सारा जीवन क्रियाशील रहनेवालों के लिए निवृत्ति सबसे कठिन होती है। गृहस्थों के लिए भी अगली पीढ़ी को सूत्र सौंप निवृत्त होना बड़ा कष्टदायक होता है। भले ही उन्होंने संतति की बड़ी प्रतीक्षा की हो और बचपन से ही उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में गढ़ा हो, जब समय आता है तब टालमटोल स्वाभाविक ही होती है। समर्पित प्रचारक के लिए भी दायित्व परिवर्तन के बाद स्वयं को समेटना एक परीक्षा ही होती है। नये दायित्व की व्यस्तता में भी पुरानी भूमिका में कुछ अटकाव रह ही जाता है। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि बढ़ती आयु के कारण सभी संगठनात्मक दायित्वों से मुक्त प्रचारकों के लिए यह कितना महत्कष्टप्रद होता होगा। इस सामान्य संगठनात्मक आसक्ति के लिए विनायकराव कानेटकर एक अपवाद थे। उन्होंने अत्यंत उदारता से २०१६ में भारतीय शिक्षण मंडल के संगठन मंत्री के दायित्व का परित्याग किया।

विनायकराव के साथ २०१२ में शिक्षण मंडल के सह संगठन मंत्री का दायित्व मिलने के बाद परमपूज्य सरसंघचालक जी के कहे शब्द बाद में समझ आये। मा. मोहन जी ने कहा था, “तुम भाग्यशाली हो कि एक आदर्श प्रचारक के मार्गदर्शन में कार्य करने का स्वर्णिम अवसर मिला है। उनसे सीख लो।” अगले दशक भर की संगठनात्मक यात्रा में पग पग पर परमपूज्य के इन शब्दों का साक्षात्कार होता रहा। १९६० के महान प्रचारकों की टोली के विनायकराव निश्चित ही एक आदर्श प्रचारक थे। उनका प्रचारक जीवन मेरी आयु से भी अधिक था। फिर भी उनकी वरिष्ठता और प्रचुर अनुभव हमारे सुमधुर संबंधों में कभी बाधा नहीं बने।

यह एक अनोखी मैत्री थी। गुर्दे की प्राणघातक व्याधि से उबरने के बाद भी उनकी आयु और शारीरिक अवस्था के अनुपात में वे अत्यंत सक्रिय थे। मूत्रमार्ग में प्रत्यारोपित नलियों (Stents) को हर छह माह में बदलना पड़ता था। उपचार को अत्यंत श्रद्धा से स्वीकार कर वे डॉक्टर के आदेशों का संघ अनुशासन से पालन करते थे। औषधी और आहार के कठोर अनुपालन से सत्तर की आयु में भी वे स्वस्थ थे। शारीरिक व्यायाम, प्राणायाम और नियमित शाखा के साथ उनकी दिनचर्या सुनिश्चित थी। संघ की प्रार्थना में उनके द्वारा एक दिन का भी व्यत्यय नहीं हुआ होगा।

पूर्ण रूप से अनासक्त होते हुए भी उनके दायित्व के क्षेत्र के पुराने स्वयंसेवकों के तीन पीढ़ियों से संबंध बनाए रखे थे। पचास वर्ष पुराने संबंधों के बच्चों और अन्य संबंधियों का पूरा विवरण भी उनके पास अद्यतन उपलब्ध रहता था। उनका अधिकतर प्रचारक कार्य ईशान्य क्षेत्र में और विशेषकर असम प्रांत में रहा। वैज्ञानिक दैनंदिनी की सहायता से वे प्रतिवर्ष सब संपर्कों का स्वयं के हस्ताक्षर में नूतनिकरण करते थे। अनेक यशस्वी व्यवसायी, उद्योजक, अधिकारी गर्व से बताते हैं कि बाल्यकाल में वे विनायकराव की गोद में खेले हैं। उनका संपर्क सतत और सुनियोजित होता था। नयी संचार तकनीक को उन्होंने सहज स्वीकार किया था। सम्पर्क सूत्रों का सहज प्रबंधन निश्चित ही एक महत्वपूर्ण प्रेरणा रही होगी।

यह संघ शैली का सम्पर्क तीन बंधु और दो बहनों के नाती-पोतों सह बृहत् परिवार में भी होता था। अपने विद्यालय, महाविद्यालयों के अधिकतर सहपाठियों और उनकी अगली पीढ़ियों से भी उनका जीवंत संपर्क था। एक बार पुणे में उन्होंने एक वरिष्ठ माताजी से यह कहकर परिचय कराया कि वे उनकी तीसरी कक्षा की एक सहपाठी की सुपुत्री हैं। मैंने खूब असफल प्रयत्न किया कि अपने प्राथमिक कक्षा के किसी एक सहपाठी का नाम स्मरण किया जाए। उनकी प्राथमिक कक्षा से २८ वर्ष अधुना होते हुए भी मैं एक भी नाम याद नहीं कर पाया। और यहाँ विनायकराव ना केवल उन्हें अपितु उनके पुत्र-पौत्रों को भी स्मृति में बनाए हुए थे। सामाजिक माध्यमों से हो रहे पुनर्मिलनों के कई वर्ष पूर्व से वे यह करते रहे हैं। प्रतिवर्ष अद्यतन होती दूरभाष पंजी और सामान्य डाक और उसमें भी सस्ते पोस्ट कार्ड से किए पत्राचार की यह पुरातन विधि थी।

