हर कोई जीवन में सफलता चाहता है। फल तो हर कर्म का होता ही है। मन के अनुरूप हो तो सफल कह देते हैं। जीवन का सार्थक होना अधिक आवश्यक है। जो पाना चाहते हैं उसे अर्थ कहा जाता है। विद्या चाहनेवाला विद्यार्थी, धन की इच्छा रखनेवाला धनार्थी, मोक्ष हेतु हो तो मोक्षार्थी, ऐसे कुछ ना कुछ जीवन का अर्थ – लक्ष्य होने से उसे प्राप्त करने में ही सार्थकता है। फल अर्थात् लाभ की केवल आकांक्षा हो तो सफलता और जीवनध्येय की पूर्ति में सार्थकता होती है। इससे भी आगे जब अपने जीवन में व्यक्तिगत हेतुओं से परे जब सामूहिक हित के लिए संकल्पबद्ध होकर समर्पित होते हैं तब जो प्राप्त होता है उसे सिद्धि कहते हैं। संकल्प की पूर्ति हेतु की जानेवाली निष्काम साधना की परिणति का नाम सिद्धि है। स्वार्थी संकल्प कभी सिद्ध नहीं हो सकता। पाने का नहीं देने का संकल्प हो तब सिद्धि प्राप्त होती है। उदात्त ध्येय हेतु कार्य करने के लिए विशेष क्षमताओं को सिद्धियाँ कहा जाता है।

उदात्त ध्येय सामाजिक, राष्ट्रीय, धार्मिक वा आध्यात्मिक हो सकता है। आध्यात्मिक परंपराओं में सिद्धियों को अधिक महत्व नहीं दिया जाता उनका स्वार्थ हेतु प्रयोग अथवा प्रदर्शन पूर्णतः वर्जित होता है। धार्मिक क्षेत्र में पुराणों में भी सिद्धियों का प्रयोग स्वयं के लिए नहीं हो सकता। हर सूक्त अथवा स्तोत्र की फलश्रुति में इसका स्पष्ट उल्लेख होता है। अथर्वशीर्ष में आता है – यो यदि मोहात् दास्यति स पापियान् भवति। वैसे भी हम पाते हैं कि असुरों को वरदान तो मिल सकता है किंतु सिद्धि केवल भक्तों को ही प्राप्त होती है। नवमी की देवता सिद्धिदात्री हैं।

नौ दिन तक साधना करनेवाले भक्तों को प्रसाद रूप में सिद्धि प्रदान करती है इसलिए देवी का नाम सिद्धिदात्री है। अणिमा-महिमा, गरिमा-लघिमा, प्राप्ति-प्राकाम्य, ईशित्वं-वशित्वं ऐसी अष्टसिद्धियों का वर्णन इतिहास ग्रंथों व पुराणों में मिलता है। शरीर के आकार व भार की सीमाओं से परे जाने की क्षमता प्रथम चार सिद्धियों से आती है। आगामी चार सिद्धियाँ मन की क्षमता से संबद्ध है। इच्छा के अनुसार प्राप्ति और विचरण तथा स्वयं के की इंद्रियों तथा औरों पर नियंत्रण इन से प्राप्त होता है।

नवरात्र में हम वैचारिक क्षेत्र का स्वाध्याय कर रहे हैं, उस संदर्भ में सिद्धिदात्री से किन सिद्धियों की अपेक्षा करनी उस पर मंथन करते हैं। राष्ट्र की उन्नति के माध्यम से विश्व का कल्याण करने हेतु भावात्मक (Positive) विषय हिंदुत्व की प्रासंगिक प्रस्तुति, भारत की राष्ट्रीयता का मर्म और स्वबोध पर आधारित तंत्र के विकास के बारे में समाज में उचित वातावरण की निर्मिती हमारा संकल्प है। इसी हेतु मानवघाती विघटनकारी बलों की विचारधारा, विभेद और गतिविधियों का यथार्थ परिचय तथा उनके प्रभाव वाले देशों की पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति का अनावरण भी आवश्यक है। इन दोनों संकल्पों की सिद्धि की प्रार्थना माता सिद्धिदात्री से करने से पूर्व आवश्यक साधना करना अनिवार्य है। साधना से न केवल सिद्धियों को पाने की पात्रता मिलती है अपितु प्राप्त सिद्धियों को समुचित ग्रहण कर उनके सटीक उपयोग की क्षमता भी प्राप्त होती है।

