जीवन से अनुशासन और समर्पण, भाजपा के संगठनात्मक दायित्व से राजनीतिक प्रबंधन, गुजरात के मुख्यमंत्री पद से शासन का अनुभव और प्रधानमंत्री पद से भारत को वैश्विक मंच पर एक अधिक सक्रिय भूमिका देने का प्रयास। भारत का नागरिक समाज इस यात्रा को संघर्ष, सेवा, संगठन और राष्ट्रनिर्माण के अलग-अलग अनुभवों के संदर्भ में देखता है। 2014 के बाद भारतीय राजनीति के विमर्श, नीति-निर्माण और राजनीतिक संचार में नरेंद्र मोदी एक केंद्रीय व्यक्तित्व बने हैं। मोदी के व्यक्तित्व को समझने में उनका प्रारंभिक जीवन महत्वपूर्ण है। एक छोटे शहर में पले-बढ़े व्यक्ति का सार्वजनिक जीवन में आना और धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष तक पहुँचना भारतीय लोकतंत्र की सामाजिक गतिशीलता को दर्शाता है। प्रधानमंत्री कार्यालय की जीवनी में उनके प्रारंभिक जीवन, परिवार की सीमित आर्थिक परिस्थितियों और चाय की दुकान पर काम करने का उल्लेख मिलता है। इसी जीवन-अनुभव को मोदी की राजनीतिक भाषा में गरीब, वंचित और सामान्य नागरिक के साथ जुड़ाव के संदर्भ में बार-बार प्रस्तुत किया गया है।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका जुड़ाव उनके राजनीतिक व्यक्तित्व का दूसरा महत्वपूर्ण चरण था। संघ के संगठनात्मक जीवन ने उन्हें अनुशासन, कार्यकर्ता-आधारित संगठन, सामाजिक संपर्क और राष्ट्र की अवधारणा से जोड़ा। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी में संगठनात्मक जिम्मेदारियों ने उन्हें चुनावी राजनीति और संगठन संचालन का अनुभव दिया। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में लगभग 13 वर्षों का कार्यकाल उनके लिए शासन की प्रयोगशाला रहा। इसके बाद 2014 में वे भारत के प्रधानमंत्री बने और 2019 तथा 2024 में लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। 9 जून 2024 को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेना स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण चुनावी उपलब्धि है।

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सत्ता चलाना नहीं थी; चुनौती थी भारत जैसे विशाल और विविध देश में विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना। इस दृष्टि से मोदी सरकार के सबसे अधिक दिखाई देने वाले क्षेत्रों में गरीब कल्याण और वित्तीय समावेशन शामिल हैं। प्रधानमंत्री जन-धन योजना इसका प्रमुख उदाहरण है। 28 अगस्त 2014 को शुरू हुई इस योजना के 12 वर्ष पूरे होने पर अगस्त 2026 में सरकार ने बताया कि 59.09 करोड़ जन-धन खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें कुल जमा 3.17 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। इन खातों में 56 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं और 78 प्रतिशत खाते ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं। 41 करोड़ से अधिक RuPay कार्ड भी जारी किए गए हैं।

जनकल्याणकारी योजनाएं - यहाँ मोदी सरकार के शासन मॉडल का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है,कल्याणकारी योजनाओं को बैंकिंग, आधार और मोबाइल तकनीक से जोड़ना। जन Dhan-Aadhaar-Mobile व्यवस्था ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को बड़े पैमाने पर लागू करने का आधार बनाया। सरकार के अनुसार जन-धन खातों का उपयोग विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभ सीधे नागरिकों तक पहुँचाने में किया जा रहा है। गरीबों के लिए आवास मोदी सरकार के प्रमुख कार्यक्रमों में रहा। प्रधानमंत्री आवास योजना के ग्रामीण और शहरी दोनों हिस्सों के माध्यम से करोड़ों घरों का निर्माण हुआ। जनवरी 2026 में सरकार द्वारा जारी जानकारी के अनुसार पिछले 11 वर्षों में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत 3.70 करोड़ घर पूरे किए जा चुके थे। 2025 के सरकारी आँकड़ों में लगभग चार करोड़ ग्रामीण-शहरी घरों के निर्माण और प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी के अंतर्गत 92.35 लाख घर लाभार्थियों को दिए जाने की जानकारी दी गई थी। किसी गरीब परिवार के लिए घर केवल चार दीवारें नहीं है। वह संपत्ति, सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और भविष्य की स्थिरता का आधार भी है। इसी प्रकार प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने गरीब परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने की कोशिश की। जून 2025 के सरकारी आँकड़ों के अनुसार उज्ज्वला योजना के अंतर्गत 10.33 करोड़ से अधिक LPG कनेक्शन उपलब्ध कराए जा चुके थे।

