गोंडवाना क्षेत्र की वीरांगना के राज्य के संदर्भ में एक लोकोक्ति बड़ी प्रसिद्ध है – “आमन बुध बावन गढ़ में”, अर्थात बावन गढ़ में सब बुद्ध हैं, सब सिद्ध हैं। बावन गढ़ों के साम्राज्य की शासक वीरांगना दुर्गावती का जनजातीय होना और उनके पूर्ववर्ती पूर्वज सम्राट जादूराय के साम्राज्य की स्थापना के सूत्रधार सुरभि पाठक का ब्राह्मण होना, एक अद्भुत समाज व्यवस्था थी। रानी दुर्गावती, राठ महोबा के चंदेल वंशीय राजा शालिवाहन की पुत्री थी। वस्तुतः रानी दुर्गावती के मायके और ससुराल दोनों ओर की कुल परंपरा भारतीय सोशल इंजीनियरिंग का एक अद्भुत उदाहरण है।

वीरांगना दुर्गावती को न तो मात्र जनजातीय शासक कहने का अपराध कर सकते हैं और न ही उनके क्षत्रिय पूर्वज चंदेलों को केवल क्षत्रिय कहा जा सकता है। उनके ससुराल के पूर्वजों के चाणक्य सुरभि पाठक को भी केवल ‘ब्राह्मण’ में सीमित कर देने का पाप भी नहीं कर सकते। ये दोनों कुटुंब समूचे गोंडवाना से लेकर बुंदेलखंड तक अपने साम्राज्य, लोक कल्याणकारी राजा, विधर्मियों से लोहा लेने वाले शासक के रूप में प्रसिद्ध थे। दोनों कुटुम्बों का यह वैवाहिक सम्मेलन भारत की सामाजिक समरसता का एक अनुपम व ज्वलंत उदाहरण है।

दुर्गावती के पूर्वज महान गोंड राजा जादूराय एवं उनके मार्गदर्शक सुरभि पाठक, भारत की गुण आधारित जातीय व्यवस्था का एक चमकता मस्तक मणि है। गढ़ा कटंगा में गोंड साम्राज्य की नींव रखने वाले जादूराय राजा हुए तो अपनी वीरता के गुण के आधार पर ही हुए। उनके मार्गदर्शक, सहयोगी और चाणक्य की पदवी सुरभि पाठक को मिली तो यह उनकी बुद्धिमत्ता, सामाजिक समरसता वाली समझ का प्रतिफल था।

वीरांगना दुर्गावती का प्रसंग एक व्यवस्थित, विकसित, भारतीय गुण आधारित जाति व्यवस्था या समाजशास्त्र का एक चमकता मणि-माणिक्य है। और भी स्रोत जैसे रामनगर प्रशस्ति, गढ़ेश्वरनृपवर्णनम् तथा स्लीमन के विवरणों से संग्राम शाह के अधीन रहे बावन गढ़ों पर रानी दुर्गावती के शासन की बात पुष्ट होती है।

त्रिपुरी के कल्चुरी साम्राज्य के दुर्बल होने के मध्य के घटनाक्रम में गोंड राजसत्ता का उदय वस्तुतः कल्चुरी साम्राज्य के जागीरदार जादूराय और सुरभि पाठक का सम्मिलित उद्यम था। यह ऐतिहासिक घटना हमें चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य का स्मरण कराती है।

05 अक्तूबर 1524 को जन्मी चंदेल राजकुमारी वीरांगना दुर्गावती को केवल योद्धा कहना उनके व्यक्तित्व को पूर्ण प्रकट नहीं करता। वीर दुर्गावती एक कुशल प्रशासक, नेतृत्वकर्ता, जल-संरक्षण, पर्यावरण आदि की दूरदर्शी योजनाकार, अर्थशास्त्री, सैन्य बुद्धि की धनी होने के साथ-साथ एक कुशल योद्धा थीं।

अबुल फजल अकबरनामा और आईना-ए-अकबरी में लिखते हैं – “चंदेल राजकुमारी दुर्गावती का विवाह गढ़ा-कटंगा के गोंड राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से होना एक सामाजिक, सैन्य और रणनीतिक समीकरण को जन्म देना ही था”। चंदेल और गोंड अब एक होकर विधर्मियों के समक्ष खड़े थे। (जिला रिपॉजिटरी, भारत सरकार, आजादी का अमृत महोत्सव)

वीरांगना दुर्गावती के पति दलपत शाह की मृत्यु के समय उनके पुत्र वीर नारायण की आयु पाँच वर्ष की थी। ऐसी विपरीत परिस्थिति में रानी अपने रनिवास से निकलकर सभी को चुनौती देती हुए सामने खड़ी हो गई थी। दुर्गावती ने बड़ी ही कुशलता से सत्तासूत्र सम्भाल लिए थे।

