सबसे पहले दो उदाहरण देखें—
“घटना की वास्तविक तारीख 21 फरवरी है।”
और—
“हमें जीवन के यथार्थ को स्वीकार करना चाहिए।”

इन उदाहरणों में तारीख के साथ यथार्थ नहीं आएगा और जीवन के साथ वास्तविक अटपटा लगेगा। आइए! अब हम दोनों शब्दों के मूल को जानकर उनके अर्थपरक विभेद को समझने की कोशिश करते हैं–

वास्तविक शब्द बना है— ‘वस्तु’ से, जो स्वयं बना है ‘वस्’ धातु से। ‘वस्’ धातु से रहने, डटने, बसने, निवास करने का अर्थ प्रकट होता है। यही ‘वस्’ धातु ‘वसन’ या वस्त्र में है, तो किसी वस्ति/ बस्ती में; कहीं बसने, वास/बास/निवास करने में भी है। वसा में भी यही ‘वस्’ है, जो हड्डियों के ऊपर टिकता है, वास या निवास करता है।

इसी वस् से बने ‘वस्तु’ शब्द का अर्थ है— चीज, पदार्थ, सामग्री, वस्तुतः, विद्यमान् इत्यादि।

इसी वस्तु से शब्द बना ‘वास्तव’ (वस्तु + अण्), जिसका अर्थ है—
असली, सच्चा, सारयुक्त, निश्चित।
इसी वास्तव में ‘इक’ प्रत्यय लगकर विशेषण शब्द ‘वास्तविक’ बना है।
सहज ही समझा जा सकता है कि वास्तविक जो बना ही है ‘वस्तु’ से, वह वस्तुनिष्ठ तो होगा ही।

हम जानते हैं कि इसी ‘वस्’ धातु से बने ‘वास्तु’ का मूल अर्थ है— घर बनाने की जगह, भवन या भूखण्ड। ये सब स्पष्टत: दिखते हैं, जैसे कोई वस्तु दिखती है। वास्तव्य कहते हैं– निवासी या वासी को और जो जगह रहने के योग्य हो उसे ‘वास्तेय’ कहा जाता है। 

स्पष्ट है कि वास्तव और वास्तविक का संबंध प्रत्यक्ष अस्तित्व से है— उससे, जिसे देखा, मापा या प्रमाणित किया जा सके। एक और उदाहरण लेते हैं– 
“यह रिपोर्ट ज़मीनी वास्तविकता पर आधारित है।”
यहाँ यथार्थ नहीं आएगा, क्योंकि ज़मीनी स्थिति ठोस तथ्य पर आधारित होती है, जिसे हम देख सकें।

अब ‘यथार्थ’ शब्द को देखते हैं– 
यथार्थ : ‘यथा’ अव्यय से व्युत्पन्न है। स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होने पर ‘यथा’ शब्द के अर्थ हैं—
कथित रीति के अनुसार,
जैसा कि, उदाहरणस्वरूप; जबकि यथार्थ में निहित दूसरे शब्द अर्थ (ऋ + थन्) से
आशय, प्रयोजन, लक्ष्य, उद्देश्य, अभिलाषा, इच्छा इत्यादि का बोध होता है।

अब, यथा और अर्थ को मिलाकर देखें, तो यथार्थ का अर्थ है— ‘जैसा या जो अर्थ हो, ठीक वैसा ही।’ स्पष्ट है कि इसमें किसी कल्पना, भावना या सन्देह के लिए कोई जगह नहीं होती। उदाहरण— यथार्थ दृष्टि, यथार्थ महत्ता।

इसलिए हम कहते हैं—
“हमें जीवन के यथार्थ को स्वीकार करना चाहिए।”
या— “उसकी यथार्थ दृष्टि ने समस्या सुलझा दी।”
यहाँ वास्तविक नहीं चलेगा, क्योंकि बात वस्तु की नहीं, विवेक और समझ की है।

सरल सूत्र याद रखें—
‘वास्तव’ को देखा जा सकता है, जबकि यथार्थ को जाना जाता है। वास्तव बाह्य संसार की ठोस सच्चाई है, जबकि यथार्थ उस सच्चाई की सही समझ।