सामाजिक अभियानों को नया आयाम


स्वच्छ भारत मिशन ने भी मोदी सरकार के सामाजिक अभियानों को नया आयाम दिया। सरकार के अनुसार लगभग 12 करोड़ घरेलू शौचालयों का निर्माण हुआ और लाखों गांवों को ODF Plus घोषित किया गया। इसी क्रम में जल जीवन मिशन के अंतर्गत ग्रामीण घरों में नल के पानी की पहुँच बढ़ाने का प्रयास हुआ। जून 2025 तक सरकार ने 15.59 करोड़ ग्रामीण घरों में नल के पानी के कनेक्शन की जानकारी दी थी। बिजली के क्षेत्र में भी व्यापक विस्तार हुआ। सरकार के अनुसार मार्च 2019 तक सौभाग्य योजना के तहत देशभर में इच्छुक घरों का विद्युतीकरण पूरा किया गया और 2025 तक दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के अंतर्गत गांवों का विद्युतीकरण पूरा होने की जानकारी दी गई। स्वास्थ्य क्षेत्र में आयुष्मान भारत ने गरीब और कमजोर परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा का बड़ा ढाँचा तैयार किया। अगस्त 2026 तक 45.51 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी होने और 1.86 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के कार्यरत होने की सरकारी जानकारी है। इसी प्रकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत 81 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था जारी है। इन आँकड़ों को केवल सरकारी उपलब्धियों की सूची मानना पर्याप्त नहीं होगा। इनके पीछे शासन की एक ऐसी अवधारणा दिखाई देती है जिसमें गरीब नागरिक को केवल सहायता का पात्र नहीं, बल्कि विकास की प्रक्रिया में शामिल नागरिक के रूप में देखने का प्रयास किया गया है।

जन-धन खाते से वित्तीय पहचान, आवास से सामाजिक सुरक्षा, उज्ज्वला से स्वच्छ ईंधन, जल जीवन मिशन से पानी, स्वच्छ भारत से स्वच्छता, आयुष्मान भारत से स्वास्थ्य सुरक्षा और डिजिटल भुगतान से आर्थिक भागीदारी—इन सबको एक साथ देखें तो मोदी सरकार की कल्याणकारी नीति का एक व्यापक ढाँचा सामने आता है। इसी के साथ भारत के बुनियादी ढाँचे में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। दिसंबर 2025 के सड़क परिवहन मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 2014 के 91,287 किलोमीटर से बढ़कर 1,46,560 किलोमीटर हो गई थी। चार लेन और उससे अधिक वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 18,371 किलोमीटर से बढ़कर 43,512 किलोमीटर हुई। नियंत्रित प्रवेश वाले हाई-स्पीड कॉरिडोर और एक्सप्रेसवे की लंबाई 2014 के 93 किलोमीटर से बढ़कर 3,052 किलोमीटर बताई गई।

केवल योजनाओं की कहानी नहीं

यानी मोदी युग की कहानी केवल योजनाओं की कहानी नहीं है; सड़क, रेल, एक्सप्रेसवे, मेट्रो, हवाई संपर्क, डिजिटल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक अवसंरचना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सरकार ने PM GatiShakti और UDAN जैसी पहलों के माध्यम से परिवहन और आर्थिक गतिविधियों को जोड़ने पर जोर दिया है। मोदी सरकार की राजनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन है। UPI और डिजिटल भुगतान ने भारत में दैनिक आर्थिक व्यवहार का स्वरूप बदला है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को भारत की एक ऐसी नीति के रूप में देखा जा रहा है जिसे कई विकासशील देश भी अध्ययन कर रहे हैं। भारत में बैंक खाते और मोबाइल आधारित भुगतान के विस्तार ने गरीब और छोटे कारोबारियों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने में भूमिका निभाई है। इसी क्रम में मुद्रा योजना, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया, पीएम स्वनिधि और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं ने उद्यमिता और विनिर्माण को नीति के केंद्र में लाने का प्रयास किया। रेहड़ी-पटरी वालों के लिए पीएम स्वनिधि योजना के अंतर्गत जून 2025 तक 68 लाख ऋण दिए जाने और 76.28 लाख विक्रेताओं के औपचारिकरण की सरकारी जानकारी दी गई थी।

