पूजनीय सुदर्शनजी से मेरा सम्बंध कई दशक पुराना रहा। संघ के कार्यक्रमों में तो उनसे परिचय होता ही रहा। कभी-कभी किसी अधिकारी के प्रवास के समय भी उनसे भेंट होती थी। लेकिन इलाहाबाद विश्वसविद्यालय में पढ़ते व शोध करते समय उनके छोटे भाई जो बनारस हिन्दू विश्वोविद्यालय में पढ़ते थे, से भेट होने पर सुदर्शनजी के बारे में ज्यादा जानकारी हुई। उनके छोटे भाई संघ के अच्छे कार्यकर्ता थे। लखनऊ व इलाहाबाद के स्वयंसेवकों के सम्मिलित कार्यक्रमों में अक्सर उनके भाई मिलते थे। तब तुझे मान्यवर भाऊराव देवरस या किसी अन्य अधिकारी ने बताया कि ये सुदर्शनजी के छोटे भाई हैं और यह परिवार संघ के साथ बहुत निष्ठा से जुड़ा है। इसके बाद उनसे मेरी घनिष्ठता होती गई।

सुदर्शनजी जब पूर्वोत्तर क्षेत्र में कार्यरत थे

सुदर्शनजी जब पूर्वोत्तर क्षेत्र में कार्यरत थे तब मैं भाजपा की ओर से वहां काम देखता था। सुदर्शनजी का उस क्षेत्र के संबंध में गहरा अध्ययन और चिंतन मुझे आकर्षित कर गया। तब इस विषय में उनके साथ पूर्वोत्तर ही नहीं, देश से जुड़े विभिन्न विषयों पर भी काफी विचार विनिमय होता था। खासतौर पर प्राचीन विज्ञान और स्वदेशी को लेकर विशद् चर्चा होती थी। उसमें से आगे के लिए कई कार्यक्रम तैयार हुए। जैसे घुसपैठियों के प्रश्न् पर आगे चलकर जो व्यापक आंदोलन हुआ, सुदर्शनजी ने उसी समय उसकी भावभूमि तैयार कर ली थी। सुदर्शनजी घुसपैठियों की समस्या की व्यापकता से बड़े चिंतित रहते थे। वे मानते थे कि यह बहुत ही असुरक्षित सीमा से जनसंख्या के माध्यम से होने वाला एक आक्रमण है। घुसपैठियों की समस्या को उन्होंने हमेशा आक्रमण के रूप में देखा और उसका विशद विवेचन किया कि यह समस्या कब और कैसे शुरू हुई इसका संदेश लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या योजना तैयार करनी चाहिए। अस्सी के दशक में इसका बड़ा विकराल रूप सामने आया और इसके विरुद्ध वहां एक प्रभावी जनांदोलन खड़ा हुआ। इस संबंध में सुदर्शनजी का त्रिपुरा, नागालैंड, अरुणाचल आदि पूर्वोत्तर क्षेत्र में गहन प्रवास होता था। उन दिनों उनसें जब भी भेंट होती थी वे इस विषय में चर्चा जरूर करते थे। समस्या के मूल और इसके विस्तार लेने की प्रक्रिया का एक विस्तृत खाका उन्होंने बनाया था।

इसी बीच विचार आया कि जब तक देश के इतिहास को भारतीय दृष्टि से केवल समसामायिक ही नहीं, बल्कि शाश्वीत दृष्टि की गहन अनुभूति व चिंतन के साथ देशवासियों के समक्ष नहीं रखा जाएगा, तब तक देशवासियों मं  देश की समस्याओं को लेकर एक गहन दृष्टि विकसित नहीं होगी। इसके लिए अपने इतिहास के अच्छे तत्वों को व्यवहार में लाया जाना आवश्यक है। इस देश की आर्थिक, सामाजिक यहां तक कि अन्तरराष्ट्रीय संबंधों के सुलझाव की प्रक्रिया भी इसके बिना स्पष्ट नहीं होगी। इस संदर्भ में उन्होंने मेरे अतिरिक्त पांच-छह अन्य लोगों से भी निरंतर चर्चा शुरू की। जिनमें पी. परमेश्वकरन्, के.आई. वासु, डॉ. सुजीत धर, मलकानी जी, देवेन्द्र स्वरूपजी आदि थे। कालांतर में इसमें और भी कई लोगों को उन्होंने जोड़ा, जैसे डा. बजरंग लाल गुप्त। इन चर्चाओं में भी एक चिंतन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई जिसका नाम रखा गया प्रज्ञा प्रवाह। विभिन्न स्थानों पर उसके कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे और धीरे-धीरे नियमित वैचारिक गोष्ठियों का आयोजन शुरू हुआ। इसी दृष्टी से देश में स्वदेशी विज्ञान, विज्ञान भारती जैसी गतिविधियां शुरू हुई। इनसे देश के प्रमुख वैज्ञानिकों को जोड़ा गया। इस तरह सुदर्शनजी की सोच और चिंतन बहुआयामी था।

