हमारी लोक संस्कृति के तीज-त्यौहारों में मनुष्य और प्रकृति के बीच बने हुए आत्मीय संबंधों की बेल भी गुंथी हुई है। हमारे लोक पर्वों में कहीं वृक्षों की पूजा होती है, कहीं नदियों और जलस्रोतों की, कहीं अन्न की तो कहीं पशुधन की। छत्तीसगढ़ का पोला तिहार भी इसी लोकजीवन का एक ऐसा पर्व है, जिसमें खेती, धान, बैल, किसान और लोक संस्कृति एक साथ दिखाई देते हैं। भादो मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह तिहार विशेष रूप से बैलों के सम्मान और कृषि जीवन के प्रति कृतज्ञता का पर्व है।

प्राचीन काल से बैल किसान के सबसे महत्वपूर्ण साथी रहे हैं। हल चलाने से लेकर खेत तैयार करने और अनाज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने तक बैलों का उपयोग होता रहा है। जिसके पास हल-बैल और बैलगाड़ी होती थी, उसकी किसानी समय पर सबसे पहले होती थी। जिसके पास बैल नहीं होते थे, उसे दूसरे किसान का मुंह ताकना पड़ता था। इसीलिए किसान के लिए बैल केवल पशु नहीं, बल्कि उसकी खेती और गृहस्थी के सदस्य रहे हैं।

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ याद आती है, जिसमें हीरा और मोती नाम के दो बैलों की कहानी है। खेती में जितना परिश्रम मनुष्य करता है, उतना ही परिश्रम बैल भी करते हैं। किसान और बैल अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार मिलजुल कर खेती का काम पूरा करते हैं। यही कारण है कि पोला तिहार में किसान अपने सहयोगी के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करता है। आज खेती में ट्रैक्टर और अनेक प्रकार की मशीनें आ गई हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन में पशुधन का महत्व अभी भी बना हुआ है।

इस समय धान के पौधों की बाली में दूध भरने लगता है। स्थानीय बोली में इसे धान का पोटराना कहा जाता है। धान की बालियों के भीतर दूध भरने और उसके विकसित होने की प्रक्रिया को ग्रामीण जीवन में गर्भ धारण करने के भाव से देखा गया है। इसी कारण पोला से जुड़ा हुआ एक नाम गर्भाही तिहार भी है।

किसान के लिए धान का पौधा केवल अन्न पैदा करने वाला पौधा नहीं है, वह बेटी की तरह है। जिसके भीतर नया जीवन विकसित हो रहा है। जैसे गर्भ धारण करने वाली बेटी के लिए मायके से सधौरी भेजी जाती है, उसी तरह धान के पौधों में पोटराने पर किसान उसके प्रति अपना स्नेह प्रकट करता है। इसी भाव से पोला के दिन खेत में चीला चढ़ाने की परंपरा है।

किसान घर में गेहूं अथवा चावल का चीला बनवाता है। पूजा की सामग्री लेकर खेत में जाता है और खेत के एक मेड़ पर पूजा अर्चना कर चीला अर्पित करता है। उसकी कामना यही होती है कि फसल पुष्ट हो, उसमें किसी प्रकार का रोग-दोष न लगे और खेत अनाज से भर जाए।

पोला की पूर्व रात्रि में जब गांव के अधिकांश लोग निद्रालीन होते हैं, तब गांव के गणमान्य किसान, बैगा के साथ मिलकर ग्राम देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। गांव के भीतर और बाहर, खेत-खार में स्थित देवी-देवताओं के स्थानों पर होम-धूप और नारियल चढ़ाया जाता है। कामना की जाती है कि धान की फसल अच्छी हो, उसमें बीमारी न लगे और खेतों में भरपूर पैदावार हो।

पोला का एक सुंदर पक्ष बच्चों से जुड़ा हुआ है। पोला के कुछ दिन पहले से ही गांव और कस्बों के बाजारों में मिट्टी के नांदिया बैल तथा मिट्टी से बने गृहस्थी के सामान बिकने लगते हैं। जांता, चूल्हा, हंडी, पोरा, कनौजी जैसे मिट्टी के बरतन बच्चों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। पूजा करने के लिए जोड़ा बैल बिसाए जाते हैं। इनमें बांस की खपच्चियों से चक्के लगाए जाते हैं, राखी बांधकर श्रृंगार किया जाता है। फिर होम-धूप देकर चीला चढ़ाया जाता है।

पूजा के बाद लड़के इन नांदिया बैलों को चलाते हैं और लड़कियां मिट्टी के चूल्हा, चक्की, हंडी आदि से घर-गृहस्थी का खेल खेलती हैं। बच्चों का यह खेल देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन इसके भीतर ग्रामीण जीवन की पूरी तस्वीर दिखाई देती है। लड़के खेती और पशुधन से जुड़े काम के महत्व को समझते हैं और लड़कियां घर-गृहस्थी के। इस तरह खेल-खेल में अगली पीढ़ी कृषि कार्य के लिए तैयार हो जाती है।

पोला के दिन सुबह बैलों को नहलाया जाता है। उनके सींगों को रंग से पोता जाता है। देह पर रंग-बिरंगे छल्ले बनाए जाते हैं और खुर भी रंगे जाते हैं। इसके बाद पूजा-पाठ कर उनकी आरती उतारी जाती है। नौजवान अपनी बैल जोड़ी को घुंधरू और घंटी से सजाते हैं। जिस बैल के साथ किसान पूरे वर्ष खेत में मेहनत करता है, उसी को इस दिन सजा-संवारकर सम्मान दिया जाता है। किसान उसके सामने अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। पशु और मनुष्य के बीच संबंध का इससे सुंदर लोक रूप और क्या हो सकता है।

कई गांवों में बैलों की दौड़ भी आयोजित होती है। सजे हुए बैल जब मैदान में दौड़ते हैं तो चारों ओर उत्साह दिखाई देता है। बैल दौड़ में जीतने वाली जोड़ी को पुरस्कार और सम्मान दिया जाता है। यह केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि पशुधन के प्रति ग्रामीण समाज के लगाव का भी प्रदर्शन है।पोला के दिन गांव में उत्सव का वातावरण रहता है। प्रत्येक घर में तेलई चढ़ती है और तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। घर आए हित-मित को भोजन कराया जाता है। लोग एक दूसरे के घर जाकर हाल-चाल जानते हैं। इस तरह यह तिहार केवल बैलों का नहीं रहता, बल्कि बच्चों, नौजवानों और सियानों सभी का तिहार बन जाता है।

शाम के समय गांव की युवतियां अपनी सहेलियों के साथ गांव के बाहर मैदान अथवा चौराहे पर जाती हैं। जहां साहडा देव का स्थान होता है, वहां मिट्टी के पोरा को ले जाकर पोरा पटकने की परंपरा भी दिखाई देती है। इस तरह पोला तिहार मनता है और आगामी तीजा की तैयारियां शुरु हो जाती हैं।

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