मोदी शासन की आर्थिक दृष्टि का एक और महत्वपूर्ण शब्द है—आत्मनिर्भर भारत। इसका अर्थ पूरी तरह आत्मनिर्भर होकर वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग होना नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन, तकनीकी क्षमता, रक्षा उत्पादन, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयों और रणनीतिक क्षेत्रों में भारत की क्षमता बढ़ाना बताया गया है। ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ तक का विमर्श इसी परिवर्तन का हिस्सा है।

‘विकसित भारत@2047


आज ‘विकसित भारत@2047’ इसी दीर्घकालीन आर्थिक दृष्टि का अगला चरण है। इसका लक्ष्य केवल बड़ी अर्थव्यवस्था बनना नहीं, बल्कि विकसित भारत के लिए बुनियादी ढाँचा, मानव पूंजी, तकनीकी क्षमता, रोजगार और जीवन-स्तर को ऊपर उठाना है। भारत के तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को इसी व्यापक आर्थिक परिवर्तन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि आर्थिक विकास का वास्तविक मूल्यांकन GDP के साथ प्रति व्यक्ति आय, रोजगार, उत्पादकता, गरीबी, असमानता और मानव विकास जैसे संकेतकों से करना आवश्यक रहेगा। मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व की तीसरी प्रमुख विशेषता है,राष्ट्रीयता  और संस्कृति का सार्वजनिक विमर्श। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति में आधुनिकता और विकास की चर्चा के साथ भारतीय सभ्यता, संस्कृति और परंपरा के प्रश्न भी मौजूद रहे, लेकिन मोदी काल में भारत-बोध, सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में अधिक स्पष्ट स्थान मिला। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

प्रधानमंत्री मोदी के प्रस्ताव के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया और प्रस्ताव को 177 देशों का समर्थन मिला। यह भारत की सांस्कृतिक परंपरा को वैश्विक सार्वजनिक कूटनीति के साथ जोड़ने का उदाहरण बना। काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, तीर्थस्थलों का विकास, विरासत स्थलों का पुनरुद्धार और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की योजनाएँ इसी सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय राजनीति के कई दशकों पुराने विवाद के बाद संभव हुआ और जनवरी 2024 में प्राण-प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या धार्मिक तथा सांस्कृतिक पर्यटन के एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित होने लगी। भारत का नागरिक समाज इन परिवर्तनों को भारतीय सभ्यता, सांस्कृतिक पहचान और आधुनिक विकास के बीच नए संबंध के रूप में देख रहा है। संस्कृति और विकास को एक-दूसरे से अलग मानने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलने की राजनीतिक कोशिश मोदी युग की विशिष्ट विशेषताओं में दिखाई देती है।

राष्ट्रीय सुरक्षा


राष्ट्रीय सुरक्षा भी मोदी शासन की पहचान का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 की बालाकोट कार्रवाई और 2025 में ऑपरेशन सिंदूर ने आतंकवाद के विरुद्ध भारत की सैन्य प्रतिक्रिया को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का प्रमुख विषय बनाया। ऑपरेशन सिंदूर के संबंध में भारत सरकार ने इसे पहलगाम आतंकी हमले के बाद आतंकवादी ढाँचे के विरुद्ध लक्षित कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार मोदी सरकार की सुरक्षा नीति में आतंकवाद के विरुद्ध सैन्य, कूटनीतिक और तकनीकी साधनों के संयुक्त प्रयोग पर जोर दिखाई देता है। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में 2019 में अनुच्छेद 370 से संबंधित संवैधानिक परिवर्तन मोदी सरकार के महत्वपूर्ण निर्णयों में रहा। सरकार ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण और समान संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ा। इस निर्णय के प्रभाव को समझने के लिए इसके संवैधानिक, प्रशासनिक, सुरक्षा और सामाजिक परिणामों का दीर्घकालीन अध्ययन आवश्यक है।