भारतीय कृषि के बारे में भी उनका बड़ा आग्रह था

भारतीय कृषि के बारे में भी उनका बड़ा आग्रह था कि यदि बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियां वो बीज दे रही हैं जो जैनीटिकली मोडिफाइड हैं, उन्हें गहरे और निरंतर प्रयोगों के बिना स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि कालांतर में इसका दुष्प्रभाव हमारी खेती पर पड़ेगा और आज वास्तव में वह दिखाई भी दे रहा है। वे जहां भी जाते थे इसका आग्रह करते थे कि ये बीज किसान और देश के लिए घातक हैं। इसलिए उनका जैविक खेती पर बड़ा आग्रह रहता था। इसी से संबंधित गो, पंचगव्य, गाय का कृषि में स्थान, अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका ये पूरा चक्र उन्होंने अपने चिंतन से बनाया था। वे कहते थे ये व्यवस्था देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य तत्व होना चाहिए। इसी में से  बजरंग लाल जी का सुमंगलम् चिंतन निकला। वे मानते थे कि गो, ग्राम, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था ही मंगलकारी है। सुदर्शनजी कहते थे कि पोषणक्षम विकास नहीं बल्कि पोषणक्षम उपभोग को वरीयता दी जानी चाहिए क्योंकि असीमित उपभोग खतरनाक है। उनका आग्रह बिजली, पानी के उपयोग में भी एक संयमित दृष्टि विकसित करने पर रहता था। केवल कहने भर के लिए वे ऐसा नही कहते थे बल्कि उनके व्यवहार में भी यह परिलक्षित होता था। मैंने कई बार देखा कि वे पूरा गिलास पानी कभी नहीं लेते थे। कहते थे आधा गिलास दो। जरूरत होगी तो बाद में ले लेंगे। पानी को व्यर्थ क्यों करे। इसी तरह देश में पेट्रोल व डिजल की कमी को लेकर वो इसके विकल्प खोजने के बारे में प्रयत्नशील रहते थे। 


इस विषय में उन्होंने कई वैज्ञानिकों से चर्चा की और परिणाम स्वरूप प्लास्टिक के कुड़े से पेट्रोल बनवाकर दिखवाया और उसे प्रयोग के तौर पर परखा भी। इस तरह के प्रयोगों के द्वारा प्रकृति के संरक्षण के प्रति उनका बड़ा आग्रह रहता था और उस पर हमेशा बल देते थे। बायो डीजल के उत्पादन और उससे खेती किए जाने पर भी उनका आग्रह रहता था। इसके लिए कौन-कौन वैज्ञानिक सहायक होंगे, उन्हें बुलाने, बैठकर चर्चा कराने का उनका लगातार आग्रह रहता था। आकाश में चमकनेवाली बिजली को लेकर भी वो कहते थे कि इसका देश के लिए कैसे उपयोग हो, इसके बारे में सोचो। इन विषयों को लेकर वैज्ञानिकों से उनके व्यापक संपर्क के कारण कई बार कुछ वैज्ञानिक अपने प्रारूप भेजते थे। तो संबंधित लोगों को बिठाकर उस पर वे चर्चा कराते थे। इस तरह उनका चिंतन केवल सैद्धांतिक ही नहीं रहता था बल्कि व्यावहारिक क्रियान्वयन के द्वारा देश की स्थिति को कैसे ठीक किया जाए, इसका वे निरंतर प्रयास करते थे। सरस्वती नदी के शोध पर भी काम कैसे आगे बढ़े इसे लेकर भी प्रज्ञा प्रवाह में कई बार चर्चा हुई और ये विषय वहां से आगे बढ़ा। केन्द्र में मंत्री रहते हुए भी मैंने इन सब प्रयासों में सहभागिता निभाई। तब मुझ पर भगवाकरण किए जाने का भी आरोप लगा।

ऐसे उदात्त चिंतन के बावजूद सुदर्शनजी की विशेषता यह थी कि उनमें कभी वैचारिक दंभ या अहंकार दिखाई नहीं दिया। इस सबको लेकर वे इतने सहज थे कि कई बार तो मुझे देर रात को भी फोन कर लेते थे और पूछते थे कि अभी मेरे ध्यान में अमुक बात आई है इस संबंध में क्या करना चाहिए और कैसे करें। हिन्दी को लेकर भी उनका निरंतर आग्रह रहता था कि निष्कलंक हिन्दी का प्रयोग किस प्रकार बढ़े। ये सब बाते देखने में छोटी लग सकती हैं लेकिन समग्र रूप में यह एक व्यापक प्रक्रिया है जिसे उन्होंने विस्तार दिया।

मुसलमान और ईसाइयों को अल्पसंख्यक कहे जाने से भी वे असहमत थे। वे इसे गलत मानते थे और कहते थे ये तो भारतीय पूर्वजों की ही संताने हैं तो अल्पसंख्यक कैसे हुए? इस संबंध में उनका आग्रह रहता था कि एक ऐसा समूह बने जो मुस्लिम और ईसाइयों को ये बताए कि वे इसी राष्ट्र के अंग है। वे मुसलमानों को हिन्दू संयुक्त परिवार का अंग मानते थे। बाद में उनके इसी विचार को लेकर कुछ प्रयास भी हुए। और केवल वैचारिक स्तर पर ही नहीं बल्कि व्यवहार से भी उन्होंने कई बार यह दिखाया। इमाम इलियासी के पिता व अन्य इमामों के साथ उनका अक्सर उठना-बैठना होता था।