स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि आध्यात्मिक साधना किसी रासायनिक प्रक्रिया के समान होती है। पूर्ण शुद्ध उपकरणों में उचित मात्रा में रसायन मिश्रित किए जाए तो हर बार अपेक्षित परिणाम ही मिलते हैं। उसी प्रकार यदि साधक चित्त शुद्धि के पश्चात पुरुषार्थ और कृपा हेतु समर्पण का उचित मात्रा में मिश्रण करें तो साधना की सिद्धि सुनिश्चित है। वैचारिक प्रबोधन की साधना में भी यही नियम लागू पड़ता है। परिणाम की इच्छा और आग्रह से शीघ्रता करना उपयोगी नहीं होता। प्रक्रिया पर ध्यान देने से परिणाम अवश्य प्राप्त होता है। विमर्श निर्माण की प्रक्रिया के निश्चित चरण हैं। उसमें क्रम भी महत्वपूर्ण है। स्वार्थ अथवा विभेद के उद्देश्य से मिथ्या ज्ञान पर आधारित मिथक (Narrative) को स्थापित करने में भी ऐसी ही चरणबद्ध प्रक्रिया अपनायी जाती है।

अध्ययन (Research) – हिटलर के प्रचार मंत्री गिबल्स ने कहा था, ‘एक असत्य को सौ बार कहा जाए तो वह सत्य बन जाता है।’ किंतु पूर्णतः असत्य पर विश्वासजनक कथ्य अथवा आख्यायिकाएँ नहीं गढ़ी जाती। सत्य के ही चयनित अंश अथवा कोण को अपने उद्देश्य के अनुरूप प्रस्तुत करना मिथक निर्माण का सबसे प्रभावी मार्ग होता है। सत्य पर आधारित विमर्श में तो मौलिक तथ्य का स्थान अत्यंत पवित्र होता है। अतः प्रथम चरण अध्ययन नींव का काम करता है। शैक्षिक संस्थाओं में अध्ययन का स्तर गिरता ही गया है। अतः कई बार इसपर निर्भर नहीं रह सकते। मूल ग्रंथों तथा अभिलेखों का अध्ययन आवश्यक होता है। किसी भी विषय का गंभीर अध्ययन प्रारंभ करने से पूर्व विस्तृत पाठ्यसूची (Bibliography) बनाना उपयोगी होता है। मूल ग्रंथ, सन्दर्भ ग्रंथ, शोध ग्रंथ, शोध पत्र के साथ ही मूल अभिलेखों (Documents) की सूची बनायी जाती है। तथ्यों के एकत्रीकरण में आख्या (Reports), वार्षिक वृत्त (Annual Reports), अंकेक्षण लेखा (Audited reports) आदि का भी अध्ययन किसी-किसी विषय में आवश्यक होता है। जितनी मूल जानकारी एकत्रित करेंगे उतने सत्य को जानने और प्रस्तुत करने में अधिकृतता होगी। 

विषय चयन विवेक (Proper Selection) – मौलिक अध्ययन के आधार पर प्रबोधन हेतु विषय चयन करने होते हैं। यहाँ विवेक का प्रयोग महत्वपूर्ण होता है। व्यक्तिगत जीवन में भी निर्णय विवेक से ही लिए जाते हैं किंतु वैचारिक प्रबोधन का कार्य ही सामाजिक होने के कारण सामूहिक होता है। सामूहिक विवेक भी सातत्य की साधना से ही प्राप्त होता है। विरोधियों के मिथक को तोड़ने, स्वयं का भावात्मक विमर्श स्थापित करने और जन-सामान्य तक पहुँचाने के लिए विषयों, संदर्भों तथा तथ्यों का चयन करना होता है।