अबुल फजल ने वीरांगना के संदर्भ में लिखा है – “वे बड़ी दूरदर्शी, साहसी, तीक्ष्ण बुद्धि, अद्भुत बल व सामाजिक समीकरणों की विशेषज्ञ थीं”। यही कारण था कि वे अपनी बीस हजार घुड़सवारों और एक हजार हाथियों से सुसज्जित विशाल सेना का नेतृत्व कुशलता पूर्वक कर पाईं। वे बंदूक और धनुष दोनों में दक्ष थीं।

आज जिसे हम संस्कारधानी कहते हैं और जो ऋषि जाबालि और सत्यकाम की नगरी रही है, उस जबलपुर पर वीरांगना दुर्गावती शासन करती थीं। गढ़ा कटंगा आज भी जबलपुर का उपनगर है। मदनमहल का निर्माण रानी दुर्गावती के पूर्वज मदन शाह ने कराया था। जबलपुर के रानीताल, चेरीताल और आधारताल जैसी जल-संरचनाओं का निर्माण वीरांगना दुर्गावती ने ही कराया था। इस जल संग्रहण से कृषि संवर्द्धन, आर्थिक विकास और पेयजल व्यवस्था को साध लिया था।

अबुल फजल लिखता है – वर्ष 1564 में आसफ खान ने गढ़ा-कटंगा पर आक्रमण किया था। मुगल सेना में बड़ी संख्या में घुड़सवार थे, बड़ी संख्या में पैदल सैनिक थे। दूसरी ओर प्रारंभिक चरण में रानी के साथ बहुत कम सैनिक रह गए थे। इस युद्ध में शौर्यवती दुर्गा नर्रई में रहीं। चतुर सैन्यनीति की धनी रणवीर दुर्गावती ने इस स्थान की भौगोलिक कठिनाई को अवसर में परिवर्तित कर दिया। इस स्थान पर एक ओर गौड़ नदी, दूसरी ओर नर्मदा जी, अन्य दो ओर बड़ी और खड़ी पहाड़ियाँ थीं। इसमें बड़े ही पतले और संकरे रास्ते थे। पराक्रमी दुर्गावती ने रणनीति बनाई और शत्रु को संकरे मार्ग में प्रवेश करने दिया। इसके बाद चतुरवीरा ने शत्रु को चारों ओर से घेरकर उसकी जो दुर्गति मचाई कि मुगल त्राहिमाम-त्राहिमाम करते मारे गए। क्षेत्र के भूगोल का अध्ययन और उस अध्ययन को युद्ध रणनीति में प्रयोग करना, इस अदम्य वीर नारी की प्रिय नीति थी। इस युद्ध में वीरांगना दुर्गा ने मुगलों को दूर तक खदेड़ा था।

अनेक युद्धों में रानी दुर्गावती रणचंडी बनकर मुगलों को खदेड़ती रहीं। अपने अंतिम युद्ध में वीरांगना दुर्गावती अपने प्रिय हाथी सरमन पर सवार हुईं। उनका पुत्र वीर नारायण भी युद्ध में उतरा। अबुल फजल लिखता है – वीर नारायण ने तीन बार शत्रु को पीछे धकेला, लेकिन तीसरी बार घायल हो गया, तब रानी ने उसे सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। इसके बाद दुर्गावती की सेना कमजोर होती चली गई। अंततः उनके साथ मात्र तीन सौ सैनिक रह गए। इसी दौरान एक तीर उनके मस्तक के पास और दूसरा गर्दन में लगा। घायल होने के बाद उन्होंने अपने विश्वस्त सैनिक आधार से कहा कि वे शत्रु के हाथों पड़ना नहीं चाहतीं। आधार ने उन्हें बचाकर ले जाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन रानी ने 24 जून 1564 को मात्र चालीस की अल्पायु में स्वयं कटार से अपना जीवन समाप्त कर लिया।

महाकौशल के गोंड समाज में वीरांगना दुर्गावती की स्मृति में सैला जैसे लोकगीतों में उनके गुण आज भी गाए जाते हैं। इन लोकगीतों में वीरमणि को तलवार धारण करने वाली अद्भुत योद्धा, घुड़सवार और गढ़-मंडला की रक्षा करने वाली वीरा के रूप में स्मरण किया जाता है।

जिस वीरांगना के विषय में शत्रु के परामर्शदाता, इतिहासकार और सेनापति भी सम्मान से प्रशंसापूर्ण शब्द ही कहने को विवश हो जाएँ, उस नारी की वीरता और बुद्धिमत्ता के विषय में हम बरबस ही मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

वृतांतों और इतिहास के संदर्भ में स्मारक, मुगलकालीन इतिहास, अंग्रेजों द्वारा लिखा गया इतिहास, पुरातात्विक सर्वेक्षण और लोकोक्तियाँ, सभी एक स्वर में वीरांगना दुर्गावती को महान और अपराजेय योद्धा सिद्ध करते हैं।

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