मुझे याद है

मुझे याद है कि जब इमाम इलियासी के पिता का निधन हुआ तो इलियासी बाहर थे। सुदर्शनजी वहां उनके अंतिम संस्कार के समय तक उपस्थित रहे। इस तरह उन्होंने आत्मीयता के सूत्र विकसित किए। ऐसा उनके जीवन का समग्र स्वरूप था। सुदर्शनजी के व्यक्तित्व का समग्रता में मूल्यांकन होना चाहिए कि वे क्या थे। हालांकि उनका कभी यह विचार, सोच या आग्रह नहीं रहा कि लोग उनके बारे में जानें। लेकिन आगे की पीढ़ियों के मार्गदर्शन के लिए हमें यह करना चाहिए। उनका जीवन एक स्फटिक निर्झर धारा के समान निरंतर प्रवाहमान था। उस धारा में से जो जलकण फुहारों के रूप में निकलते हैं वे भी दूर खड़े व्यक्ति को स्पर्श करते समय शीतलता प्रदान करते हैं। ऐसा ही उनका जीवन था। शांत गति से बहता हुआ एक अविरल प्रवाह की तरह। उनके संपर्क में आने वाला व्यक्ति अनायास ही उनके प्रभाव का अमृत रस पा जाता था। ऐसा था उनका व्यक्तित्व। जब वे सरसंघचालक के दायित्व से निवृत्त हुए तो उनका केन्द्र भोपाल बन गया। मेरा जब भी भोपाल जाना होता था तो पता चलने पर मुझे फोन करना, मिलना ये उनका स्वभावक था। फोन पर बताते थे कि यहां आओ मैं तुम्हें अपनी खेती दिखाऊंगा। छत पर ही उन्होंने बड़े चाव से थोड़ी सी खेती के प्रयोग करके लौकी, करेला, तोरई ये सब उगा लिया था। इस तरह जिस जैविक खेती की वे चर्चा करते थे उन्होंने एक छोटे स्वरूप में उसे क्रियान्वित कर दिखाया। और बाल सुलभ उत्सुकता के साथ उसके बारे में विस्तार से चर्चा करते थे।

पढ़ने-लिखने पर उनका बड़ा आग्रह रहता था

कई बार कार्यक्रमों मे मेरा उद्बोधन होता था। कहीं से सूचना पाकर वे सहज, सामान्य रूप से वहां पहुंच जाते थे और नीचे सामने की पंक्ति में बैठे दिखते थे। इतने बड़े दायित्व पर रहकर भी उनकी यह सहजता विरल थी। उनका स्वभाव था निर्भय होकर अपनी बात रखना। उस पर प्रतिक्रिया क्या होगी वो ये कभी नहीं सोचते थे। कई बार उनसे लोग कहते भी थे कि ये बोलना ठीक नहीं था, तब कहते थे जो मुझे ठीक लगा बोल दिया। इसके पीछे कभी उनका कोई स्वार्थ या आग्रह-दुराग्रह नहीं रहा। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि सुदर्शनजी बहुत अच्छा गीत गाते थे। वास्तव में वे एक वैचारिक आंदोलन के अग्रदूत थे। आपातकाल आदि के समय में वैचारिक तारतम्य में जो विखंडन आया, उसे उन्होंने न केवल पुनर्स्थापित किया बल्कि उसे एक दिशा भी दी। पढ़ने-लिखने पर उनका बड़ा आग्रह रहता था। गांधी, अरविंद, तिलक के बारे में सभी को पढ़ना चाहिए ऐसा वे बार-बार कहते थे। 

धर्मपालजी की पुस्तकें पढ़ने के बारे में भी वे बड़ा आग्रह करते थे। स्वयं हृदय रोग से जब पीड़ित हुए तो उड़द की दाल का लेप और लौकी का रस लेते थे। इस प्रयोग से लाभ महसूस होने पर उन्होंने इसको कई लोगों को बताया। यहां तक कि कोलकाता के डॉ. सुजीत धर को भी जब हृदय रोग हुआ तो वे स्वयं उनके उड़द की दाल का लेप लगाते थे और अपने हाथों से लौकी का रस निकालकर उनको पिलाते थे। ऐसा सहज और स्नेही स्वभाव दुर्लभ है। आत्मीयता उनके स्वभाव में गुंफित थी, कहीं एक कार्यकर्ता के यहां भोजन करने गये और भोजन के बाद घर में घूमते समय उन्होंने रसोई को देखा और कार्यकर्ता की पत्नी से कहा तुम्हारी रसोई की बनावट ठीक नहीं है इसे इस तरह बनाना चाहिए अर्थात स्नेहवश वे कार्यकर्ताओं के प्रति यहां तक हित चिंतन करते थे। ऐसा सरल, निष्कपट और ‘सर्वभूत हिते रता:’ जीवन था सुदर्शनजी का।

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