सामग्री निर्माण (Content Generation) —

तीन प्रकार की सामग्री का निर्माण वैचारिक प्रबोधन की साधना में करना होता है — शैक्षिक (Academic), वैचारिक (Intellectual) और लोकप्रिय (Popular)। शैक्षिक सामग्री में शोध ग्रंथ, शोध पत्र और अंततोगत्वा पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों का निर्माण करना होता है। यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। विश्वविद्यालय इस संघर्ष की रणभूमि है। वैचारिक सामग्री उपन्यास, बौद्धिक पुस्तकें, कविता, चित्रपट (Films), नाटक, अन्य कला अभिव्यक्ति आदि के रूप में होती है। ये सभी सूक्ष्म रूप से अत्यंत प्रभावी वैचारिक कथ्य का निर्माण करते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आनंदमठ उपन्यास और वन्दे मातरम् कविता, भारती के काव्य, नंदलाल बसु के चित्र आदि ने बड़ा योगदान किया था। पूर्व में देखे चारों विघटनकारी बलों के मिथक गढ़ने में चित्रसृष्टि (Cinema) का बड़ा योगदान रहा है। प्रेमियों को सहयोग करने वाला पादरी, शांति का प्रवचन देता नमाजी, क्रांति के स्वप्न देखता समाजवादी नायक ये सब दर्शक के मन पर दीर्घक़ालीन प्रभाव डालते हैं। लोकप्रिय सामग्री में इन सबके साथ हो व्यंग्य, हास्य साहित्य, नूतन माध्यमों में प्रचलित नाट्य, रील, मीम, स्टैन्ड अप कॉमेडी आदि का भी समावेश होता है। तथ्यों की चित्रमय प्रस्तुति (Infographics) भी प्रभावी होते हैं।

प्रसार (Dissemination) – सामग्री का लगातार प्रसारण आवश्यक होता है। इस हेतु कुछ दिनांक, स्थान का चयन कर प्रतिवर्ष पंचांग के अनुसार अपने कथानक को स्थापित करना होता है। नायकों और प्रातिनिधिक व्यक्तियों (Icon) का चयन कर स्थापित करना होता है। एक सकारात्मक उदाहरण जनजाति नायक बिरसा मुंडा की जयंती को जनजाति गौरव दिवस के रूप में प्रस्थापित करना है। यह सकारात्मक विमर्श की सफल कथा (Success Story) है। रानी कमलापति, राजा पृथु जैसे अल्पज्ञात जननायकों को पुनर्प्रचारित करना भी ऐसे ही उदाहरण हैं।

पारितंत्र (Ecosystem) – तकनीक के विकास के कारण संचार की गति (Speed), गुणवत्ता (Quality) और पहुँच (Reach) में लाक्षणिक वृद्धि हुई है। ऐसे में सभी प्रकार की सामग्री का प्रसार हो रहा है। प्रत्येक चलदूरभाष (Mobile) धारक सूचना का केवल ग्राहक ही नहीं, प्रसारक भी बन गया है। अतः कई प्रकार के सूत्रबंध (Network) तैयार करने होंगे। संवाद तंत्र में समविचारी लोगों का संगठित सूत्रबंधन करना होता है ताकि कुछ क्षणों में चयनित सामग्री को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाया जा सकें। दूसरा तंत्र अपने निकट वृत्त के बाहरी वृत्त का होता है। इसमें समाज के प्रस्थापित अभिमत निर्माता (Opinion Makers) का समावेश होता है। इससे आगे पारंपरिक माध्यमों यथा प्राध्यापक, साहित्यकार, लेखक और समाचारपत्रों और वाहिनियों के संपादक और संवाददाताओं से नियमित संपर्क और तथ्य प्रदान करने का तंत्र होता है। आजकल सामाजिक माध्यमों जैसे नूतन माध्यम भी महत्वपूर्ण और प्रभावी बन गये हैं। अतः वहाँ भी लोकप्रिय स्थापित संवादकों (Communicator) को सम्पर्क कर सामग्री प्रदान करना ताकि उनके प्रभाव क्षेत्र का प्रयोग हो सकें। साथ ही नये संवादक भी प्रशिक्षित और स्थापित करने होंगे।

इस साधना में सातत्य बड़ा महत्व का होता है। तुरंत परिणाम के प्रयास में पतली गली (Short cut) नहीं चुन सकते। मूलभूत अध्ययन से पारितंत्र निर्माण तक सभी चरण दीर्घकालीन सामूहिक प्रयास से ही संभव हैं। माता सिध्दिदात्री इस सर्व मंगलकारी राष्ट्र के हम राष्ट्रांगों को इस साधना के लिए अत्यावश्यक धैर्य, तितिक्षा और परिश्रम का सामर्थ्य और उसके परिणामस्वरूप भावात्मक संवाद की सिद्धि प्रदान करें। इस नवरात्रि का यह विचार स्वाध्याय संवेदनशील पाठकों को इस साधना की प्रेरणा प्रदान करें यही आदिशक्ति के चरणों में प्रार्थना। 

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
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