धर्म को पूजा-पद्धति, कर्मकांड या किसी विशेष धार्मिक पहचान तक सीमित करके देखने की प्रवृत्ति के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी ने उज्जैन में आयोजित ‘युवा धर्म संसद’ में धर्म के एक व्यापक और व्यावहारिक अर्थ पर बात की है। उनके संबोधन का सार तत्‍व यह रहा कि धर्म मनुष्य के दैनिक जीवन, उसके व्यवहार, जिम्मेदारी, संवेदना और दूसरों के प्रति उसके आचरण से भी जुड़ा है।

डॉ. भागवत ने धर्म और ‘रिलिजन’ के बीच वि़द्यमान अंतर की व्‍यापक चर्चा में कहा, धर्म को पश्चिमी अर्थ में एक धार्मिक व्यवस्था मान लेना उसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देता है, जबकि धर्म जीवन को बांधने के स्‍थान पर व्यक्ति को सही आचरण के माध्यम से मुक्त करने वाली अवधारणा है। उन्होंने ‘धर्म’ को ‘धृ’ से जोड़ते हुए धारणा और जीवन में उसके पालन की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि जब विभिन्न रिलिजन धर्म के अनुसार चलते हैं तो वे मनुष्य को मुक्ति की दिशा में ले जाते हैं, जबकि धर्म से अलग होने पर सांप्रदायिक संघर्ष और अत्याचार की स्थितियां पैदा होती हैं।

इस विचार की सबसे महत्वपूर्ण बात उसका व्यावहारिक पक्ष है। डॉ. भागवत ने धर्म को रोजमर्रा के छोटे-छोटे व्यवहारों से जोड़कर समझाया। उनके अनुसार भोजन करना लेकिन उसके बाद कचरा न फैलाना भी धर्म है। यातायात के नियमों का पालन करना भी धर्म है। अपनी उपासना-पद्धति का सम्मान करना और दूसरों की उपासना का भी सम्मान करना इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा है। निश्‍चित ही यह दृष्टिकोण धर्म को सिर्फ व्यक्तिगत आस्था का विषय न मानकर सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है। 

इसी संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए भागवत कहते हैं, व्यक्ति अपनी बुद्धि से कमाए, अपने जीवन को चलाए, किंतु उसकी कमाई और जीवन-व्यवहार से दूसरे को कष्ट नहीं पहुंचना चाहिए। पूर्वजों द्वारा धर्मशालाएं बनवाने और धर्मदान की परंपरा का उल्लेख कमाई के साथ समाज के प्रति दायित्व को ही रेखांकित करता है, जिसके अनेक उदाहरण भारतीय वांग्‍मय में  उपलब्‍ध हैं। 

भागवत के संबोधन का एक दूसरा पहलू स्वयं धर्म की जटिलता को स्वीकार करना था। वे धर्म के विशेषज्ञ नहीं हैं और धर्म पर बोलने के लिए अन्य विद्वानों की अधिकृत भूमिका का उल्लेख यहां उन्‍होंने किया। धर्म को लेकर एक प्रसंग के माध्यम से यह भी समझाया कि मनुष्य कभी अपने अज्ञान और कभी ‘सब कुछ जानने’ के अहंकार में फंस सकता है। धर्म को समझना किसी एक भाषण या एक पुस्तक से पूरा होने वाला विषय न होकर जीवनभर चलने वाली खोज और साधना का विषय है।

यहां से उनके संबोधन में ‘अहंकार’ एक महत्वपूर्ण विषय बनकर सामने आता है, जिसमें उनका मत है कि मनुष्य जब यह मान बैठता है कि हर चीज उसके नियंत्रण में है और दुनिया उसकी इच्छा के अनुसार ही चलेगी, तब गलतफहमी पैदा होती है। सूर्य का उदय और अस्त जैसे प्राकृतिक नियमों का उदाहरण देते हुए उन्होंने मनुष्य की सीमाओं की ओर ध्यान दिलाया।भागवत ने धर्म को सत्य पर आधारित बताते हुए प्रकृति और सृष्टि की अनेकता को स्वीकार करने की बात कही। उनके अनुसार सत्य यह है कि मनुष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इसी बोध से संवेदना का विकास होता है। ‘हम जिएंगे और सबको आगे बढ़ाएंगे’ की अवधारणा के माध्यम से उन्होंने व्यक्तिगत उन्नति के साथ सामूहिक जीवन की चिंता को जोड़ा।

यही बात उनके उस कथन में भी दिखाई देती है जिसमें उन्होंने भारत के आर्थिक और सामरिक रूप से मजबूत बनने को आवश्यक बताया, किंतु उसे अंतिम गंतव्य के बजाय एक पड़ाव के रूप में देखने की बात कही। उनके अनुसार जीवन को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर नहीं देखा गया है और आर्थिक जीवन, सामाजिक दायित्व तथा आध्यात्मिक दृष्टि के बीच परस्‍पर गहन संबंध है।

डॉ. भागवत ने विशेष रूप से इस धारणा पर सवाल उठाया कि धर्म बुढ़ापे या सेवानिवृत्ति के बाद पढ़ने-समझने की चीज है। उन्होंने कहा कि गीता और रामायण जैसे ग्रंथों को रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाले ग्रंथ मानना उचित नहीं है। धर्म उनके अनुसार अस्तित्व के आरंभ से अंत तक बना रहने वाली अवधारणा है।

अत: इस आधार पर यदि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सर संघचालक डॉ. मोहन भागवतजी के संबोधन को उसके मूल संदर्भ में देखा जाए तो उसमें धर्म की व्याख्या किसी एक कर्मकांड अथवा उपासना-पद्धति के रूप में न होकर संपूर्ण जीवन को संचालित करने वाले आचरण के रूप में प्रस्तुत की गई है। दूसरों को कष्ट न देना, प्रकृति और सामाजिक नियमों का सम्मान करना, अपनी आस्था के साथ दूसरे की आस्था का सम्मान करना, जरूरतमंदों की सहायता करना और अहंकार से बचना, वस्‍तुत: ये वे व्यवहारिक उदाहरण हैं जिनके माध्यम से उन्होंने धर्म की अवधारणा को युवाओं के सामने रखने का प्रयास किया।इस दृष्टि से उनका संदेश धर्म की परिभाषा से अधिक उसके व्यावहारिक प्रयोग पर केंद्रित दिखाई देता है। धर्म कितना पढ़ा गया, कितने कर्मकांड किए गए या उसके बारे में कितनी बातें की गईं, इससे अधिक महत्‍वपूर्ण यह है कि वह व्यक्ति के व्यवहार में कितना दिखाई देता है। डॉ. भागवत के संबोधन में धर्म की यही व्यावहारिक कसौटी प्रमुख रूप से आज अपना व्‍यापक संदेश देती हुई दिखाई देती है।

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