विदेश नीति के क्षेत्र में भी मोदी युग


विदेश नीति के क्षेत्र में भी मोदी युग में भारत की सक्रियता बढ़ी है। भारत ने अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम एशिया और Global South के साथ समानांतर संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता और नई दिल्ली शिखर सम्मेलन इसका महत्वपूर्ण उदाहरण रहा। भारत ने Global South की प्राथमिकताओं को G20 के एजेंडे में स्थान देने का प्रयास किया और अफ्रीकी संघ को G20 की स्थायी सदस्यता दिलाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आज भारत की विदेश नीति में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का विचार महत्वपूर्ण है। रूस के साथ ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारी, क्वाड में भागीदारी, पश्चिम एशिया में सक्रिय कूटनीति और Global South के साथ संबंध,ये सभी मिलकर भारत की बहु-आयामी विदेश नीति को दिखाते हैं। मोदी की विदेश नीति में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन है,भारतीय प्रवासी समुदाय को कूटनीतिक संपर्क के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य देशों में भारतीय समुदाय के साथ बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों ने भारत की विदेश नीति में diaspora diplomacy को अधिक दृश्यता दी है। भारत की वैश्विक भूमिका का एक और पहलू है,भारत को केवल बाजार के रूप में नहीं, बल्कि समाधान देने वाले देश के रूप में प्रस्तुत करना। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, UPI, सौर ऊर्जा, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा राहत, वैक्सीन मैत्री और Global South के साथ विकास सहयोग इसी व्यापक दृष्टिकोण से जुड़े हैं।

नरेंद्र मोदी के प्रति समर्थन और विरोध

नरेंद्र मोदी के प्रति समर्थन और विरोध दोनों दिखाई देते हैं। इसके पीछे केवल नीतिगत मतभेद नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक विभाजन भी हैं। मोदी का नाम भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन चुका है। इसलिए कुछ राजनीतिक समूहों और वर्गों में मोदी के प्रति तीखा विरोध दिखाई देता है। कई बार यह विरोध किसी एक योजना या निर्णय तक सीमित न रहकर स्वयं ‘मोदी’ नाम के प्रति राजनीतिक असहमति का रूप ले लेता है। यहाँ भारत के नागरिक समाज की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में किसी नेता के प्रति समर्थन या विरोध स्वाभाविक है, लेकिन किसी व्यक्ति के प्रति असहमति को तथ्यों और नीतियों के मूल्यांकन से जोड़ना अधिक स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा है। मोदी के नाम से असहमति रखने वाले वर्गों में भी यह प्रश्न उठता है कि क्या विरोध किसी नीति, निर्णय या विचारधारा के कारण है या केवल व्यक्ति-केंद्रित राजनीतिक प्रतिक्रिया बन गया है। इसी प्रकार मोदी के प्रति समर्थन रखने वालों के लिए भी आवश्यक है कि वे नीतियों और परिणामों को तथ्यात्मक आधार पर देखें। भारत का नागरिक समाज किसी भी राजनीतिक नेता की अंतिम कसौटी उसके कार्यों और दीर्घकालीन परिणामों को मान सकता है। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है। व्यक्तिपूजा और व्यक्तिविरोध दोनों के स्थान पर नीतियों, उपलब्धियों, कमियों और परिणामों पर चर्चा लोकतांत्रिक विमर्श को अधिक सार्थक बनाती है।


नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति की भाषा को भी बदला है। ‘सबका साथ, सबका विकास’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘विकसित भारत@2047’, ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ और ‘भारत प्रथम’ जैसे सूत्र राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श में बार-बार दिखाई देते हैं। इनके पीछे अलग-अलग नीतियाँ और कार्यक्रम हैं, लेकिन उनका व्यापक उद्देश्य विकास, राष्ट्रीय पहचान और वैश्विक भूमिका को एक साथ जोड़ना है। गरीब के बैंक खाते से लेकर डिजिटल भुगतान तक, कच्चे घर से पक्के घर तक, चूल्हे से LPG तक, खुले में शौच से शौचालय तक, बिना नल के पानी से हर घर जल तक, स्थानीय सड़क से एक्सप्रेसवे तक और घरेलू राजनीति से वैश्विक कूटनीति तक—मोदी युग को इन बदलावों के व्यापक संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। सरकार के 2026 के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार 59 करोड़ से अधिक जन-धन खाते, 3.70 करोड़ से अधिक ग्रामीण आवास, 15 करोड़ से अधिक ग्रामीण नल कनेक्शन, 45 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड और 81 करोड़ से अधिक लोगों के लिए खाद्यान्न सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएँ आज भारतीय शासन के पैमाने को दर्शाती हैं।