वे सदा मेरा परिचय उनके सहयोगी के रूप में कराते थे। किसी पिता द्वारा अपने दायित्व को निभाने को सन्नद्ध पुत्र का सगर्व दिये परिचय के समान घरेलू होने के कारण तकनीकी रूप से सही ना होते हुए भी अत्यंत अपनत्व का अनुभव होता था। सभी संगठनात्मक बैठकों में उनका दृष्टिकोण परस्पर सम्मान और लाड़ से पालकत्व का होता था। हमारे उपनाम (कानिटकर – कानेटकर) में केवल एक मात्राभेद के सिवा पूर्ण साम्य था। पर किसी के भी द्वारा एक ही उच्चारण उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया। वे केवल नाम में त्रुटि सुधार से संतुष्ट नहीं होते थे, अपितु उपजाति के भेद को भी समझाकर ही मानते थे। यह विलोभनीय और शिक्षाप्रद था। वे स्पष्ट करना चाहते थे कि हमारा परस्पर संबंध रक्त से गहरा ध्येय संबंध था। संगठन के विस्तार और विलक्षण विकास से उन्हें आनंद और गर्व दोनों का सत्य अनुभव होता था। आदर्श कर्मयोगी से समान अनावश्यक हस्तक्षेप रहित सजग साक्षी भाव तथा उचित मात्रा में सुझाव, सुधार के साथ ही प्रचुर मात्रा में प्रोत्साहन और स्वातंत्र्य से परिपूर्ण नवपीढ़ी के मार्गदर्शन की उनकी विशिष्ट शैली थी। सभी अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों तथा विराट गुरुकुल सम्मेलन में उनका उत्साह अत्यंत उत्स्फूर्त तथा प्रेरक था। उन्हें सम्मान की कोई अपेक्षा नहीं थी, उल्टे किसी प्रकार के अनावश्यक महत्व को वे कठोरता से हतोत्साहित करते थे l बिना किसी आपत्ति अथवा मंच पर आमंत्रण की अपेक्षा के वे पूरे आयोजन में सक्रिय श्रोता की भूमिका आनंद से निभाते थे। जब कभी आयोजक उन्हें उत्सव केंद्र में लाने की भूल करते थे तब वे सबके सामने डाँट लगाने में भी नहीं चूकते थे कि यह संघ संस्कार नहीं है।

असमिया, बांगला, गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी तथा मातृभाषा मराठी के ज्ञान से वे बहुभाषी थे। उन्होंने उत्साह से संस्कृत संभाषण की कक्षा में सहभाग लिया था और देववाणी में भी सहज अचूक संवाद में सक्षम थे। किंतु उनका सर्वोत्तम तो असमिया संभाषण में ही अभिव्यक्त होता था। ब्रह्मपुत्र का तट ही उनका वास्तविक घर था। वानप्रस्थ के बाद भी असम की वार्षिक यात्रा उन्हें वर्षभर के लिए ऊर्जान्वित कर देती थी।

संगीत भी उनका एक और प्रेम था। मूल रूप से शास्त्रीय संगीत के प्रशिक्षित श्रोता होने से वे अत्यंत मधुर गाते थे। औपचारिक शिक्षण के बिना भी हिंदुस्थानी शास्त्रीय संगीत का उनका ज्ञान और अभ्यास लक्षणीय था। उनका वाचन भी अधुनातन होता था। वे न्यूनतम तीन समाचारपत्र आद्योपांत पढ़ते थे और भिन्न भाषाओं में प्रकाशित अनेक लेख पढ़ने की नियमित अनुशंसा भी करते थे। सजीव आभासी बैठकों तथा संचार उपकरणों और सुविधाओं सहित सभी नूतन बातों को सीखने की तत्परता उन्हें अंत तक युवा बनाये हुए थी।

संगठनात्मक कार्य से सक्रिय निवृत्ति सर्वाधिक उल्लेखनीय थी। पूरा सम्पर्क तोड़े बिना उन्होंने उलझना पूर्ण बंद कर दिया। यह आश्चर्यजनक था कि बिना कण भर भी हस्तक्षेप किए वे सभी गतिविधियों में पूर्ण रुचि लेते थे। उनका स्वामित्वबोध अन्य गुणों के समान ही आदर्श था। वे अपनी भूमिका को ठीक से पहचानते थे और कथानक की अंतिम मात्रा तक बिना किसी जोड़ अथवा भेद के अचूक निभाते थे – कोई चुग़ली नहीं, कोई विसंवाद नहीं, कभी भी कोई संभ्रम अथवा ग़लतफहमी नहीं। जहाँ अपेक्षित वहाँ वे निश्चित उपस्थित रहते ही थे। दायित्व निवृत्ति के बाद जब उन्हें सब सत्रों में उपस्थित रहना अनिवार्य नहीं था तब भी वे सत्र नहीं चूकते थे। शिक्षण मंडल में विस्तारक योजना का शुभारंभ उनकी स्वप्नपूर्ति थी। सभी युवा कार्यकर्ताओं के वे सदैव उपलब्ध मित्र और मार्गदर्शक थे।अद्वितीय मनुष्य निर्माण संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विनायकराव कानेटकर सर्वश्रेष्ठ फलित थे।

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