फिर प्रश्न आता है,नरेंद्र मोदी के प्रति इतना समर्थन और इतना विरोध दोनों क्यों दिखाई देते हैं? इसका उत्तर केवल व्यक्ति में नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में आए व्यापक परिवर्तन में है। मोदी ने विकास, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान, कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत नेतृत्व को एक ही राजनीतिक विमर्श में जोड़ा। जिन लोगों को यह मॉडल भारत की नई राजनीतिक आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करता दिखाई देता है, वे इसे परिवर्तन के रूप में देखते हैं। इसी कारण मोदी के राजनीतिक प्रभाव को केवल चुनावी राजनीति तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता शायद यही है कि उन्होंने स्वयं को केवल प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक आख्यान के केंद्र में रखा जिसमें गरीब कल्याण, राष्ट्रवाद, विकास, संस्कृति और वैश्विक भारत को एक साथ जोड़ने का प्रयास है। उनकी राजनीति में ‘भारत’ केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सभ्यता के रूप में भी प्रस्तुत होता है। यही कारण है कि ‘भारत-बोध’ उनके सार्वजनिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।


वडनगर का वह बालक, जिसने परिवार की चाय की दुकान पर काम किया; संघ का वह स्वयंसेवक, जिसने संगठनात्मक जीवन सीखा; प्रचारक, जिसने देश के विभिन्न हिस्सों में काम किया; भाजपा का संगठनकर्ता, जिसने चुनावी राजनीति को करीब से समझा; गुजरात का मुख्यमंत्री, जिसने प्रशासन का अनुभव प्राप्त किया; और फिर प्रधानमंत्री, जिसने भारत की राजनीति को विकास, राष्ट्रवाद, संस्कृति और वैश्विक कूटनीति के नए संयोजन के साथ प्रस्तुत किया—यह पूरी यात्रा भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक विस्तार की कहानी भी है। आज उनके जन्मदिन पर नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करना या आलोचना करना राजनीतिक दृष्टिकोण का विषय हो सकता है, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा का महत्व इससे कहीं बड़ा है। उन्होंने भारतीय राजनीति में ऐसे प्रश्नों को केंद्रीय बनाया है जो आने वाले वर्षों तक चर्चा में रहेंगे,भारत का विकास किस मॉडल से होगा, राष्ट्रवाद की भूमिका क्या होगी, संस्कृति और आधुनिकता का संबंध कैसा होगा, कल्याणकारी राज्य तकनीक के माध्यम से कितनी दूर तक पहुँच सकता है, और विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका कितनी व्यापक होगी।


मोदी की यात्रा इसलिए केवल एक व्यक्ति की यात्रा नहीं है। यह उस भारत की यात्रा का भी हिस्सा है जो अपनी गरीबी से बाहर निकलना चाहता है, अपनी अर्थव्यवस्था को बड़ा बनाना चाहता है, अपनी सांस्कृतिक स्मृति को पुनः सार्वजनिक जीवन में स्थापित करना चाहता है और विश्व व्यवस्था में अपने लिए अधिक प्रभावशाली स्थान चाहता है। चाय की टपरी से शुरू हुई यह यात्रा आज ‘विकसित भारत@2047’ के संकल्प तक पहुँच चुकी है। इतिहास अंततः किसी भी नेता का मूल्यांकन नारों से नहीं, बल्कि उसके कार्यों के दीर्घकालीन परिणामों से करता है। नरेंद्र मोदी के लिए भी अंतिम कसौटी यही होगी कि उनके नेतृत्व में रखी गई नीतियों और योजनाओं ने भारत की अर्थव्यवस्था, समाज, संस्थाओं, संस्कृति और विश्व में भारत की भूमिका को आने वाली पीढ़ियों के लिए किस सीमा तक बदला।

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